11 April 2008
डाक्टर भगवान होता है परन्तु जब डाक्टर ही हैवान हो जाए तो?
10 April 2008
चुटकुले : पढे मगर हँसकर
राम अपने पापा से - थोड़ा टी.वी. चला दीजिए आज बहुत मख्खी भिनभिना रही है
पापा - मक्खी से टी.वी का क्या सम्बन्ध है
राम - आजकल टी, वी, मे मख्खी और काकरोज भगाने के विज्ञापन बहुत आते है उसे देखकर मख्खी भाग जावेगी .
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पापा - बेटा बुद्धिमान वेवकूफो की बातो का जबाब नही देते है और हँसकर टाल देते है
बेटा - पापा इसीलिए मैंने आज परीक्षा मे बस पेपर पढ़ा और जबाब नही दिया और हँसकर चला आया .
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राम - कल रात चोरो ने मेरे घर पर धावा मारा और पापाजी के रहते सब कुछ उठाकर ले गए
श्याम - पर तुम्हारे पिता जी तो पिस्तौल रखते है वह कहाँ थी ?
राम - पर पिस्तौल को चोरो ने देखा नही था पापाजी ने जल्दी से उसे कही छुपाकर रख दिए था .
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एक मित्र दूसरे मित्र से - आजकल जिस कम्प्यूटर का आविष्कार हुआ है पता है उसकी खूबी क्या है ?
दूसरा मित्र - हाँ , तकरीवन इंसान जैसा होता है अपनी सारी गलती दूसरे के सिर थोप देता है .
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कप्तान अपने रंगरूट को पैराशूट के प्रयोग करने के उपयोग करने की जानकारी दे रहा था .
रंगरूट ने अपने कप्तान से प्रश्न किया सर जब पैराशूट न खुले तो क्या करना चाहिए ?
कप्तान ने जबाब दिया कि तुम तुरंत मेरे पास आ जाना मैं तुम्हे दूसरा पैराशूट दे दूंगा .
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09 April 2008
भारत के वीर जवानों की सत्य कथाये
जोकि भारत और चीन,पाकिस्तान के बीच सं १९६२ और सं १९६५ के युद्ध के समय की है ऐसे वीर भारत माता के बेटो की कहानी जिनने हंसते हंसते देश की रक्षा के लिए अपने प्राण निछावर कर दिए . भारत के वीर जवान पुस्तक से चार कहानी हिन्दी ब्लॉग सफलप्रहरी मे प्रकाशित की जा चुकी है . कृपया अवलोकन कर अभिव्यक्ति प्रदान करने का कष्ट करे और नेट पर यह जो पुस्तक प्रकाशित की जा रही है इसके बारे मे आपके क्या विचार है .
भारत और चीन युद्ध पुस्तक की कड़ी : मेजर सौदागर सिह
भारत के वीर जवान पुस्तक की कड़ी : लेफ्टिनेंट कर्नल दयाल
भारत के वीर जवान पुस्तक की कड़ी : बहादुर जसवीर सिह...
भारत के वीर जवान पुस्तक की कड़ी : सूबेदार जोगिन्दर...
कृपया देखे =
http://safalprahri.blogspot.com
दूध घर मे बनाइये
जबलपुर शहर मे इन दिनों दूध के बढ़ते मूल्य के कारण भारी खलबली मची है हर कोई अपने अपने ढंग से दूध के दामो मे हो रही बढोतरी के ख़िलाफ़ विरोध के स्वर गुंजित कर रहे है . गरीब परेशान है कि वे अपने नन्हें मुन्नों को उनका आहार दूध कैसे उपलब्ध करा पावेंगे तो राजनीतिक स्वर विरोध कर रहे है अपना उल्लू सीधा करने के लिए उन्हें तो सिर्फ़ वोट से मतलब है भाड़ मे जाए गरीब और बच्चो का आहार दूध .
दैनिक भास्कर समाचार पत्र पढ़ते पढ़ते एक लेख देखा " घर मे बनाइये दूध " जिसके लेखक तरूनेद्र सिह चौहान जबलपुर है बहुत अच्छा लगा कि इस भीषण महगाई मे जब दूध के रेट बढ़ रहे है और जब दूध का कृत्रिम अभाव हो जाता है तो आप विकल्प के रूप मे घर मे दूध तैयार कर सकते है . लेख के अंश आपको प्रस्तुत कर रहा हूँ आशा यह आपको पसंद आवेगा और यह दूध स्वास्थ्य के लिए हितकर है .अब दूध के लिए दूध वाले से मिन्नत करने की जरुरत नही है और न ही पानी मिले दूध से सेहत से खिलवाड़ करने की जरुरत है .यह दूध दूध की तरह सौ प्रतिशत शुध्ध है और सोयाबीन से बनाया जा सकता है .
बनाने की विधि - एक किलोग्राम सोयाबीन से ८ लीटर दूध तैयार किया जा सकता है . एक किलोग्राम सोयाबीन से सरे परिवार की सेहत मे चार चाँद लग सकते है . सोया दूध मे लैक्टोज इन्टौलारेंस पाया जाता है जो बच्चो के लिए बेहद लाभदायक है . पहले सोयाबीन के दानो को फुला ले फ़िर दानो को फूल जाने के बाद पीस ले फ़िर पीसे हुए धोल को छान लिया जाता है और तरह मात्रा का उपयोग दूध की तरह किया जाता है और शेष अवशिष्ट अलग कर दिया जाता है . शर्त यह कि सोयाबीन के दाने पुष्ट होना चाहिए .
किसमे कितना दम - दोनों के दूध का पौष्टिक तुलनात्मक अध्ययन किया जाए दोनों लगभग बराबर है . सामान्य दूध मे प्रोटीन की मात्रा १८ से २० प्रतिशत है तो सोया दूध मे १४ से १८ प्रतिशत तक प्रोटीन होता है . सामान्य दूध मे वसा २० से २२ फीसदी रहता है तो सोया दूध मे ४ से ५ फीसदी रहता है . सामान्य दूध मे आयरन १ मिलीग्राम है तो सोया दूध मे ३ मिलीग्राम रहता है . सामान्य दूध मे नमी ५० से ५५ प्रतिशत मौजूद रहती है तो सोया दूध मे ७० से ७५ प्रतिशत नमी मौजूद रहती है . केवल स्वाद महक को छोड़ दिया जावे तो यह पौष्टिकता और गुणबत्ता के मामले मे यह दूध भैस और गाय के दूध से कम नही है .
हांलाकि बहुत कम लोगो को इसकी जानकारी है इसलिए इसका उपयोग कम हो रहा है . दूसरा कारण यह है कि दूध की अभी तो खैर उपलब्धता है इसीलिए सोयाबीन के दूध का विकल्प के रूप मे कम इस्तेमाल हो रहा है .
सरकार को भूटिया ने जमाई “किक” और किरण बेदी ने जड़ा “तमाचा”…
जो बात एक आम आदमी की समझ में आ रही है वह सरकार को समझ नहीं आ रही। सारी दुनिया में चीन का विरोध शुरु हो गया है, हर जगह ओलम्पिक मशाल को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। बुश, पुतिन और फ़्रांस-जर्मनी आदि के नेता चीन के नेताओं को फ़ोन करके दलाई लामा से बात करने को कह रहे हैं। लेकिन हम क्या कर रहे हैं? कुछ नहीं सिवाय प्रदर्शनकारियों को धमकाने के। मानो चीन-तिब्बत मसले से हमें कुछ लेना-देना न हो। सदा-सर्वदा मानवाधिकार और गाँधीवाद की दुहाई देने और गीत गाने वाले लोग चीन सरकार के सुर में सुर मिला रहे हैं, बर्मा के फ़ौजी शासकों से चर्चायें कर रहे हैं (पाकिस्तान के फ़ौजी शासकों से बात करना तो मजबूरी है)। .चीन सरेआम अपना घटिया माल भारत में चेप रहा है, बाजार का सन्तुलन बिगाड़ रहा है, अरुणाचल में दिनदहाड़े हमें आँखें दिखा रहा है, हमारी सीमा पर अतिक्रमण कर रहा है, पाकिस्तान से उसका प्रेम जगजाहिर है, वह आधी रात को हमारे राजदूत को बुलाकर डाँट रहा है… लेकिन हमारे वामपंथी नेताओं की “बन्दर घुड़की” के आगे सरकार बेबस नजर आ रही है। चीन ने भारत सरकार को झुकने को कहा तो सरकार लेट ही गई। सबसे अफ़सोसनाक रवैया तथाकथित मानवाधिकारवादियों का रहा, जिन्हें “गाजा पट्टी” की ज्यादा चिंता है, पड़ोसी तिब्बत की नहीं (जाहिर है कि तिब्बती वोट नहीं डालते) ।
असल में सरकार ने चीन की आँख में उंगली करने का एक शानदार और सुनहरा मौका गँवा दिया। जब चीन हमें सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट दिलवाने में हमारी कोई मदद नहीं करने वाला, व्यापार सन्तुलन भी आने वाले वर्षों में उसके ही पक्ष में ही रहने वाला है, गाहे-बगाहे पाकिस्तान को हथियार और परमाणु सामग्री बेचता रहेगा, तो फ़िर हम क्यों और कब तक उसके लिये कालीन बिछाते रहें? लेकिन सरकार कुछ खास पूंजीपतियों (जिनके चीन के साथ व्यापारिक हित जुड़े हुए हैं और जिन्हें आने वाले समय में चीन में कमाई के अवसर दिख रहे हैं) तथा वामपंथियों के आगे पूरी तरह नतमस्तक हो गई है। बाजारवाद की आँधी में सरकार ने विदेश में अपनी ही खिल्ली उड़वा ली है। इस पूरे विवाद में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का बहुत बड़ा रोल है। ओलम्पिक का मतलब है अरबों डॉलर की कमाई, कोकाकोला और रीबॉक जैसी कम्पनियों ने आमिर खान और सचिन तेंडुलकर पर व्यावसायिक दबाव बनाकर मशाल दौड़ के लिये उन्हें राजी कर लिया। यह खेल सिर्फ़ खेल नहीं हैं, बल्कि इन कम्पनियों के लिये भविष्य के बाजार की रणनीति का प्रचार भी होते हैं। सारे विश्व में इन कम्पनियों ने मोटी रकम दे-देकर नामचीन खिलाड़ियों को खरीदा है और “खेल भावना” के नाम पर उन्हें दौड़ाया है, अब आने वाले छः महीनों तक विज्ञापनों में ये लोग मशाल लिये कम्पनियों का माल बेचते नजर आयेंगे। लेकिन भूटिया और किरण बेदी की अंतरात्मा को वे नहीं खरीद सकीं। इन लोगों ने अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर विरोध का दामन थाम लिया है।
हम क्षेत्रीय महाशक्ति होने का दम भरते हैं, किस बिना पर? क्षेत्रीय महाशक्ति ऐसी पिलपिलाये हुए मेमने की तरह नहीं बोला करतीं, और एक बात तो तय है कि यदि भारत सरकार गाँधीवाद और मानवाधिकार की बातें करती है तो भी, और यदि महाशक्ति बनने का ढोंग करती हो तब भी…दोनों परिस्थितियों में उसे तिब्बत के लिये बोलना जरूरी है, लेकिन वह ऐसा नहीं कर रही। पिछले लगभग बीस वर्षों के आर्थिक उदारीकरण के बाद भी हम मतिभ्रम में फ़ँसे हुए हैं कि हमें क्या होना चाहिये, पूर्ण बाजारवादी, गाँधीवादी या सैनिक/आर्थिक महाशक्ति, और इस चक्कर में हम कुछ भी नहीं बन पाये हैं…
सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
07 April 2008
भारतीय मुस्लिम नेतृत्व
यह मुस्लिम नेता रोषपूर्वक अपने को सौ प्रतिशत भारतीय होने का दावा करते है। साथ ही साथ काश्मीर पर पाकिस्तान के दावे के पक्ष में तर्क देते सुने जाते है। आसाम में पाकिस्तानी काश्मीर घुसपैठियों को भारतीय मुसलमान मुस्लिम सिद्ध करते दिखाई देते है। कहने को उनका हिन्दुओं से कोई मनोमालिन्य नही किन्तु साथ ही साथ यह फतवा भी जारी करते है कि नेहरू के मृत्योंपरानत उनके शव के पास कुरान का पाठ इस्लाम के विरूद्ध है क्योकि काफिर के शव पर कुरान नही पढ़ी जा सकती। वह जाकिर हुसैन को भारत का राष्ट्रपति तो देखना चाहते है किन्तु अच्छा मुसलमान होने के नाते उनके हिन्दु में शपथ और शंकराचार्य से आशीर्वाद लेने प आपत्ति करते है।
प्रस्तुत वाक्य हामिद दलवई के है जो मुस्लिम पालिटिक्स इन सेक्युलन इंडिया, पृ. 47 से उद्धत है। इस वाक्य से मुसलिम नेतृत्व की का सही रूप सामने दिखता है। जो नेहरू की मृत्यु से लेकर आज तक की सत्ता सर्घष में हावी है। यह कांग्रेस उसी मुसलिम कौम को उठाने का असफल प्रयास कर रही है जो अपनी रूढि़ विचारों से कभी नही उठ सकती है। सोनिया को लगता है कि वह 18 प्रतिशत मुसलमानों के बल पर वह चुनाव जीत लेगी तो यह उनकी सबसे बड़ी राजनैतिक अपरपिक्वता की निशानी है, वह दिन दूर नही जब राष्ट्रवाद का स्वाभिमान जागृत होगा और देश में राष्ट्रवाद के नेतृत्व की सरकार आयेगी। और तब देश में न सिर्फ मुसलमान उन्नति करेगा अपितु पूरा देश उन्नति करेगा। जरूरत है उग्रता को सोंटा दिखने और सही मार्ग पर ले चलने की। क्योकि कहा गया है - भय बिन प्रीत न होत गुंसाई।
03 April 2008
पुत्र लालसा का मिथक तोड़ते 105 परिवार
कल्याण को अपना लिया ये जानते हुएकि इसके बाद उनको पुत्र प्राप्ति न हों सकेगी ,
["बाल विवाह मत करना माँ"अपनी माँ को रक्षा सूत्र बांधती एक बेटी ]
ये खुलासा तब हुआ जब मैं अपने सहयोगी स्टाफ के साथ म० प्र० सरकार की लाडली लक्ष्मी योजना की उपलब्धि के बाद आंकडों का विश्लेषण कर रहा था । 500 लाडली लक्ष्मीयों में से 89 वो हैं जिनकी बड़ी बहन ही है और भाई अब नहीं आ सकेगा , 6 बालिकाओं के तो न तो बहन होगी न ही भाई , यानी 21 प्रतिशत परिवारों ने पुत्र की लालसा के मिथक तोड़ दिए, क्यों न सकारात्मक सोच को उभार के हम कुरीतियों से निज़ात पाएं ....!!
अब शायद म० प्र० सरकार के इस प्रयास की सराहना सभी को करनी ही होगी ।
02 April 2008
गज़ल - बडे हम जैसे होते हैं...
बड़े हम जैसे होते हैं तो रिश्ता हर अखरता है ।
यहां बनकर भी अपना क्यूँ भला कोई बिछड़ता है ।
सिमट कर आ गये हैं सारे तारे मेरी झोली में,
कहा मुश्किल हुआ संग चांद अब वह तो अकड़ता है ।
छुपा कान्हा यहीं मै देखती यमुना किनारे पर,
कहीं चुपके से आकर हाथ मेरा अब पकड़ता है ।
घटा छायी है सावन की पिया तुम अब तो आ जाओ,
हुआ मुश्किल है रहना अब बदन सारा जकड़ता है ।
जिसे सौंपा थे मैने हुश्न अपना मान कर सब कुछ,
वही दिन रात देखो हाय अब मुझसे झगड़ता है ।
कवि कुलवंत सिंह
http://kavikulwant.blogspot.com
01 April 2008
तीसरे मोर्चे की बासी कढ़ी, बेकाबू महंगाई और पाखंडी वामपंथी
गत 5 वर्षों में सर्वाधिक बार अपनी विश्वसनीयता खोने वाले ये ढोंगी वामपंथी पता नहीं किसे बेवकूफ़ बनाने के लिये इस प्रकार की बकवास करते रहते हैं। क्या महंगाई अचानक एक महीने में बढ़ गई है? क्या दालों और तेल आदि के भाव पिछले एक साल से लगातार नहीं बढ़ रहे? क्या कांग्रेस अचानक ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की खैरख्वाह बन गई है? जिस “कॉमन मिनिमम प्रोग्राम” का ढोल वे लगातार पीटते रहते हैं, उसका उल्लंघन कांग्रेस ने न जाने कितनी बार कर लिया है, क्या लाल झंडे वालों को पता नहीं है? यदि ये सब उन्हें पता नहीं है तो या तो वे बेहद मासूम हैं, या तो वे बेहद शातिर हैं, या फ़िर वे परले दर्जे के मूर्ख हैं। भाजपा के सत्ता में आने का डर दिखाकर कांग्रेस ने वामपंथियों का जमकर शोषण किया है, और खुद वामपंथियों ने “शेर आया, शेर आया…” नाम का भाजपा का हौआ दिमाग में बिठाकर कांग्रेसी मंत्रियों को इस देश को जमकर लूटने का मौका दिया है।
अब जब आम चुनाव सिर पर आन बैठे हैं, केरल और बंगाल में इनके कर्मों का जवाब देने के लिये जनता तत्पर बैठी है, नंदीग्राम और सिंगूर के भूत इनका पीछा नहीं छोड़ रहे, तब इन्हें “तीसरा मोर्चा” नाम की बासी कढ़ी की याद आ गई है। तीसरा मोर्चा का मतलब है, “थकेले”, “हटेले”, “जातिवादी” और क्षेत्रीयतावादी नेताओं का जमावड़ा, एक भानुमति का कुनबा जिसमें कम से कम चार-पाँच प्रधानमंत्री हैं, या बनने की चाहत रखते हैं। एक बात बताइये, तीसरा मोर्चा बनाकर ये नेता क्या हासिल कर लेंगे? वामपंथियों को तो अब दोबारा 60-62 सीटें कभी नहीं मिलने वाली, फ़िर इनका नेता कौन होगा? मुलायमसिंह यादव? वे तो खुद उत्तरप्रदेश में लहूलुहान पड़े हैं। बाकी रहे अब्दुल्ला, नायडू, चौटाला, आदि की तो कोई औकात नहीं है उनके राज्य के बाहर। यानी किसी तरह यदि सभी की जोड़-जाड़ कर 100 सीटें आ जायें, तो फ़िर अन्त-पन्त वे कांग्रेस की गोद में ही जाकर बैठेंगे, भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के नाम पर। क्या मिला? नतीजा वही ढाक के तीन पात। और करात साहब को पाँच साल बाद जाकर यह ज्ञान हासिल हुआ है कि गरीबों के नाम पर चलने वाली योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को छूट देने के कारण महंगाई बढ़ रही है… वाह क्या बात है? लगता है यूपीए की समन्वय समिति की बैठक में सोनिया गाँधी इन्हें मौसम का हाल सुनाती थीं, और बर्धन-येचुरी साहब मनमोहन को चुटकुले सुनाने जाते थे। तीसरे मोर्चे की “बासी कढ़ी में उबाल लाने” का नया फ़ण्डा इनकी खुद की जमीन धसकने से बचाने का एक शिगूफ़ा मात्र है। इनके पाखंड की रही-सही कलई तब खुल गई जब इनके “विदेशी मालिक” यानी चीन ने तिब्बत में नरसंहार शुरु कर दिया। दिन-रात गाजापट्टी-गाजापट्टी, इसराइल-अमेरिका का भजन करने वाले इन नौटंकीबाजों को तिब्बत के नाम पर यकायक साँप सूंघ गया।
इन पाखंडियों से पूछा जाना चाहिये कि –
1) स्टॉक न होने के बावजूद चावल का निर्यात जारी था, चावल निर्यात कम्पनियों ने अरबों के वारे-न्यारे किये, तब क्या ये लोग सो रहे थे?
2) तेलों और दालों में NCDEX और MCX जैसे एक्सचेंजों में खुलेआम सट्टेबाजी चल रही थी जिसके कारण जनता सोयाबीन के तेल में तली गई, तब क्या इनकी आँखों पर पट्टी बँधी थी?
3) आईटीसी, कारगिल, AWB जैसे महाकाय कम्पनियों द्वारा बिस्कुट, पिज्जा के लिये करोड़ों टन का गेंहूं स्टॉक कर लिया गया, और ये लोग नन्दीग्राम-सिंगूर में गरीबों को गोलियों से भून रहे थे, क्यों?
जब सरकार की नीतियों पर तुम्हारा जोर नहीं चलता, सरकार के मंत्री तुम्हें सरेआम ठेंगा दिखाते घूमते हैं, तो फ़िर काहे की समन्वय समिति, काहे का बाहर से मुद्दा आधारित समर्थन? लानत है…। आज अचानक इन्हें महंगाई-महंगाई चारों तरफ़ दिखने लगी है। ये निर्लज्ज लोग महंगाई के खिलाफ़ प्रदर्शन करेंगे? असल में यह आने वाले चुनाव में संभावित जूते खाने का डर है, और अपनी सर्वव्यापी असफ़लता को छुपाने का नया हथकंडा…
Suresh Chiplunkar
http://sureshchiplunkar.blogspot.com