11 April 2010

!वो बचपन याद आता है!

आज भी मुझे अपना वो बचपन याद आता है,
खेलते थे जहाँ क्रिकेट, वो आँगन याद आता है..
बचपन के उन यारों को मैं भूला नहीं,
ये सावन के बाद पेड़ों से हट जाने वाला झूला नहीं...

नए खिलोने देख कर, पुराने भूलना याद आता है,
माँ कि लोरियां सुनके सो जाना याद आता है..
वो नानी कि परियों की कहानी मैं अभी भूला नहीं,
भोर में पंछियों का वो चहचहाना याद आता है..

वो शरारतों के बाद, डर जाना याद आता है,
माँ के पहलू में फिर, छुप जाना याद आता है..
वो आँगन की मिटटी की खुशबू अभी भूला नहीं,
ऐसा तो कोई नहीं, जो यादों में झूला नहीं..

वो छोटी छोटी बात पर, रूठ जाना याद आता है,
माँ का तब प्यार से, वो मानना याद आता है...
पापा की प्यार भरी मार अभी भूला नहीं,
आंसुओं में तब गीला होना याद आता है..

बात बात में दोस्तों से हुई लड़ाई याद है मुझे,
फिर ये सब भूल कर ली हर अंगड़ाई याद है मुझे..
वो बचपन की गलियों का हर तराना याद आता है,
दोस्ती का, नाराज़गी का हर फ़साना याद आता है....

06 April 2010

साप्‍तहिक वंदेमातरम् पत्रिका मे - प्रमेन्‍्द्र प्रताप सिंह और मिथलेश दूबे

पाक्षिक पत्रिका वंदेमातरम् के अप्रेल अंक मे दो ब्‍लागरो के आलेक छपे है जिन्‍हे आप बड़ा कर पढ़ सकते है -


30 March 2010

कांग्रेस क्या फासीवाद की फोटो कोपी बन चुकी है…….

हाल हीं मैं वर्ली सी लिंक के उद्घाटन के बाद कांग्रेस के मुख्यमंत्री तक ने जिस तरह का व्यवहार अमिताभ जैसे सितारे के साथ किया है वो क्या फासीवादी चरित्र का एक नायाब नमूना नहीं है……इसे दोनों ही संदर्भों मैं देखा जा सकता है….एक तो हमारे भोंदू युवराज से मित्रता के चलते शाहरूख खान की फिल्म के रिलीज के लिए पूरा सरकारी तंत्र यूं लग जाता है जैसे बंबई पर हमला होने वाला है…..(इस मौके का फायदा उठाकर भले ही आतंकवादी कहीं ओर अपना काम अंजाम दे जाते है)….वहीं सदी के निर्विवाद सितारे को बदनाम करने की पूरी चेष्टा कांग्रेस द्वारा की जा रही है…..

दूसरी ओर अमिताभ बच्चन का अपमान इसलिए किया जा रहा है कि उन्होने गुजरात का ब्रांड एंबेसडर बनना स्वीकार किया….क्या गुजरात पाकिस्तान का हिस्सा है…..क्या गुजरात मैं सरकारी तंत्र भ्रष्ट है…..क्या गुजरात मैं रोजाना भारत विरोधी प्रदर्शन होते हैं……क्या गुजरात मैं चुनी हुई सरकार नहीं है……देश के आजाद होने के बाद से इस तरह की अस्पृश्यता की फासीवादी मिसाल कहीं भी नहीं मिलेगी……कांग्रेस ने जितनी झख गुजरात के चुनाव के दौरान मारी इतनी और भी मारे तो भी देश और विशेष कर गुजरात की जनता इस तरह के कृत्यों को माफ नहीं करती है…….यदि गुजरात के मुख्यमंत्री को सांप्रदायिक माना जा रहा है तो बरेली के दंगों के दौरान मुख्यमंत्री के संदिग्ध चरित्र के बारे मैं कांग्रैस क्यों नहीं बोल रही है…..कुल मिलाकर देश की जनता के सामने कांग्रेस की ये घृणा की राजनीति धीरे धीरे सामने आ रही है…….पर हिंदुस्तान के लोकतंत्र की सरकार चलाने वाली पार्टी का ये चरित्र निश्चित ही दौगला है……

अभिषेक बच्चन को अर्थ आवर कार्यक्रम से अलग करना तो कांग्रेस के फासीवादी चरित्र की पराकाष्ठा है……..राजनैतिक अस्पृश्यता की ये अलोकतांत्रिक चाल कांग्रेस को भले ही मुस्लिम कठमुल्लाओं के वोट बैंक पर तो भले ही काबिज करवा दे पर निश्चित रूप से देश की लोगतांत्रिक व्यवस्था को इससे बहुत नुकसान होने वाला है…….कांग्रेस की इस तरह की हरकतों के बाद तो मायावती की माला और मूर्तियां सब सही लगने लगी हैं……शायद भारतीय राजनीति की यही दशा अब होने वाली है…..

21 March 2010

बाटला हाऊस एनकाऊंटर रिपोर्ट….a 2 million dollar question…..

बाटला हाऊस एनकाऊंटर मैं मारे गये दो आतंकवादियों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद से हमारा 6M मीडिया खूब चिल्ल पौं मचाये हुए हे कि और जिसका आधार उन्होने बनाया है कि पोस्ट मार्टम रिपोर्ट मैं ये लिखा हुआ हे कि उन शबों पर ब्लंट औब्जैक्ट से चोट के निशान भी पाये गये हैं…..और इस वजह से सब जोर शोर से इसे एक झूठा एन कांऊंटर बताने मैं लगे हुए हं

यहां कुछ चीजें जो हमारे भी जैहन मैं आई ये ये रिपोर्ट मैं देखकर जो कि हमारे एक मित्र ने यहां छापी है…..कुछ चीजें है जो थोङा सोचने पर आप को मजबूर करेंगी ……..

क्या किसी भी एनकाऊंटर का मीनू फिक्स होता है क्या कि इतनी गोलियां चलानी है….किस किस हथियार से चलानी है…..बंदूक के बट की मारनी है या नहीं….कुल मिलाकर जिस रिपोर्ट को पढकर ऐसी राय जिस किसी ने भी बनाई है….. उसमें कहीं भी ये साबित नहीं होता है कि वो एक फैक एनकाऊंटर था…..ये एक सामान्य सी बात है कि जब कोई हथियार बंद व्यक्ति से पुलिस की मुठभेङ हो रही है तो कोई भी पुलिस वाला अपना कम से कम नुकसान होते हुए सामने वाले को अधिक से अधिक नुकसान हो ऐसा प्रयास करता है….हां उसमें सामान्य तौर पर ये प्रयास जरूर किया जायेगा कि सामने वाले को भी जिंदा पकङा जाये….….सीधी सी बात है कि सुरक्षा बल उनसे अधिक से अधिक जानकारी हासिल करना चाहेंगे…और वे ये भी जानते हैं कि हमारे सैक्यूलर मित्र उनकी तरफ गिदध दृष् गङाये हुए हैं कि ऐसी किसी मुठभेङ मैं कोई गलती हो और हम उनको कठघरे मैं खङे करें……उन आतंकवादियों का पता नहीं पर जो पुलिस अधिकारी वहां कर्तव्य पालन करते हुए शहीद हुआ वो अनेक बार इस तरह की घटनाओं को सफलता पूर्वक झेल चुका था….

हमें ये नहीं भूलना चाहिये कि बाटला हाऊस की इस मुठभेढ मैं एक जांबाज पुलिस अधिकारी शहीद हुआ….उन दो मासूम छात्रों ने पुलिस को देखकर एक प्रशिक्षित व्यक्ति कि तरह अंधाधुंध फायरिंग की वो फायरिंग किसी कलम से नहीं निकल रही थी बल्कि उनके पास आधुनिक हधियार थे……अब तो जामिया मिलिया वाले बतांयेंगे कि वो ऐसी क्या पढाई करवा रहे थे कि उनको इन हथियारों की दरकार पङी….और उनको ये नफासत भरा प्रशिक्षण कहां से मिला…और जहां दनादन गोलियां चल रही हों वहां ये कौन निश्चित करेगा कि हमें कितनी और कब गोलियां चलानी हैं……जयपुर मैं हुए बम विस्फोट का जो हाल ही मैं जो आरोपी पकङा गया है उसने भी स्वीकार किया है कि वो भी बाटला हाऊस मैं ही रुका था……जो ये साबित करता है कि बाटला हाऊस मैं आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाह औऱ हर तरह की सहायता मिलती थी…..

कुल मिलाकर इस रिपोर्ट मैं ऐसा कुछ भी नहीं कि इसके लिए इन लोगों को इतना खुश होने की जरूरत हो…..हां इतना जरूर है कि इस तरह चिल्लाने से कुछ लोग जरूर औऱ गुमराह होंगे…… मार्क्स मुल्ला और माईनो से दबा हुये हमारे शर्म निरपेक्ष मीडिया ने एक शहीदकी शहादत पर कीचङ जो उछाला है वो इनकी नालायकी का गंदा नमुना है……

पर फिर भी ये यक्ष प्रश्न अभी बी वहां खङा हुआ है…….कि वे दो भोले भाले निरीह छात्र बंदुकों के साथ बाटला हाऊस मैं क्या अक्कङ –बक्कङ खेल रहे थे…….हो सकता है अगली बार ये शगुफा भी छोङा जाये कि इंस्पेक्टर शर्मा हार्ट अटैक से मरे जो उनको गोलियों की आवाज सुनने से हो गया था……या के उनके खुद के साथियों ने उनको गोली मार दी…… क्यों कि हमारा शर्म निरपेक्ष मीडिया कुछ भी उङा सकता है….

19 March 2010

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 9 - लास्ट part

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 9

मोल नही कुछ मान मुकुट का,
मोल नही कुछ सिंहासन का .
जीवन अर्पित करने आया,
माटी कर्ज़ चुकाने आया .

याचक बन कर मांग रहा हूँ,
तेरा दुख पहचान रहा हूँ .
लाल जो खेला तेरी गोदी,
डाल दे भारत माँ की गोदी .

तेरा तो घर द्वार क्रांति का,
तू जननी है स्रोत क्रांति का .
कोख पे अपनी कर अभिमान,
पाऊँ शहादत, दे वरदान .

एक पूत का गम मत करना,
सब तरुणों को पूत समझना .
जग में तेरा सदा सम्म्मान,
युगों युगों तक रहेगा मान .

खानदान की रीत निभाई,
राह क्रांति की मैने पाई .
दादा, चाचा, पिता कदम पर,
खून खौलता दीन दमन पर .

माता कर दो अब विदा विदा,
हो जाऊँ वतन पर फ़िदा फ़िदा .
रहे अभागे जो सदा सदा,
खुशियाँ हों उनको अदा अदा .

हर तरफ ध्वनित आजाज हुई,
स्वर भगत कण्ठ हर साज हुई .
भगत सिंह घर घर में छाया,
ब्रिटिश राज भी था घबराया .

वायसराय से माफी मांगें,
भगत लिखित में माफी मांगें .
कमी सजा में हो सकती है,
उनको फाँसी रुक सकती है .

देश प्रेम में मर मिट जाना,
स्वीकार नही, क्षमा माँगना .
हमें मृत्यु भय नही दिखाना,
उसको तो है गले लगाना .

हर सपूत में चाह जगाना,
मर मिटने की राह दिखाना .
जब्ती को है तोड़ गिराना,
चिता साम्राज्यवाद जलाना .

जितने दिन भी जेल रहे थे,
जीत मृत्यु को खेल रहे थे .
पूरे जग को प्रेरित करते,
आजादी में जीवन भरते .

आजादी के वह दीवाने,
देश हेतु मर मिटने वाले .
नहीं किसी से डरने वाले,
अंगारों पर चलने वाले .

कल चक्र पहचान लिया था,
दाम मौत का जान लिया था .
हँस हँस जीवन वार दिया था,
आजादी विश्वास दिया था .

अंतिम इच्छा जब पूछी थी,
अनुरति भगत की बस यही थी . (अनुरति = चाहत)
’जन्म यहीं पर फिर हो मेरा,
सेवा - देश धर्म हो मेरा .’

’दिल से न निकलेगी कभी भी,
वतन की उल्फत मर कर भी .
मेरी मिट्टी से आयेगी,
सदा खुशबू-ए-वतन आयेगी .’

क्रांतिवीर से राज्य डरा था,
युग युग चेतन प्राण भरा था .
आंदोलन का खौफ भरा था,
पतन मार्ग पर अधो गिरा था .

चौबीस को जो तय थी फाँसी,
तेईस मार्च दे दी फाँसी .
संध्या साढ़े सात समय था,
बलिदानों का अमर समय था .

पुण्य पर्व बलिदान मनाया,
हँसते हँसते ताल मिलाया .
झूम रहे थे वह मस्ताने,
संघर्ष क्रांति के परवाने .

बारूद बना कर यौवन को,
अर्पित कर के भारत भू को .
फांसी फंदा गले लगाया,
शोलों को घर घर पहुँचाया .

क्रांति की वेदी पर तर्पण,
यौवन फूलॊं सा कर अर्पण .
हँसते हँसते न्यौछावर थे,
जय इंकलाब के नारे थे .

भारत माँ ने कर आलिंगन,
भाल सजाया रक्तिम चंदन .
कण कण में वह व्याप्त हो गया,
भारत उसका ऋणी हो गया .

गीत सोहले संध्या गाये,
मिलन गीत चंदा ने गाये .
तारे भर ले आये घड़ोली,
सजी चांदनी की रंगोली .

देव उठा कर लाये डोली,
बिखरा सुरभित चंदन रोली .
पुण्यात्मा का कर कर वंदन,
लोप परम सत्ता अभिनंदन .

प्रकृति चकित कर रही थी नाज़,
आकाश मगन बना हमराज .
भूला पवन था करना शोर,
सिंधु भी भूल गया था रोर .

लहरों में आज नही हिलोर,
गम में सूरज, नही है भोर .
देव नमन को भू पर आये,
आँधी तूफाँ शीश झुकाये .

अंग्रजों का मन डोल रहा था,
सर चढ़ कर डर बोल रहा था .
मृत शरीर के कर के टुकड़े,
उसी समय बोरों में भरके,

ले फिरोजपुर वहाँ जलाया,
कुछ लोगों को वहाँ जो पाया,
टुकड़े अधजले सतलज फेंक,
नौ दो ग्यारह हुए अंग्रेज .

देखा पास नजारा आकर,
हैरानी थी टुकड़े पाकर .
ग्रामीणों ने किया सत्कार,
विधिवत किया अंतिम संस्कार .

वीर भगत तुम हममें जिंदा,
वीर भगत तुम सबमें जिंदा .
हर देश भक्त में तुम रहोगे,
जिंदा हो ! जिंदा रहोगे !

स्वतंत्रता संग्राम इतिहास,
नाम भगत सिंह ध्रुव आकाश .
नाम अमर है, अमिट रहेगा,
स्वातंत्र्य वीर अक्षुण्ण रहेगा .

आविर्भाव भारत उत्थान,
आलोकित राष्ट्र भक्ति विहान .
भगत सिंह साश्वत योगदान,
भास्कर शौर्य बलिदान महान .

कवि कुलवंत सिंह

18 March 2010

౫థ్ పిల్లర్

స్టాప్ కొర్రుప్తిఒన్. జాయిన్ ౫థ్ పిల్లర్
విసిత్ వ్వ్వ్.౫థ్పిల్లర్.ఆర్గ్

17 March 2010

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 8

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 8

चले मुकदमें भगत सिंह पर,
और अनेक क्रांतिवीरों पर .
सत्ता ने फाँसी ठानी थी,
मुकदमों को दी रवानी थी .

भगत सिंह का आक्रोश रोष,
क्रांतिवीर का जयनाद जोश .
इंकलाब जिंदाबाद घोष,
आजादी का बना उदघोष .

इतिहास दिवस लो आया था,
निर्णय कोर्ट का लाया था .
जिस दिन की थे बाट जोहते,
दिन दिन गिन कर राह देखते .

घड़ी सुहानी वह आई थी,
बासंती में रंग लाई थी .
सहमी सत्ता ने दी पुकार,
फाँसी की थी उसे दरकार .

कोर्ट फैसला तय था फाँसी,
चौबीस मार्च दे दो फाँसी .
सन एकतीस की यह थी बात
जग रहा भाग्य भारत प्रभात .

क्रांति गतिविधियों में लिप्त थे,
आभा से मुख शौर्य दीप्त थे .
’राजगुरू’, ’सुखदेव’, ’भगत सिंह’,
फांसी लेंगे यह भारत सिंह .

गीत मिलन के तीनों गाते,
हँस हँस कर थे मौत बुलाते .
चोले को बासंती रंग माँ,
देख पुकार रही भारत माँ .

भारत जकड़ा जंजीरों में,
कूद पड़े तब हवन कुण्ड में .
आन बचाने यह भारत सिंह,
राजगुरू, सुखदेव, भगत सिंह .

सभी जुबाँ पर एक कहानी,
क्रांति वीरता भरी जवानी .
फैला जन जन क्रांति ज्वार था,
स्वतंत्रता का ही विचार था .

अभीष्ट पूरा हुआ भगत सिंह,
गर्जन थी अब हर भारत सिंह .
पैदा कर दी हर दिल चाहत,
बिन आजादी मन है आहत .

मात पिता को जेल बुलाया,
बेटे ने संदेश सुनाया .
भगत देश पर होगा शहीद,
पूरी होगी मेरी मुरीद .

दुख का आँसू आँख न लाना,
समय है मेरा मुझको जाना .
पूत आपका हो बलिदानी,
अपने खूँ से लिखे कहानी .

जन्म दिया माँ तुमने मुझको,
शीश नवाऊँ शत शत तुमको .
माता धरती, पिता आकाश,
उनके चरणों स्वर्ग का वास .

माँ तेरा उपकार बड़ा है,
किंतु देश का फ़र्ज़ पड़ा है .
भारत माँ का कर्ज़ बड़ा है,
राष्ट्र बेड़ियों में जकड़ा है .

मचल रहे अरमाँ कुरबानी,
झड़ी लगा दे अपनी जबानी,
दे दे कर आशीष अनेकों,
घड़ी शहादत आयी देखो .

देख देख जग विस्मृत होगा,
पढ़ इतिहास चमत्कृत होगा .
मुझको इतिहास बदलना है,
अब यह साम्राज्य निगलना है .

मोल नही कुछ मान मुकुट का,
मोल नही कुछ सिंहासन का .
जीवन अर्पित करने आया,
माटी कर्ज़ चुकाने आया .

याचक बन कर मांग रहा हूँ,
तेरा दुख पहचान रहा हूँ .
लाल जो खेला तेरी गोदी,
डाल दे भारत माँ की गोदी .

तेरा तो घर द्वार क्रांति का,
तू जननी है स्रोत क्रांति का .
कोख पे अपनी कर अभिमान,
पाऊँ शहादत, दे वरदान .

एक पूत का गम मत करना,
सब तरुणों को पूत समझना .
जग में तेरा सदा सम्म्मान,
युगों युगों तक रहेगा मान .

खानदान की रीत निभाई,
राह क्रांति की मैने पाई .
दादा, चाचा, पिता कदम पर,
खून खौलता दीन दमन पर .

माता कर दो अब विदा विदा,
हो जाऊँ वतन पर फ़िदा फ़िदा .
रहे अभागे जो सदा सदा,
खुशियाँ हों उनको अदा अदा .

कवि कुलवंत सिंह

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 7

शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 7

मुकदमें की जब चली कहानी,
खुद अपनी पैरवी की ठानी .
इंकलाब को देने रवानी,
जन जन क्रांति धूम मचानी .

सोच समझ कर चाल चली थी,
अंग्रेजों को खूब खली थी .
नवज्योति की ज्वाला जली थी,
घर घर में वह फैल चली थी .

भारत भू का कण कण दीपित,
पूर्ण राष्ट्र में क्रांति प्रज्ज्वलित .
भयभीत तिमिर था भाग रहा,
भाग्य भारती का जाग रहा .

अवसर आया सब कहने का,
अपनी बातें दोहराने का .
सकल विश्व को बात सुनाई,
अंग्रेजों की नींद उड़ाई .

भारत में चेतनता लायी,
ज्वालामुखी ने ली अंगड़ाई .
सकल विश्व को किया अचंभित,
सृष्टि देखती थी स्तंभित .

ले हथेली शीश था आया,
नेजे पर वह प्राण था लाया . (नेजे = भाला)
अभिमानी था, झुका नही था,
दृढ़ निश्चय था, रुका नही था .

लहौर जेल में कैदी थे,
क्रांतिकारी कई बंदी थे .
जेल की हालत बद बेहाल,
सुविधायें खाना बुरा हाल .

जेले में ठानी भूख हड़ताल,
बने सत्ता का जी जंजाल .
ऐतिहासिक वह भूख हड़ताल,
सबसे लंबी भूख हड़ताल .

चौंसठ दिन का वह अनशन था,
सरकार को झुकना पड़ा था .
अनशन में साथी को खोया,
जतिनदास पर जग था रोया .

पुण्य धरा पर अर्ध्य चढ़ाकर,
कुरबानी का रक्त चढ़ाकर .
अख्ण्ड रोष का नाद सुनाकर,
यौवन को भूचाल बनाकर .

देश भक्ति का रंग लगाकर,
प्रेम बीज से पेड़ उगाकर .
निज यौवन को लपट बनाकर,
जीवन को संग्राम बनाकर .

स्वतंत्र भू का स्वप्न सजाकर,
प्रचन्ड अग्नि तन मन लगाकर,
माटी खुशबू श्वास बसाकर,
प्राणों को रथ प्रलय बनाकर .

पीड़ा को आघात बना कर,
क्रूर काल को ग्रास बनाकर,
पराधीनता चिता सजाकर,
विजय पताका भू लहराकर .

घर घर में सिंह भगत समाया,
हर जुबां पर नाम वह आया .
सत्ता सहम गई थी डर से,
शासन उखड़ गया था जड़ से .

नाम भगत सिंह जब जब आता,
रोम रोम संचार वीरता .
सत्ता थर थर थी थर्राई,
भगत सिंह से थी घबराई .

भगत भाई कुलबीर सिंह थे,
भगत सिंह जब जेल बंद थे,
कुलबीर ने दिखाये रंगे थे,
गतिविधियां देख सभी दंग थे .

’नौजवान भारत सभा’ भार,
अपने कंधों पर लिया भार .
खूब निभाई जिम्मेदारी,
लोहा लेने की थी बारी .

गोरों का इक समारोह था,
किंगा जार्ज पर उत्सव था .
पूरे शहर की बिजली काटी,
समारोह को जगमग बाँटी .

कुलबीर का आक्रोश भड़का,
वह भाई भगत की राह चला .
उत्सव की बिजली को रोका,
दस वर्ष की जेल को भोगा .

कवि कुलवंत सिंह