पाचं
सौ साल पहले हमारे देश मे धर्म की बड़ी हानि हो गई थी। राजा निर्दयी बन
बैठै थे। प्रजा को दुख देते थे। लोगो के दिलों मे एक-दूसरे के लिए प्यार
नही रहा था। जहां प्यार नहीं वहां धर्म नही। जहां धर्म नही, वहां सुख नही।
इसलिए सब लोग दुखी थे।
ऐसे समय मे एक बालक पैदा हुआ। यह बालक बड़ा होकर
गुरू नानक कहलाया। गुरू नानक ने लोगो का धर्म के रास्ते पर डाला, धर्म को
कोरा दिखावा करनेवालों को लज्जित किया और कठोर बर्ताव करनेवाले राजाओ से
प्रजा को ऐसे बचाया, जैसे बाप अपने बेटों को बचाता है।
उस जमाने मे
दिल्ली मे लोदी-वंश का एक राजा राज करता था, जिसे लोग सुलतान कहते थे। इस
सुलतान के अधीन कई राजे थे। इनमे से एक पंजाब पर राज करता थां लोग उसे नवाब
कहते थे। वह नवाब भी लोदी घराने का ही था। वह सुलतानपुर नामक अपनी राजधानी
मे रहता था। इस नवाब के हाथ मे पंजाब मे कई-एक छोटे-बड़े राजे थे। लाहौर
से कोई चालीस मील रावी के किनारे, इसी तरह का पच्चीस गांवों का एक राजा
थां। इस राजा का नाम रायबुलार था। यह रावी से थोड़ी दूर, तलवंडी नामक गांव
मे रहता था। इसी गांव मे उसका एक हाकिम भी रहता था। इदस हाकिम का पूरा नाम
मेहता कल्याणदास था, पर लोग उसे मेहता कालू या मेहता या सिर्फ कालू कहकर
पुकारते थे। इसी मेहता के घर १५ अप्रैल, सन १४६९ के दिन नानक का जन्म हुआ।
जैसे-जैसे
बालक बड़ा होता गया, लोगो को पता लगता गया कि इसकी कई बातें दूसरे बालकों
से निराली है। वह बड़ा हंसमुख था। कहते है, पैदा होते ही हंसने लगा था। जब
पढने लगा तो सब-कुछ इतनी जल्दी सीख गया, मानों उसने पहले ही से सब-कुछ
पढ-लिख रखा हो! फिर एक संस्कृत पंडित के पास पढ़ने लगा। उस पंडित से भी इस
अनोखे विद्यार्थी ने बड़ी जल्दी संस्कृत सीख ली। फिर भी सीखने की उसकी भूख न
मिटी। बाद मे यह एक विद्वान मुल्ला से फारसी पढने लगा। वहां भी उसने बड़ी
योग्यता दिखाई।
जब बालक नानक किसी आते-जाते साधु-संत को देखता तो उसकी आंखे उसे एक टक निहारती रह जाती। वह उसके पीछें-पींछें दूर तक चला जाता।
सोलह बरस के होते-होते नानक ने अपने संगियों का साथ छोड़ दिया।कई-कई दिन जंगलों मे घूमते रहते। भूख-प्यास की परवा न करते। घर मे गुम-सुम रहते। पिता को लगा, बेटा बीमार है। उन्होने एक हकीम को बुलाया, पर हकीम के करने को वहां था क्या?
कुछ दिनों बाद यह दशा बदल गई। उदासी की जो घटांएं छा गई थी, वे छितरा गई। पिता प्रसन्न हुए कि बेटा अब भला-चंगा हो गया। उन्होने सोचा कि अब इसे किसी रोजगार के लिए कुछ काम-काज सीख जाय तो फिर इसका विवाह कर दें।
यह सोचकर उन्होने नानक को कुछ रूपए दिये ओर कहा कि जाओं, कोई लाभ का सौदा करों। एक समझदार आदमी को उनके साथ कर दिया।
तलवंडी से कुछ दूर जंगल में दोनो जने चले जा रहे थे कि कुछ साधु-संत मिले। नानक को साधुओं से लगाव तो था ही। वह उनसे बात-चीत करने लगे। बातों-बातों मे मालूम हुआ कि ये साधु दस-बारह दिनो से भूखे है। साधुओं के मना करने और साथी के रोकने पर भी नानक ने बीस रूपए साधुओ के खाने-पीने मे खर्च कर दिये। उन्होने सोचा कि भूखों का भोजन कराने से बढ़कर ज्यादा लाभ की बात और क्या हो सकती है! यह सौदा ही सच्चा सौदा है।
सारे रूपए इस तरह खर्च करके दोनो साथी घर की ओर चल पड़े। गांव के पास आकर नानक पिता के डर से घर नही गए और गांव के बाहर ही रात काट दी। पर साथी ने दूसरे दिन उनके पिता को सारी बात कह सुनाई। पिता के क्रोध का ठिकाना न रहा। वह उसी समय भागे-भागे बेटे के खबर लेने चले।
उधर नानक की बड़ी बहन नानकी को पता लगा कि पिता गुस्से मे भरे हुए भाई के पास जा रहे है। वह भी पिता के पीछे चल पड़ी।वहां जाकर वह पिटते हुए भाई से लिपट गई और इस प्रकार उसे बचाने मे उसने बड़ी मदद की।
पिता को मालूम हुआ, पर उन्होने बेटे से कुछ न कहा। वह गहरी चिंता मे डूब गए। एक दिन नानकी अपने पिता के घर आई। उसने पिता को चिंता मे डूबे देखा। पिता को भले ही बेटा नालायक दीख पड़े, पर बहनों के लिए तो भाई कभी नालायक नही होता। उसने पिता से हा, "अगर आप आज्ञा दें तो मै भाई को अपने साथ सुलतानपुर ले ला जाऊ। वहां कोई-न-कोई काम-काज मिल ही जायेगा।"
पिता मान गए और नानकी अपने भाई को खुशी-खुशी सुलतानपुर ले आई। वहां के एक बड़े हाकिम की मदद से नानक को नवाब के भंडार मे जगह मिल गई।
उस समय लगान पैसों के रूप मे नही लिया जाता था, उसे अनाज के रूप मे वसूल किया जाता था। जब फसलें तैयार होती थी तो राजा हर किसान की फसल मे से अपना हिस्सा वसूल करकें भंडार मे जमा कर लेता था। इसी में से सिपाहियों और हाकिमो को जरूरत के हिसाब से अनाज दे दिया जाता था। भंडार इसका पूरा-पूरा हिसाब रखता था और राजा के पूछने पर पूरा-पूरा हिसाब बताता था। यही काम नानक को मिला थां।
इसके कुछ दिन बाद नानक का विवाह हो गया। उस समय उनकी उमर उन्नीस साल की थी। नानक के पिता ने उनकी देखभाल के लिए अपने गांव से मरदाना नामक एक सेवक भेज दिया। इन दोनो का एक विचित्र संयोग था। जब तक नानक जीवित रहे, वह ओर मरदाना एक सीप के दो मोतियों की तरह रहे।
नानक के दो पुत्र हुए। बड़े पुत्र श्रीचंद संन १४९४ में पैदा हुएं। बड़े होकर यह ऊंचे महात्मा हुए। यह उत्तरी भारत के कोन-कोने मे घूमते रहे। इनकी उमर इतनी लंबी थी कि लोग समझने लगे थे कि वह जबतक चाहें, जिंदा रह सकते है। वह जगह-जगह जाकर दीन-दुखियों को धीरज बंधाते थे।


