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29 February 2008

विदुला के वाक्य

विदुला का एक ही पुत्र था और वह भी युध्द में लड़ने गया था। माता विदुला बड़ी प्रसन्न थी। उसे इस बात पर बड़ा गर्व था कि भले ही उसकी कोख से एक पुत्र जन्मा, लेकिन जब युध्द का अवसर आया तो वह घर में बैठा नहीं रहा। वह दूसरे वीरों के साथ खुशी-खुशी उससे आज्ञा लेकर अपने शस्त्र सहित युध्द क्षेत्र की ओर तेजी से बढ़ गया। कई दिन बाद जब उसका पुत्र घर वापस आया तो माता विदुला यह सुनकर बड़ी दु:खी हो उठी कि उसका बेटा तो शत्रु सेना से हारकर युध्द भूमि से भाग आया है। तब वह क्रुध्द सिंहनी की तरह अपने उस भगोड़े पुत्र को कहने लगी, 'अरे कायर! तू पराजित-अपमानित होकर भाग आया! तुझे धिक्कार है। उस युवक को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसे लगा कि 'मैं सोचता था कि मेरे जीवित लौट आने से मां प्रसन्न होकर मेरी बलैया लेगी, किन्तु यह तो उल्टे मुझे ही धिक्कार रही है' अत: उसने मां से कहा, 'माता! क्या तुम चाहती हो कि मैं युध्द में लड़ते-लड़ते ही मारा जाऊं! क्यों मां! क्या तुम मेरे मरने से ही सुखी होतीं?' माता विदुला पुन: गुस्से में कह उठी, 'अरे! कायर! शत्रु को पीठ दिखाकर चले आने से तो अच्छा होता कि तू मेरी कोख से जन्मते ही मर जाता- तो आज मुझे आस-पड़ोस के लोगों से ये शब्द तो नहीं सुनने पड़ते, जो आज मुझे सुनने पड़ रहे हैं! अगर तुझमें मेरे दूध की लाज बचाने की कुछ आन है तो जा, अभी ये सब शस्त्रास्त्र उठाकर युध्द-भूमि में लौट जा और शत्रुओं से फिर युध्द कर। मेरी प्रसन्नता और तेरे पुरुष होने की सार्थकता इसी में है।' माता की इस वाणी ने पुत्र को उकसाया, उत्तेजना दी और सही दिशा दी। वह अपने शस्त्रास्त्र उठाकर शत्रु से जूझने के लिए तेजी से लौट पड़ा और फिर वह एक दिन विजयी होकर ही माता विदुला की चरण वन्दना करने घर लौटा। लोकमान्य तिलक माता विदुला के उक्त शब्द कभी नहीं भूले।  

 

  • सुनी-सुनाई

30 November 2007

अस्तित्‍व की खोज

जल की एक बूँद किसी प्रकार समुद्र के अथाह जल के पास पहुँची ओर उसमें घुलने लगी तो बूँद ने समुद्र से कहा – “मुझे अपने अस्तित्‍व को समाप्‍त करना मेरे लिये सम्‍भव नही होगा।, मै अपनी सत्‍ता खोना नही चाहती।”

समुद्र ने बूँद को समझाया-“तुम्‍हारी जैसी असंख्‍य बूँदों का समन्‍वय मात्र ही तासे मैं हूँ। तुम अपने भाई बहनों के साथ ही तो घुल‍ मिल रही हो। उसमें तुम्‍हारी सत्ता कम कहाँ हुई, वह तो और व्यापक हो गई है।”

बूँद को समु्द्र की बात पर संतोष नही हुआ और वह अपनी पृथक सत्ता की बात करती रही, और वार्त्ता के दौरान ही वह सूर्य की पंचड गर्मी के कारण वह वाष्‍प बन गई और कुछ देर बाद पुन: बारिस की बूँद के रूप में समुद्र के दरवाजें पर पहुँची। उसे अपनी ओर आता देख समुद्र तो समुद्र ने कहॉं कि- “बच्‍ची अपनी पृथक सत्‍ता बनाऐ रहकर भी तुम अपने स्वतंत्र अस्तित्‍व की रक्षा कहाँ कर सकीं? अपने उद्गम को समझो, तुम समष्टि से उत्‍पन्‍न हुई थीं अैर उसी की गोद में ही तुम्‍हें चैन मिलेगा।“

23 November 2007

जय गुरू नानक देव

कार्तिक पूर्णिमा के दिन स्‍नान का हिन्‍दू धर्म में बड़ा महात्‍व होता है। प्रात: काल से ही हिन्‍दू धर्म के अनुयायी विभिन्‍न नदियों में स्‍नान करते है। इसी पुण्‍य तिथि के दिन सिक्‍ख पंथ के संस्थापक एवं प्रथम गुरू नानक देव जी का जन्‍म दिवस है। इनका जन्‍म अखंड भारत के ननकाना पंजाब प्रान्‍त में हुआ था जो आज पकिस्‍तान में है। इनके विषय में कहा जाता है कि जन्‍म होते ही ये हँस पडे थे। गुरू नानक जी को पंजाबी, संस्‍कृत, एवं फारसी का ज्ञान था। बचपन से ही इनके अंदर आध्‍यत्‍म और भक्ति भावना का संचार हो चुका था। और प्रारम्‍भ से ही संतों के संगत में आ गये थे। विवाह हुआ तथा दो संतान भी हुई, किन्‍तु पारिवारिक माह माया में नही फँसे। वे कहते थे “जो ईश्‍वर को प्रमे से स्‍मरण करे, वही प्‍यारा बन्‍दा”। हिन्‍दू मसलमान दोनो ही इनके शिष्‍य बने। देश-विदेश की यात्रा की, मक्‍का गये। वहॉं काबा की ओर पैर कर के सो रहे थे। लोग इनकी यह बात देख कर नाराज हो गयें, और इनके पैर को उठाकर दूसरी ओर कर दिया किन्‍तु जिधर पैर करते उधर ही काबा हो जाता। जब वे बगदाद पहुँचे तो वहॉं का खलीफा जनता का शोषण कर अपार धर जमा किये हुये थे। इन्‍होने कंकड़-पत्‍थर इकट्ठे कर खलीफा से पूछा क्‍यो मेरे द्वारा इन पत्‍थरों से तुझे मार दिये जाने पर क्‍या यह सब धन तेरे साथ उपर जायेगा ? खलीफा की बुद्धि ठिकाने आ गई और उसने जनता पर अत्‍याचार बंद कर दिया। प्रिय शिष्‍य भाई लहणा को अंग से लगाया तो लहण अंगद देव बन गये उन्‍ही को गरू की गद्दी पर बिठाया। 70 वर्ष की आयु में स्‍वर्ग धाम को चले गयें। सभी को कार्तिक पूर्णिमा व श्री गुरूनानक देव जंयती पर हार्दिक सुभकानाऍं।

02 November 2007

क्‍या मॉं की प्‍यास पुत्र के रूधिर से बुझेगी?

श्री जगदगुरू आदि शंकराचार्य जी हिमालय के तीर्थो की यात्रा कर रहे थे। देवप्रयाग, विष्‍णु प्रयाग, आदि के दर्शन के बाद वह श्रीनगर पहुँचे। महिषमर्दिनी चामुंडा के दर्शन के दौरान उन्‍हे पंडि़तों ने बताया कि कुछ पाखंड़ी तांत्रिकों ने मनमाने ढ़ंग से नरबलि तथा पशु बलि की प्रथा के समर्थन में तर्क देकर भ्रम पैला रखा है। जब आदि शंकराचार्य जी ने यह सुना तो, उन्‍हे बहुत दुख हुआ। उन्‍हें लगा कि बलि प्रथा के खिलाफ कुछ करना चाहिए। उन्‍होंने बलि समर्थक तांत्रिकों को शस्‍त्रार्थ की चुनौती दी। कुछ पर्वतीय तांत्रिक उनके समक्ष शास्‍त्रार्थ के लिये उपस्थित हुए। आदि शंकराचार्य ने उनहें भागवत पुराण तथा अन्‍य धर्मशास्‍त्रों के कई उदाहरण दिए। तांत्रिकों को समझाया और यह सवाल उठाया, “देवी तो सकल सृष्टि व प्राणियों की जननी है। वह अपनी ही संतान का रूधिर पान कर संतुष्‍ट कैसे हो सकती है?” आदि शंकराचार्य के तर्को के समक्ष तांत्रिक निरूत्‍तर हो गए। जिस शिलाखंड पर बलि दी जाती थी, उसे तत्‍काल उखाड़कर नदी फेक दिया गया।

तनिक आप भी विचार करें क्‍या किसी माँ की प्‍यास अपने पुत्र के रूधिर से बुझेगी? इस प्रकार के कुकर्म से बचने का कष्‍ट करें।