22 February 2008

मुम्बई के डिब्बेवालों, तिरुपुर और नमक्कल से हम कोई सबक लेंगे?

कुछ समय पहले एक प्रतिष्ठित आईआईएम के निदेशक बड़े गर्व से टीवी पर बता रहे थे कि उनके यहाँ से 60 छात्रों का चयन बड़ी-बड़ी कम्पनियों में हो गया है (जाहिर है कि मल्टीनेशनल में ही)…एक छात्र को तो वार्षिक साठ लाख का पैकेज मिला है और दूसरे को अस्सी लाख वार्षिक का…। लेकिन यहाँ सवाल उठता है कि इतना वेतन लेने वाले ये मैनेजर आखिर करेंगे क्या? मल्टीनेशनल कम्पनियों के लिये शोषण के नये-नये रास्ते खोजने का ही… जो कम्पनी इन्हें पाँच लाख रुपये महीना वेतन दे रही है, जाहिर है कि वह इनके “दिमाग”(?) के उपयोग से पचास लाख रुपये महीना कमाने की जुगाड़ में होगी, अर्थात ये साठ मेधावी छात्र आज्ञाकारी नौकर मात्र हैं, जो मालिक के लिये कुत्ते की तरह दिन-रात जुटे रहेंगे।

इन साठ छात्रों का चयन भारत के बेहतरीन मैनेजमेंट इन्स्टीट्यूट में तब हुआ जब वे लाखों के बीच से चुने गये, इनके प्रशिक्षण और रहन-सहन पर इस गरीब देश का करोड़ों रुपया लगा। लेकिन क्या सिर्फ़ इन्हें बहुराष्ट्रीय (या अम्बानी, टाटा, बिरला) कम्पनियों के काम से सन्तुष्ट हो जाना चाहिये? क्या ये मेधावी लोग कभी मालिक नहीं बनेंगे? क्या इनके दिमाग का उपयोग भारत के फ़ायदे के लिये नहीं होगा? इनमें से कितने होंगे जो कुछ सैकड़ों लोगों को ही रोजी-रोटी देने में कामयाब होंगे? यदि भारत के बेहतरीन दिमाग दूसरों की नौकरी करेंगे, तो नौकरी के अवसर कौन उत्पन्न करेगा? दुर्भाग्य की बात यह है कि मैनेजमेंट संस्थानों से निकलने वाले अधिकतर युवा “रिस्क” लेने से घबराते हैं, वे उद्यमशील (Entrepreneur) बनने की कोशिश नहीं करते।

अब तस्वीर का दूसरा पक्ष देखिये। रिलायंस, अम्बानी, टाटा, बिरला, मित्तल का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन कितने लोग तिरुपुर या नमक्कल के बारे में जानते हैं? तिरुपुर, तमिलनाडु के सुदूर में स्थित एक कस्बा है, जहाँ लगभग 4000 छोटे-बड़े सिलाई केन्द्र और अंडरवियर/बनियान बनाने के कुटीर उद्योग हैं। उनमें से लगभग 1000 इकाईयाँ इनका निर्यात भी करती हैं। पिछले साल अकेले तिरुपुर का निर्यात 6000 करोड़ रुपये का था, जो कि सन 1985 में सिर्फ़ 85 करोड़ था। इन छोटी-छोटी इकाईयों और कारखानों की एक एसोसियेशन भी है तिरुपुर एक्सपोर्टर एसोसियेशन। लेकिन सबसे खास बात तो यह है कि दस में से नौ कामगार खुद अपनी इकाई के मालिक हैं, वे लोग पहले कभी किसी सिलाई केन्द्र में काम करते थे, धीरे-धीरे खुद के पैरों पर खड़ा होना सीखा, बैंक से लोन लिये और अपनी खुद की इकाई शुरु की। तिरुपुर कस्बा अपने आप में एक पाठशाला है कि कैसे लोगों को उद्यमशील बनाया जाता है, कैसे उनमें प्रेरणा जगाई जाती है, कैसे उन्हें काम सिखाया जाता है। इनमें से अधिकतर लोग कभी किसी यूनिवर्सिटी या मैनेजमेंट संस्थान में नहीं गये, इनके पास कोई औपचारिक डिग्री नहीं है, लेकिन ये खुद अपना काम तो कर ही रहे हैं दो-चार लोगों को काम दे भी रहे हैं जो आगे चलकर खुद मालिक बन जायेंगे।

जाहिर सी बात है कि अधिकतर कामगार/मालिक अंग्रेजी नहीं जानते, लेकिन फ़िर भी वैश्विक चुनौतियों का वे बखूबी सामना कर रहे हैं, रेट्स के मामले में भी और ग्राहक की पसन्द के मामले में भी। पश्चिमी देशों के मौसम और डिजाइन के अनुकूल अंडर-गारमेण्ट्स ये लोग बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर निर्यात करते हैं। इन्हीं में से एक पल्लानिस्वामी साफ़ कहते हैं कि “जब वे बारहवीं कक्षा में फ़ेल हो गये तब वे इस बिजनेस की ओर मुड़े…”। आज की तारीख में वे एक बड़े कारखाने के मालिक हैं, उनका 20 करोड़ का निर्यात होता है और 1200 लोगों को उन्होंने रोजगार दिया हुआ है। वे मानते हैं कि यदि वे पढ़ाई करते रहते तो आज यहाँ तक नहीं पहुँच सकते थे। और ऐसे लोगों की तिरुपुर में भरमार है, जिनसे लक्स, लिरिल, रूपा आदि जैसे ब्राण्ड कपड़े खरीदते हैं, अपनी सील और पैकिंग लगाते हैं और भारी मुनाफ़े के साथ हमे-आपको बेचते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि आईआईएम और उनके छात्रों ने देश में ऐसे कितने तिरुपुर बनाये हैं?

मुम्बई के डिब्बेवालों की तारीफ़ में प्रिंस चार्ल्स पहले ही बहुत कुछ कह चुके हैं, उनकी कार्यप्रणाली, उनकी कार्यक्षमता, उनकी समयबद्धता वाकई अद्भुत है। मजे की बात तो यह है कि उनमें से कई तो नितांत अनपढ़ हैं, लेकिन मुम्बई के सुदूर उपनगरों से ठेठ नरीमन पाइंट के कारपोरेट दफ़्तरों तक और वापस डिब्बों को उनके घर तक पहुँचाने में उनका कोई जवाब नहीं है। अब कई मैनेजमेंट संस्थान इन पर शोध कर रहे हैं, लालू भी इनके मुरीद बन चुके हैं, लेकिन इनका जीवन आज भी वैसा ही है। इनकी संस्था ने हजारों को रोजगार दिलवाया हुआ है, खाना बनाने वालों, छोटे किराना दुकानदारों, गरीब बच्चों, जिन्हें कोई बड़ा उद्योगपति अपने दफ़्तर में घुसने भी नहीं देता। आईआईएम के ही एक छात्र ने चेन्नई में अपना खुद का केटरिंग व्यवसाय शुरु किया, शुरु में सिर्फ़ वह इडली बनाकर सप्लाई करते थे, आज उनके पास कर्मचारियों की फ़ौज है और वे टिफ़िन व्यवसाय में जम चुके हैं, लेकिन उनकी प्रेरणा स्रोत थीं उनकी माँ, जिन्होंने बेहद गरीबी के बावजूद अपने मेधावी बेटे को आईआईएम में पढ़ने भेजा, लेकिन सवाल यही है कि ऐसा कदम कितने लोग उठाते हैं?

एक और उदाहरण है नमक्कल का। जाहिर है कि इसका नाम भी कईयों ने नहीं सुना होगा। नमक्कल के 3000 परिवारों के पास 18000 ट्र्क हैं। भारत के 70% टैंकर व्यवसाय का हिस्सा नमक्कल का होता है। चकरा गये ना !! तिरुपुर की ही तरह यहाँ भी अधिक पढ़े-लिखे लोग नहीं हैं, ना ही यहाँ विश्वविद्यालय हैं, न ही मैनेजमेंट संस्थान। लगभग सभी टैंकर मालिक कभी न कभी क्लीनर थे, किसी को अंग्रेजी नहीं आती, लेकिन ट्रक के मामले में वे उस्ताद हैं, पहले क्लीनर, फ़िर हेल्पर, फ़िर ड्रायवर और फ़िर एक टैंकर के मालिक, यही सभी की पायदाने हैं, और अब नमक्कल ट्रकों की बॉडी-बिल्डिंग (ढांचा तैयार करने) का एक बड़ा केन्द्र बनता जा रहा है। एक समय यह इलाका सूखे से लगातार जूझता रहता था, लेकिन यहाँ के मेहनती लोगों ने पलायन करने की बजाय यह रास्ता अपनाया।

पहले उन्होंने हाइवे पर आती-जाती गाड़ियों पर कपड़ा मारने, तेल-हवा भरने का काम किया, फ़िर सीखते-सीखते वे खुद मालिक बन गये। आज हरेक ट्रक पर कम से कम तीन लोगों को रोजगार मिलता है। एक-दो को देखकर दस-बीस लोगों को प्रेरणा मिलती है और वह भी काम पर लग जाता है, ठीक तिरुपुर की तरह। यह एक प्रकार का सामुदायिक विकास है, सहकारिता के साथ, इसमें प्रतिस्पर्धा और आपसी जलन की भावना तो है, लेकिन वह उतनी तीव्र नहीं क्योंकि हरेक के पास छोटा ही सही रोजगार तो है। और यह सब खड़ा किया है समाज के अन्दरूनी हालातों के साथ लोगों की लड़ने की जिद ने, न कि किसी आईआईएम ने। यही नहीं, ऐसे उदाहरण हमें समूचे भारत में देखने को मिल जाते हैं, चाहे वह कोयम्बटूर का वस्त्रोद्योग हो, सिवाकासी का पटाखा उद्योग, लुधियाना का कपड़ा, पटियाला का साइकिल उद्योग हो (यहाँ पर मैंने “अमूल” का उदाहरण नहीं दिया, वह भी सिर्फ़ और सिर्फ़ कुरियन साहब की मेहनत और सफ़ल ग्रामीण सहकारिता का नतीजा है)।

मोटी तनख्वाहें लेकर संतुष्ट हो जाने और फ़िर जीवन भर किसी अंग्रेज की गुलामी करने वालों से तो ये लोग काफ़ी बेहतर लगते हैं, कम से कम उनमें स्वाभिमान तो है। लेकिन जब मीडिया भी अनिल-मुकेश-मित्तल आदि के गुणगान करता रहता है, वे लोग भी पेट्रोल से लेकर जूते और सब्जी तक बेचने को उतर आते हैं, “सेज” के नाम पर जमीने हथियाते हैं, तो युवाओं के सामने क्या आदर्श पेश होता है? आखिर इतनी पूंजी का ये लोग क्या करेंगे? एक ही जगह इतनी ज्यादा पूंजी का एकत्रीकरण क्यों? क्या नीता अम्बानी को जन्मदिन पर 300 करोड़ का हवाई जहाज गिफ़्ट में देना कोई उपलब्धि है? लेकिन हो यह रहा है कि कॉलेज, संस्थान से निकले युवक की आँखों पर इन्हीं लोगों के नामों का पट्टा चढ़ा होता है, वह कुछ नया सोच ही नहीं पाता, नया करने की हिम्मत जुटा ही नहीं पाता, उसकी उद्यमशीलता पहले ही खत्म हो चुकी होती है। इसमें अपनी तरफ़ से टेका लगाते हैं, मैनेजमेंट संस्थान और उनके पढ़े-लिखे आधुनिक नौकर। जबकि इन लोगों को तिरुपुर, नमक्कल जाकर सीखना चाहिये कि स्वाभिमानी जीवन, लाखों की तनख्वाह से बढ़कर होता है…। जो प्रतिभाशाली, दिमागदार युवा दूसरे के लिये काम कर सकते हैं, क्या वे दो-चार का समूह बनाकर खुद की इंडस्ट्री नहीं खोल सकते? जरूर कर सकते हैं, जरूरत है सिर्फ़ मानसिकता बदलने की…

20 February 2008

नाथूराम गोड़से का अस्थि कलश विसर्जन अभी बाकी है

गत 30 जनवरी को महात्मा गाँधी के अन्तिम ज्ञात (?) अस्थि कलश का विसर्जन किया गया। यह “अंतिम ज्ञात” शब्द कई लोगों को आश्चर्यजनक लगेगा, क्योंकि मानद राष्ट्रपिता के कितने अस्थि-कलश थे या हैं, यह अभी तक सरकार को नहीं पता। कहा जाता है कि एक और अस्थि-कलश बाकी है, जो कनाडा में पाया जाता है। बहरहाल, अस्थि-कलश का विसर्जन बड़े ही समारोहपूर्वक कर दिया गया, लेकिन इस सारे तामझाम के दौरान एक बात और याद आई कि पूना में नाथूराम गोड़से का अस्थि-कलश अभी भी रखा हुआ है, उनकी अन्तिम इच्छा पूरी होने के इन्तजार में।

फ़ाँसी दिये जाने से कुछ ही मिनट पहले नाथूराम गोड़से ने अपने भाई दत्तात्रय को हिदायत देते हुए कहा था, कि “मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धु नदी में ही उस दिन प्रवाहित करना जब सिन्धु नदी एक स्वतन्त्र नदी के रूप में भारत के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमें कितने भी वर्ष लग जायें, कितनी ही पीढ़ियाँ जन्म लें, लेकिन तब तक मेरी अस्थियाँ विसर्जित न करना…”। नाथूराम गोड़से और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी राख उनके परिवार वालों को नहीं सौंपी गई थी। जेल अधिकारियों ने अस्थियों और राख से भरा मटका रेल्वे पुल के उपर से घग्गर नदी में फ़ेंक दिया था। दोपहर बाद में उन्हीं जेल कर्मचारियों में से किसी ने बाजार में जाकर यह बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह खबर एक स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई। इन्द्रसेन उस वक्त “द ट्रिब्यून” के कर्मचारी भी थे। शर्मा ने तत्काल दो महासभाईयों को साथ लिया और दुकानदार द्वारा बताई जगह पर पहुँचे। उन दिनों नदी में उस जगह सिर्फ़ छ्ह इंच गहरा ही पानी था, उन्होंने वह मटका वहाँ से सुरक्षित निकालकर स्थानीय कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश कोहल को सौंप दिया, जिन्होंने आगे उसे डॉ एलवी परांजपे को नाशिक ले जाकर सुपुर्द किया। उसके पश्चात वह अस्थि-कलश 1965 में नाथूराम गोड़से के छोटे भाई गोपाल गोड़से तक पहुँचा दिया गया, जब वे जेल से रिहा हुए। फ़िलहाल यह कलश पूना में उनके निवास पर उनकी अन्तिम इच्छा के मुताबिक सुरक्षित रखा हुआ है।

15 नवम्बर 1950 से आज तक प्रत्येक 15 नवम्बर को गोड़से का “शहीद दिवस” मनाया जाता है। सबसे पहले गोड़से और आपटे की तस्वीरों को अखंड भारत की तस्वीर के साथ रखकर फ़ूलमाला पहनाई जाती है। उसके पश्चात जितने वर्ष उनकी मृत्यु को हुए हैं उतने दीपक जलाये जाते हैं और आरती होती है। अन्त में उपस्थित सभी लोग यह सौगन्ध खाते हैं कि वे गोड़से के “अखंड हिन्दुस्तान” के सपने के लिये काम करते रहेंगे। गोपाल गोड़से अक्सर कहा करते थे कि यहूदियों को अपना राष्ट्र पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, हर वर्ष वे कसम खाते थे कि “अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा…”

हालांकि यह एक छोटा सा कार्यक्रम होता है, और उपस्थितों की संख्या भी कम ही होती है, लेकिन गत कुछ वर्षों से गोड़से की विचारधारा के समर्थन में भारत में लोगों की संख्या बढ़ी है, जैसे-जैसे लोग नाथूराम और गाँधी के बारे में विस्तार से जानते हैं, उनमें गोड़से धीरे-धीरे एक “आइकॉन” बन रहे हैं। वीर सावरकर जो कि गोड़से और आपटे के राजनैतिक गुरु थे, के भतीजे विक्रम सावरकर कहते हैं, कि उस समय भी हम हिन्दू महासभा के आदर्शों को मानते थे, और “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि गाँधी का वध किया जाना आवश्यक था…”, समाज का एक हिस्सा भी अब मानने लगा है कि नाथूराम का वह कृत्य एक हद तक सही था। हमारे साथ लोगों की सहानुभूति है, लेकिन अब भी लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं…।

डर की वजह भी स्वाभाविक है, गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने पूना में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार किये थे, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लूट और दंगों को अंजाम दिया था, उस वक्त पूना पहली बार एक सप्ताह तक कर्फ़्यू के साये में रहा। बाद में कई लोगों को आरएसएस और हिन्दू महासभा का सदस्य होने के शक में जेलों में ठूंस दिया गया था (कांग्रेस की यह “महान” परम्परा इंदिरा हत्या के बाद दिल्ली में सिखों के साथ किये गये व्यवहार में भी दिखाई देती है)। गोपाल गोड़से की पत्नी श्रीमती सिन्धु गोड़से कहती हैं, “वे दिन बहुत बुरे और मुश्किल भरे थे, हमारा मकान लूट लिया गया, हमें अपमानित किया गया और कांग्रेसियों ने सभी ब्राह्मणों के साथ बहुत बुरा सलूक किया… शायद यही उनका गांधीवाद हो…”। सिन्धु जी से बाद में कई लोगों ने अपना नाम बदल लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया। “मैं गोड़से परिवार में ब्याही गई थी, अब मृत्यु पर्यन्त यही मेरा उपनाम होगा, मैं आज भी गर्व से कहती हूँ कि मैं नाथूराम की भाभी हूँ…”।

चम्पूताई आपटे की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी, जब उनका विवाह एक स्मार्ट और आकर्षक युवक “नाना” आपटे से हुआ था, 31 वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं, और एक वर्ष पश्चात ही उनका एकमात्र पुत्र भी चल बसा। आज वे अपने पुश्तैनी मकान में रहती हैं, पति की याद के तौर पर उनके पास आपटे का एक फ़ोटो है और मंगलसूत्र जो वे सतत पहने रहती हैं, क्योंकि नाना आपटे ने जाते वक्त कहा था कि “कभी विधवा की तरह मत रहना…”, वह राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानतीं, उन्हें सिर्फ़ इतना ही मालूम है गाँधी की हत्या में शरीक होने के कारण उनके पति को मुम्बई में हिरासत में लिया गया था। वे कहती हैं कि “किस बात का गुस्सा या निराशा? मैं अपना जीवन गर्व से जी रही हूँ, मेरे पति ने देश के लिये बलिदान दिया था।

12 जनवरी 1948 को जैसे ही अखबारों के टेलीप्रिंटरों पर यह समाचार आने लगा कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये सरकार पर दबाव बनाने हेतु गाँधी अनशन पर बैठने वाले हैं, उसी वक्त गोड़से और आपटे ने यह तय कर लिया था कि अब गाँधी का वध करना ही है… इसके पहले नोआखाली में हिन्दुओं के नरसंहार के कारण वे पहले से ही क्षुब्ध और आक्रोशित थे। ये दोनों, दिगम्बर बड़गे (जिसे पिस्तौल चलाना आता था), मदनलाल पाहवा (जो पंजाब का एक शरणार्थी था) और विष्णु करकरे (जो अहमदनगर में एक होटल व्यवसायी था), के सम्पर्क में आये।

पहले इन्होंने गांधी वध के लिये 20 जनवरी का दिन तय किया था, गोड़से ने अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी में बदलाव किये, एक बार बिरला हाऊस जाकर उन्होंने माहौल का जायजा लिया, पिस्तौल को एक जंगल में चलाकर देख लिया, लेकिन उनके दुर्भाग्य से उस दिन बम तो बराबर फ़ूटा, लेकिन पिस्तौल न चल सकी। मदनलाल पाहवा पकड़े गये (और यदि दिल्ली पुलिस और मुम्बई पुलिस में बराबर तालमेल और खुफ़िया सूचनाओं का लेनदेन होता तो उसी दिन इनके षडयन्त्र का भंडाफ़ोड़ हो गया होता)। बाकी लोग भागकर वापस मुम्बई आ गये, लेकिन जब तय कर ही लिया था कि यह काम होना ही है, तो तत्काल दूसरी ईटालियन मेड 9 एमएम बेरेटा पिस्तौल की व्यवस्था 27 जनवरी को ग्वालियर से की गई। दिल्ली वापस आने के बाद वे लोग रेल्वे के रिटायरिंग रूम में रुके। शाम को आपटे और करकरे ने चांदनी चौक में फ़िल्म देखी और अपना फ़ोटो खिंचवाया, बिरला मन्दिर के पीछे स्थित रिज पर उन्होंने एक बार फ़िर पिस्तौल को चलाकर देखा, वह बेहतरीन काम कर रही थी।

गाँधी वध के पश्चात उस समय समूची भीड़ में एक ही स्थिर दिमाग वाला व्यक्ति था, नाथूराम गोड़से। गिरफ़्तार होने के पश्चात गोड़से ने डॉक्टर से उसे एक सामान्य व्यवहार वाला और शांत दिमाग होने का सर्टिफ़िकेट माँगा, जो उसे मिला भी। बाद में जब अदालत में गोड़से की पूरी गवाही सुनी जा रही थी, पुरुषों के बाजू फ़ड़क रहे थे, और स्त्रियों की आँखों में आँसू थे।

बहरहाल, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने और टुकड़े-टुकड़े करके भारत में मिलाने हेतु कई समूह चुपचाप काम कर रहे हैं, उनका मानना है कि इसके लिये साम-दाम-दण्ड-भेद हरेक नीति अपनानी चाहिये। जिस तरह सिर्फ़ साठ वर्षों में एक रणनीति के तहत कांग्रेस, जिसका पूरे देश में कभी एक समय राज्य था, आज सिमट कर कुछ ही राज्यों में रह गई है, उसी प्रकार पाकिस्तान भी एक न एक दिन टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जायेगा और उसे अन्ततः भारत में मिलना होगा, और तब गोड़से का अस्थि विसर्जन किया जायेगा।
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डिस्क्लेमर : यह लेख सिर्फ़ जानकारी के लिये है, फ़ोकटिया बुद्धिजीवी बहस में उलझने का मेरा कोई इरादा नहीं है और मेरे पास समय भी नहीं है। डिस्क्लेमर देना इसलिये जरूरी था कि बाल की खाल निकालने में माहिर कथित बुद्धिजीवी इस लेख का गलत मतलब निकाले बिना नहीं रहेंगे।

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

18 February 2008

जन्‍मदिन पर विशेष - चित्रों में छत्रपति शिवाजी






हरदोई गूजर के पंद्रह क्रांतिकारियों को मिली थी फांसी की सजा


हरदोई ग्राम के पंद्रह क्रांतिकारियों का न तो कोर्ट मार्शल हुआ न अदालत ने सजा सुनाई फिर भी उन्हे पेड़ से लटका कर सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया क्योंकि उन्होंने लक्ष्मीबाई को कालपी जाते समय शरण दी थी। ब्रिटिश हुकूमत ने गढ़ी को तोपों से ध्वस्त कर दिया।

इतिहासविद् डीके सिंह के मुताबिक 7 मई 1858 को कोंच में जब तात्या टोपे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा अन्य क्रांतिकारियों की हार हो गयी तब जनरल ह्यूरोज और राबर्ट मिल्टन ने सलाहकार कैप्टन टर्नन को जालौन जिले का डिप्टी कलेक्टर कोंच में ही नियुक्त कर दिया। कोंच में पराजित हो जाने के बाद क्रांतिकारियों का मनोबल टूट गया तो वो विभिन्न रास्तों से अलग-अलग कालपी लौटे लेकिन जनरल ह्यूरोज क्रांतिकारियों का पीछा कर जल्द से जल्द कालपी पहुंचना चाहता था जिससे क्रांतिकारी संगठित होकर मुकाबला कर सकें। अत: उसने गुरसरायं के राजा केशव राव को सैनिकों के साथ कोंच में आमंत्रित किया और कोंच की रक्षा का भार उनको सौंपकर 9 मई 1958 को कालपी के लिए चल दिया। अंग्रेजी सेना जब कूच करती थी तब उसके गुप्तचर सेना के आगे-आगे चलकर सूचना एकत्रित करके जनरल रोज को दिया करते थे। कोंच की सेना का पहला पड़ाव हरदोई गूजर नामक गांव में पड़ा। हरदोई गूजर की दूरी जनपद के मुख्यालय उरई से तेरह किमी. है। रोज को उसके गुप्तचरों से सूचना मिली कि हरदोई गूजर के जमींदार नाना साहब पेशवा व जालौन की ताई बाई के भारी समर्थक है अत: रोज ने जमींदार को अपने कैंप में बुलाकर क्रांतिकारियों के मार्ग आदि के बारे में पूछा लेकिन जमींदार ने कोई भी महत्वपूर्ण सूचना नहीं दी। रोज के जासूसों ने उसे बताया कि खबर मिली है रानी लक्ष्मीबाई पचास घुड़सवार तथा सौ बंदूकचियों के साथ इसी रास्ते से कालपी की ओर गयी है। तब रोज ने अपने सैनिकों से हरदोई गूजर के हर घर की तलाशी लेने का आदेश दिया। इस तलाशी अभियान में बहुत से घायल क्रांतिकारी सैनिक लोगों के घरों में छिपे हुए थे। रोज को तलाशी के दौरान क्रांतिकारियों की दो तोपों भी मिल गयीं। इन सब बातों से रोज बेहद क्रोधित हुआ और उसने गांव के क्रांतिकारियों को फाँसी की सजा सुनाई।
प्रस्थान करने से पूर्व पंद्रह क्रांतिकारियों को रोज ने हाथ-पैर बांधकर गले में फाँसी का फंदा लटकाकर घोड़े की जीन पर बैठा दिया तथा दूसरा छोर ऊपर बेड़ से बांध दिया गया। बिगुल की आवाज के साथ ही फौज का जैसे ही मार्च शुरू हुआ। घोड़े जैसे ही आगे बढ़े क्रांतिकारियों का फंदा गले में कस गया और वह लेट गये। इतिहासकार लो ने अपनी पुस्तक सेंट्रल इंडिया डयूरियम दि टिवेलियन 1857-58 के पृष्ठ संख्या 278 पर लिखा कि जाने के पहले रोज न हरदोई की गढ़ी को ध्वस्त कर दिया था। रोज की सेना आगे जा रही थी और उधर पेड़ों पर पंद्रह शहीदों के शव लटके थे। कई दिनों बाद स्थानीय लोगों ने हिम्मत जुटाकर शव पेड़ों से उतारे और उनका अंतिम संस्कार किया। इसके बाद जालौन पर अंग्रेजों ने अधिकार कर लिया। हरदोई गूजर तथा आसपास के कई लोगों पर मुकदमे चलाकर सजा दी गयी तथा उनकी संपत्तियां जब्त कर लीं जिसमें कलंदर सिंह पुत्र सुरजन सिंह का नाम भी उल्लेखनीय है।

----- संकलन स्‍त्रोत अज्ञात

17 February 2008

मराठा राज्य के विनाश पर थी जालौन की नींव

जालौन जिले की नींव मराठा राज्य को मिटाकर अंग्रेजों ने उस समय रखी थी जब 'क्राउन' का नहीं 'कंपनी बहादुर' का शासन था लेकिन इसकी सीमायें कई बार बदली गयीं। कभी दबोह, मोंठ, गरौठा, चिरगांव, जैतपुर और महोबा भी जालौन जिले के हिस्से थे।

 
1840 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने जालौन के मराठा राज्य का विलय अपने शासित क्षेत्र में किया उस समय जालौन के अलावा उरई, आटा और महोबा इसके परगने थे। कोंच और कालपी पहले से ही कंपनी के अधिकार में आ चुके थे। इसके अलावा झांसी जिले के मोंठ का प्रशासन भी जालौन के प्रशासक कैप्टेन डूलन देख रहे थे। इन सारी इकाइयों को समाहित करते हुए जालौन जिले का गठन किया गया।


1841 में चिरगांव जागीर को जब्त कर इसे भी जालौन जिले का हिस्सा बना दिया गया। 1843 में जिले का और विस्तार कर परगना दबोह और गरौठा भी इससे जोड़ दिये गये। 1844 में कंपनी सरकार ने ग्वालियर के सिंधिया को युद्ध मैदान में शिकस्त देकर उनके साम्राज्य का काफी हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया। इसी में से माधौगढ़, इंदुरखी, भांडेर और मऊ मिहौनी को भी जालौन जिले के अंतर्गत कर दिया गया। वर्ष 1849 में जैतपुर के राजा की निसंतान मृत्यु होने पर उनके राज्य को भी कंपनी ने बलात अपने अधिकार में लेकर जालौन जिले से संबद्ध कर दिया। इस तरह से 1852 तक जालौन जिले की सीमायें अत्यंत वृहद रहीं।

 
1853 में झांसी के राजा गंगाधर भी निसंतान चल बसे तो लार्ड डलहौजी की हड़प नीति के तहत कंपनी ने झांसी को भी अपने अधीनस्थ कर लिया तथा वहां मजबूत शिकंजा जमाने के लिए सुपरिनटेडसी बना दी जिसके अंतर्गत तीन जिले झांसी, चंदेरी व जालौन रखे गये। इस दौरान जालौन का पुनर्गठन कर सुचारु प्रशासन के लिए उसके आकार को छोटा करते हुए महोबा व जैतपुर परगना हमीरपुर जिले को दे दिये गये। इसके बाद जालौन जिले की सीमा में और कटौती कर गरौठा, भांडेर, मोंठ व चिरगांव को झांसी में शामिल कर दिया गया।


1857 के गदर में सिंधिया द्वारा दिखायी गयी वफादारी के इनाम स्वरूप इंदुरखी, माधौगढ़ और दबोह परगनों के कई गांव सिंधिया रियासत को उपहार में दिये जाने से जालौन जिले का स्वरूप और संकुचित हो गया।


इसके बाद जालौन जिले का बड़ा पुनर्गठन आजादी के बाद तब हुआ जब 1956 में विंध्य प्रदेश विघटित किया गया और इसके अंतर्गत आने वाले नदीगांव तहसील व कदौरा बावनी राज्य को जालौन जिले से जोड़ दिया गया। जालौन जिले के इतिहास और भूगोल पर शोधपरक पुस्तक लिखने वाले देवेंद्र कुमार सिंह के अनुसार इस जनपद में पहली जनगणना 1853 में हुयी थी लेकिन 1865 में हुयी जनगणना का इसके संदर्भ में ज्यादा महत्व है क्योंकि तब जालौन जिले का नक्शा वैसा ही था जैसा आज और उस समय वह यहां की मर्दमशुमारी 4 लाख 5 हजार 604 रही थी जबकि 2001 की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी 135 वर्षो में लगभग ढाई गुना बढ़कर 14 लाख 55 हजार 659 हो चुकी है।

 

साभार - जानकारी अज्ञात

13 February 2008

एक हो सारा भारत

जागो भारत के नौजवानों,
भारतीयता पर अब खतरा है..
सुनो वो चीत्कार रहा ,
लहू का हर एक कतरा है.

कोई उत्तर दक्षिण करता है,
कोई पूरब पश्चिम करता है,
कोई मराठी मराठी रोता है,
और भारतीयता को खोता है..

आओ, बढ़ो,
तोड़ दो ऐसे मंसूबों को,
भारत एक है,
तोड़ दो भारत के इन सूबों को..

ऐसा दृश्य दिखाओ कि,
कोई कभी ना तोड़े भारत को,
स्मरण करो अर्जुन को,
और चक्रव्यूह तोड़ने की महारत को...

तोड़ दो इन ज़ंजीरों को,
जो गुलामी तक ले जाएगी,
फिर नेता, गुंडों, और प्रशासन
इनकी अंधी हुकूमत आयेगी...

भारत को एक करने का इरादा,
देश के जन जन में हो,
एक नया भारत बनाने का
इरादा मन में हो...

फिजा में बिखेरें प्यार

वेलेंटाइन डे यानी प्रेम का दिवस। अधिकतर लोग प्रेम को बहुत एकांगी अर्थो में लेते हैं और सोचते है कि वेलेंटाइन डे सिर्फ प्रेमी-प्रमिकाओं के लिए ही है। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वेलेंटाइन डे प्रेम के उत्सव का दिन है और स्त्री-पुरूष के बीच के एकायामी प्रेम से ज्यादा व्यापक है। यह दिन उन लोगों के प्रति अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति का दिन है जिनकी आप चिंता करतें है। इसलिए अगर आप मानतें है कि वेलेंटाइन डे सिर्फ प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए है तो एक बार जरूर सोचिए। इस दिन आप प्रेमी-प्रमिकाओं के अलावा भी दूसरे कई रिश्तों का सम्मान कर सकते है। वह आपकी सबसे अच्छी महिला मित्र हो सकती है, आपके कमरे में साथ रहने वाला हो सकता है या फिर परिवार का कोई सदस्य अथवा पारिवारिक मित्र भी। वह आपकी बूढ़ी काकी भी हो सकती है जो सबसे लजीज खाना पकाती है और प्यार से खिलाती है। और वाकई वह आपकी मां,बहन, भाई और आपका बेटा भी हो सकता है। इसलिए केवल लवर्स के अलावा भी आपके प्रेम की अभिव्यक्ति का दिन है जिनसे आपकी जिंदगी खूबसूरत बनती है। इसलिए इस बार क्यों न थोड़े अलग ढंग से और उन सबके प्रति आदर के साथ मनाएं जिनका हमारे जीवन के लिए कोई मतलब है।

अपने दोस्त के साथ जिससे कभी बेहतरीन वक्त गुजारा था, लेकिन अब जो आप के संपर्क में नही है वह अब कैसा है या जब काम करना शुरू किया था तब जिसके साथ आपने कमरा शेयर किया था और जो संडे को गोलगप्पे खिलाता था। आपके बचपन का कोई दोस्त जो अब किसी दूसरे शहर में रहता है, वह कैसा है? आप उससे संपर्क कर एक नया पुल फिर से बनाते है तथा एक दूसरे के साथ वक्त विताकर फिर से नया रिश्ता बना सकतें है।


दूसरे रूप में आप अपने से बड़ो के प्रति अपने प्यार और आदर का इजहार करने के लिए क्या वेलेंटाइन डे सबसे अच्छा दिन हो सकता है। अपने काम के दबाव और दूसरी प्राथमिकताओं के कारण हम अपने बउो को कितना कम वक्त दे पाते है। अक्सर वे हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे अंत में आते है। तो इस बार क्यों न हम अपने बुजुर्गो, अग्रजों एवं सम्मानित बड़ो के साथ प्रेम दिवस का लुफ्त उठायें।

आापसी सौहार्द बढ़ाने का सबसे अच्छा अवसर जिन दोस्तों और परिजनों के साथ आपके संबंध मधुर नही रह गये हैं, इस दिन उनसे जुड़िये क्योंकि गलतफहमियां और भूलें हमेशा होती रहती है। क्यों न इस बार उन्हें जला डालें। उनके लिए मीठे चाकलेट खरीदियें ओैर उनसे मिलिए जैसे कुछ हुआ ही न हो। प्रेम के देवता की लौ इस दिन आप थोड़ी सी उनके लिए जलाइये जो आपके लिए अहमियत रखतें है।

प्रेम दिवस यह कहने का सबसे अच्छा दिन है कि आप अपने परिवार को कितना प्यार करतें है। अपनी बहन से बात कर हैप्पी वैलेंटाइन कहिये, भाई के साथ लंच करें। साथ ही बचपन की बातें कर खूब आनन्द उठाइये तथा एक उपहार दीजिए लिखकर जो उसके लिए सरप्राइज होगा।

साथ ही आप अपने के लिए भी पर्याप्त समय अपने लिए भी रखिए। ईश्वर को धन्यवाद दीजिए कि उसने आपको ऐसे लोगो से मिलाया जो आपकी चिंता करते है और बदले में आपको भी उनकी चिंता है और उनके लिए प्रार्थना कीजिए। साथ ही अगर आप कुछ खरीदना चाहते हैं तो यह सबसे अच्छा दिन है। यही तो प्यार है और ऐसे ही आप कुछ नया कर पूरे फिजा में प्यार फैला सकतें है। तो तैयार हो जाइये आज और कुछ कर डालिये डिफरेंट।

10 February 2008

कैसी है यह चोट

हम सभी यही समझते है कि कल्पनाओं की दुनियामें उड़ान भरते हुए जो कलम एक रूप धारण कर लेती है वही एक कहानी या कविता बन जाती है .ये सच है लेकिन अधूरा ... कोई भी कल्पना एक ठोस हकीकत से हमेशा जुड़ी हुई होती है .

शहरका इंसान जो जिंदगी जी रहा है वह कोई कल्पना से भी ज्यादा रोमांचक है लेकिन यहाँ ये सब फुरसत किसे है ? बस इसे एक बार गौर से देखिये . हमारे दृष्टिकोण में एक फर्क आ जाएगा .

हम इंसानों को भगवान ने बहुत ही महत्वाकांक्षी बनाया है .हमारी तृष्णा का कोई अंत नही होता . हम वर्तमान में जहाँ पर है वहां से आगे की ही सोचते रहते है .उस आगे वाले मुकाम को पाने के लिए कोई रास्ता चुन लेते है ,चाहे वो नैतिकता के अवमूल्यन के बाद ही मिल सकता हो .

एक सवाल है यहाँ पर . इन सबके अंत में क्या ? रोड पति से खरबपति के सफर में आखरी मुकाम पर एक अहम् की परीतृप्ति को छोड़ कर कुछ भी शेष नहीं बचता. मंजिल पा लेने पर दौड़ने की जिजीविषा भी समाप्त हो जाती है . जिन्दगी ठहर जाती है .उस वक्त पहली बार सही मायने में हमें ख़याल आता है कि हम यहाँ तक पहुँच पाने के लिए पीछे क्या क्या छोड़कर , गंवाकर आए है?
महानगर के कामकाजी मातापिता क्या अपनी संतान का पहला कदम , पहले शब्द का सौंदर्य देख पाये है ? अपने मासूम कि तोतली जबान से तोता मैनाकी टीचरवाली कहानी सुनाने का वक्त और आनंद आपके पास है ?

अपने बच्चोंके प्रति अपने सभी दायित्व को गरिमापूर्ण तरीके से पुरा करने के बाद एक हसीन जीवन संध्या की और बढ़ते हुए कदमों को साथ चलने के अपेक्षा मनमें रखनेवाले माँ बाप के कदमों में अब अपने नाती पोतों को बड़े करने के जिम्मेदारी डाली जाती है जिससे कामकाजी पतिपत्नी ' दो जून की रोटी' या 'एशोआराम के साधन ' अपने लिए जुटा पाएं .क्या उनके बूढे कंधे इस दायित्व को निभाने के लिए सक्षम है भी या नहीं ये सोचने की शायद उन्हें जरूरत नहीं .......

इन शहरी जिंदगी में दौड़ते भागते इन महत्वकांक्षी इंसानों के जज्बातों को नजदीकसे पढ़ने की कोशिश में हर नई कहानी का बीज मिल जाता है .......
क्या यही है व्यावसायिकता का फल ? क्या हम अपना वो जीवन वापस प्राप्त कर पाएंगे जो हमारे पूर्वजों ने हमें दिया था ? यही व्यावसायिकता का अभिशाप है, या अभी बहुत कुछ होना बाकी है ?

माता सरस्‍वती चालीसा

।। स्‍ुतति।।

वंदे इंदु सुवार हार धवला,

या वस्‍त्रावृता।

या वीणा वर दंड मंडित करा

या श्‍वेत पद्मासना।।

 

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।। दोहा ।।

जनक जननि पदपघ, निज मस्तक पर धारि ।

बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्घि बल दे दातारि ।।

पूर्ण जगत में व्याप्त तव महिमा अमित अनंतु ।

दुष्टजनों के पाप को, मातु तुही अब हन्तु ।।

 

जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी । जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ।।

जय जय जय वीणाकर धारी । करती सदा सुहंस सवारी ।।

रुप चतुर्भुज धारी माता । सकल विश्व अन्दर विख्याता ।।

जग में पाप बुद्घि जब होती । तबहि धर्म की फीकी ज्योति ।।

तबहि मातु का निज अवतारा । पाप हीन करती महितारा ।।

बाल्मीकि जी थे हत्यारा । तव प्रसाद जानै संसारा ।।

रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि पदवी को पाई ।।

कालिदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता ।।

तुलसी सूर आदि विद्घाना । और भये जो ज्ञानी नाना ।।

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अमबा ।।

करहु कृपा सोई मातु भवानी । दुखित दीन निज दासहिं जानी ।।

पुत्र करइ अपराध बहूता । तेहि न धरइ चित एकउ माता ।।

राखु लाज जननी अब मेरी । विनय करउं भांति बहुतेरी ।।

मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदम्बा ।।

मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्घ विष्णु से ठाना ।।

समर हजार पांच में घोरा । फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ।।

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । बुद्घि विपरीत भई खलहाला ।।

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ।।

चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता ।।

रक्तबीज से समरथ पापी । सुर मुन हृदय धरा सब कांपी ।।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा । बार बार बिनवउं जगदंबा ।।

जगप्रसिद्घ जो शुंभ निशुंभा । क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा ।।

भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई ।।

एहि विधि रावन वध तू कीन्हा । सुन नर मुनि सबको सुख दीन्हा ।।

को समरथ तव यश गुन गाना । निगम अनादि अनंत बखाना ।।

विष्णु रुद्र जस सकैं न मारी । जिनकी हो तुम रक्षाकारी ।।

रक्त दन्तिका और शताक्षी । नाम अपार है दानवभक्षी ।।

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा । दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ।।

दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता ।।

नृप कोपित को मारन चाहै । कानन में घेरे मृग नाहै ।।

सागर मध्य पोत के भंगे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे ।।

भूत प्रेत बाधा या दुःख में । हो दरिद्र अथवा संकट में ।।

नाम जपे मंगल सब होई । संशय इसमें करइ न कोई ।।

पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ।।

करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ।।

धूपादिक नैवेघ चढ़ावै । संकट रहित अवश्य हो जावै ।।

भक्ति मातु की करै हमेशा । निकट न आवै ताहि कलेशा ।।

बंदी पाठ करै सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा ।।

रामसागर बांधि हेतु भवानी । कीजै कृपा दास निज जानी ।।

 

।। दोहा ।।

मातु सूर्य कान्त तव, अन्धकार मम रुप ।

डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ।।

बलबुद्घि विघा देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु ।

रामसागर अधम को आश्रय तू दे दातु ।।

08 February 2008

चौपाटी में लाठी

भारत जैसे विशाल देश में, जब भाषा तथा क्षेत्रवाद को लेकर विवाद होते है तो कष्‍ट की अनुभूति होती है। मुझे मराठियों से काफी लगाव है इसका मुख्‍य कारण छत्रपति शिवाजी और काफी हद तक बाला साहब का व्‍यक्तित्‍व है। हाल के दिनों में जिस प्रकार मुम्‍बई में राज के सैनिकों ने तांडव किया वह यह दर्शाता है कि भारत में अभी भी क्षेत्रवाद का अंत नही है।

तमिलनाडु से लेकर पूवोत्‍तर भारत राज्‍यों में जो दहशत देखने को मिलती है वह यह दर्शाता है कि भारत नागरिक आज भारत में भी सुरक्षित नही है। आज केन्‍द्र सरकार हो या राज्‍य सरकार आज अपने देश की सुरक्षा की गारंटी लेने को तैयार नही है। मेरे ख्‍याल से राज की मराठी व्‍यक्तियों को लेकर चिन्‍ता जायज है किन्‍तु उनका प्रर्दशन नाजायज था। पर यहॉं पर यह बात स्‍वीकार करने होगी कि जिनती चिन्‍ता राज ठाकरें को है शायद उतनी मराठियों को नही होगी। राज ठाकरे की नीयत महाराष्‍ट्र के अपनी पैठ बानने ही और वह इस नब्‍ज को दबा रहे है।

आज एक प्रश्‍न उठता है कि इस क्षेत्रवाद का अंत क्‍या होगा ? क्‍या सरकार को इस आतंरिक आतंकवाद को नियत्रण में करने का साहस नही है ? इस आंतरिक आंतंकवाद को देशद्रोह माना जाना चाहिए। और इसके पोषको को दण्डित किया जाना चाहिए ताकि भारत के सविधान की मूलभावना कि हम भारत के लोग को बरकारर रखा जा सकें।