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22 May 2015

सप्तदचिरजीवि स्तुति:

अश्वत्थारमा बलिर्व्या सो हनुमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते विरजीजीविन:।।
सत्ते्तान् संस्मररेन्नित्यं मार्कण्डेवयमथाष्टमम्।
जीवेद् वर्षशतं सो‍Sपि सर्वव्यातधिविवर्जित:।।

स्‍तुति पाठ से लाभ- उक्‍त स्‍तुति के पाठ करने से यात्रा सुखद होती है, रोग-व्‍याधि का निवारण हो आयु में वृद्धि होती है। इस मंत्र के उत्‍तम परिणाम के लिये नित्‍य प्रात: व रात्रि में आठ-आठ बार वाचन करना चाहिए।

28 July 2008

माँ को जहाँ जाना है वहीं जायेगीं

विन्‍ध्याचल भवानी की महिमा अपरम्‍पार है, एक सज्‍जन माता की दुर्लभ चित्र लेकर जा रहे थे। अचानक वह किसी कारण वश कहीं छूट गया। एक दिन एक व्‍यक्ति फोन करता कि माता की तस्‍वीर मेरे पास है आप अपना पता बता दे तो मै उसे पहुँचा दूँ। उन सज्‍जन ने अपना नाम और मोबाईल नम्‍बर लिख दिया था। उन सज्‍जन ने उक्‍त फोन करने वाले से कहा कि बन्‍धु माता को मेरे द्वारा पर अभी नही आना था, माता को आपके घर पर ही आसन ग्रहण करना था। आप माता की विधिवत पूजा करें और माता को अपने गृह में विराजमान करें।

निश्चित रूप से हम बस तो एक अंश है, सारा किया धरा तो मॉं का ही होता है, जो समय से पहले नही होता है। माँ को जहाँ जाना होगा वहीं जायेगी, वह किसी व्‍यक्ति विशेष से तालुक नही रखती है। जो होना लिखा है वही होता है, जो नही होता है उसमें भी माँ की इच्‍छा और आशीर्वाद है।

 

जय माँ विन्‍ध्‍यवाशिनी

18 March 2008

सुभाषित

दातव्‍यमिति यद्दानं दीयतेSनुपकारिणे।

देश काले च पात्रे च तद्दानं सात्विक स्‍मृतम्।। श्री म.भ.गीता 17/20

भावार्थ -

दान देना ही कर्त्तव्‍य है, ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्‍त होने पर अउपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सा‍त्विक कहा गया है।

15 March 2008

प.पू.पं. श्रीराम शर्मा आचार्य उवाच

"इन दिनों इतिहास का अभिनव अध्याय लिखा जा रहा है । इसमें हम में से हर किसी का ऎसा स्थान और योगदान होना चाहिए , जिसकी चर्चा पीढि़यों तक होती रहे । जिसकी स्मृति हर किसी को प्रेरणा दे सके , कि सोचना किस तरह चाहिए और चलना किस दिशा में , किस मार्ग पर चाहिए ? दीपक छोटा होते हुए भी अपने प्रभावक्षेत्र में प्रकाश प्रस्तुत करने और यथार्थता से अवगत कराने से घनघोर अंधेरे को भी परास्त करने में सफ़ल होता है ; भले ही इस प्रयास में उसे अपने तेल-बत्ती जैसे सीमित साधनों को भी दाँव पर लगाना पडे़ । क्या हमारा मूल्य दीपक से भी कम है ?"

02 March 2008

"भगवान का प्यार कैसा होता है ?"

"भगवान के प्यार करने के तीन तरीके हैं-पहला भगवान जिसे प्यार करते है, उसे ‘संत’ बना देते हैं । संत यानी श्रेष्ठ आदमी । श्रेष्ठ विचार वाले,शरीफ़,सज्जन आदमी को श्रेष्ठ कहते है । वह अन्तःकरण को संत बना देता है । दूसरा-भगवान जिसे प्यार करते हैं उसे ‘सुधारक’ बना देते है । वह अपने आपको घिसता हुआ चला जाता है तथा समाज को ऊँचा उठाता हुआ चला जाता है। तीसरा-भगवान जिसे प्यार करते है उसे ‘शहीद’ बना देते है । शहीद जिसने अपने बारे में विचार ही नही किया । समाज की खुशहाली के लिए जिसने अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया, वह शहीद कहलाता है ।जो दीपक की तरह जला, बीज की तरह गला,वह शहीद कहलाता है। चाहे वह गोली से मरा हो या नही, वह मैं नहीं कहता, परन्तु जिसने अपनी अक्ल, धन, श्रम, पूरे समाज के लिए अर्पित कर दिया , वह शहीद होता है । जटायु ने कहा कि आपने हमें धन्य कर दिया । आपने हमें शहीद का श्रेय दे दिया, हम धन्य हैं । जटायु , शबरी की एक नसीहत है । यह भगवान की भक्ति है । यही सही भक्ति हैं ।"

 

  • "गुरुवर की धरोहर-३"  से

10 February 2008

माता सरस्‍वती चालीसा

।। स्‍ुतति।।

वंदे इंदु सुवार हार धवला,

या वस्‍त्रावृता।

या वीणा वर दंड मंडित करा

या श्‍वेत पद्मासना।।

 

http://thedesertofman.files.wordpress.com/2006/10/sara.JPG

 

।। दोहा ।।

जनक जननि पदपघ, निज मस्तक पर धारि ।

बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्घि बल दे दातारि ।।

पूर्ण जगत में व्याप्त तव महिमा अमित अनंतु ।

दुष्टजनों के पाप को, मातु तुही अब हन्तु ।।

 

जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी । जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ।।

जय जय जय वीणाकर धारी । करती सदा सुहंस सवारी ।।

रुप चतुर्भुज धारी माता । सकल विश्व अन्दर विख्याता ।।

जग में पाप बुद्घि जब होती । तबहि धर्म की फीकी ज्योति ।।

तबहि मातु का निज अवतारा । पाप हीन करती महितारा ।।

बाल्मीकि जी थे हत्यारा । तव प्रसाद जानै संसारा ।।

रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि पदवी को पाई ।।

कालिदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता ।।

तुलसी सूर आदि विद्घाना । और भये जो ज्ञानी नाना ।।

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अमबा ।।

करहु कृपा सोई मातु भवानी । दुखित दीन निज दासहिं जानी ।।

पुत्र करइ अपराध बहूता । तेहि न धरइ चित एकउ माता ।।

राखु लाज जननी अब मेरी । विनय करउं भांति बहुतेरी ।।

मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदम्बा ।।

मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्घ विष्णु से ठाना ।।

समर हजार पांच में घोरा । फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ।।

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । बुद्घि विपरीत भई खलहाला ।।

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ।।

चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता ।।

रक्तबीज से समरथ पापी । सुर मुन हृदय धरा सब कांपी ।।

काटेउ सिर जिम कदली खम्बा । बार बार बिनवउं जगदंबा ।।

जगप्रसिद्घ जो शुंभ निशुंभा । क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा ।।

भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई ।।

एहि विधि रावन वध तू कीन्हा । सुन नर मुनि सबको सुख दीन्हा ।।

को समरथ तव यश गुन गाना । निगम अनादि अनंत बखाना ।।

विष्णु रुद्र जस सकैं न मारी । जिनकी हो तुम रक्षाकारी ।।

रक्त दन्तिका और शताक्षी । नाम अपार है दानवभक्षी ।।

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा । दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ।।

दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता ।।

नृप कोपित को मारन चाहै । कानन में घेरे मृग नाहै ।।

सागर मध्य पोत के भंगे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे ।।

भूत प्रेत बाधा या दुःख में । हो दरिद्र अथवा संकट में ।।

नाम जपे मंगल सब होई । संशय इसमें करइ न कोई ।।

पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ।।

करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ।।

धूपादिक नैवेघ चढ़ावै । संकट रहित अवश्य हो जावै ।।

भक्ति मातु की करै हमेशा । निकट न आवै ताहि कलेशा ।।

बंदी पाठ करै सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा ।।

रामसागर बांधि हेतु भवानी । कीजै कृपा दास निज जानी ।।

 

।। दोहा ।।

मातु सूर्य कान्त तव, अन्धकार मम रुप ।

डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ।।

बलबुद्घि विघा देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु ।

रामसागर अधम को आश्रय तू दे दातु ।।

09 January 2008

ज्ञान निर्झर- सात बातें

माता-पिता, लक्ष्मी-नारायण के रूप हैं। उनका सदा बन्‍दन करना चाहिये।

सदाचारी पुत्र माता-पिता को सद्गति प्रदान करता है।

माता, पिता, गुरू, अतिथि और सूर्य ये प्रत्‍यक्ष देव है इसनकी सेवा करनी चाहिये।

बालक से निर्दोषता की सीख मिलती है।

माता सुशिक्षिता हो तो बालको को हजार शिक्षको से अधिक ज्ञान दे सकती है।

दूसरे के सुख में सुखी होना ही प्रेम का लक्षण है।

बड़ो के प्रति सहनशील, छोटो के प्रति दया, समवयस्‍कों के साथ मित्रता एवं जीवों के साथ समान व्‍यवहार करने से सर्वात्‍मा श्रीहरि प्रसन्‍न होते हैं।

13 December 2007

ईशावास्‍योपनिषद - प्रथम मंत्र

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः ॥  

ॐ ईशा वास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥१॥

व्‍याख्‍या :- अखिल विश्‍व मे जो कुछ भी गतिशील अर्थात चर अचर पदार्थ है, उन सब मे ईश्‍वर अपनी गतिशीलता के साथ व्‍याप्‍त है उस ईश्‍वर से सम्‍पन्‍न होते हुये से तुम त्‍याग भावना पूर्वक भोग करो। आसक्‍त मत हो कि धन अथवा भोग्‍य पदार्थ किसके है अथार्थ किसी के भी नही है ? अत: किसी अन्‍य के धन का लोभ मत करो क्‍योकि सभी वस्‍तुऐ ईश्‍वर की है। तुम्‍हारा क्‍या है क्‍या लाये थे और क्‍या ले जाओगे।

05 December 2007

शिवमहिम्न स्तोत्र पुष्पदन्त


॥ ॐ नमः शिवाय ॥
॥अथ श्री शिवमहिम्नस्तोत्रम्‌॥



महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथाऽवाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्‌
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥ १॥
अतीतः पंथानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥ २॥
वाचः परमममृतं निर्मितवतः
तव ब्रह्मन्‌ किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्‌।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन्‌ पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता॥ ३॥
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्‌
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिस्रुषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन्‌ वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः॥ ४॥
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसर दुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चित्‌ मुखरयति मोहाय जगतः॥ ५॥
अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां
अधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति।
अनीशो वा कुर्याद्‌ भुवनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे॥ ६॥
त्रयी साङ्ख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च।
रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिल नानापथजुषां
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥ ७॥
महोक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्‌।
सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भूप्रणिहितां
न हि स्वात्मारामं विषयमृगतृष्णा भ्रमयति॥ ८॥
ध्रुवं कश्चित्‌ सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याऽध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
समस्तेऽप्येतस्मिन्‌ पुरमथन तैर्विस्मित इव
स्तुवन्‌ जिह्रेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता॥ ९॥
तवैश्वर्यं यत्नाद्‌ यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेतुं यातावनलमनलस्कन्धवपुषः।
ततो भक्तिश्रद्धा-भरगुरु-गृणद्भ्यां गिरिश यत्‌
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति॥ १०॥
अयत्नादासाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डू-परवशान्‌।
शिरःपद्मश्रेणी-रचितचरणाम्भोरुह-बलेः
स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर विस्फूर्जितमिदम्‌॥ ११॥
अमुष्य त्वत्सेवा-समधिगतसारं भुजवनं
बलात्‌ कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगुष्ठशिरसि
प्रतिष्ठा त्वय्यासीद्‌ ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः॥ १२॥
यदृद्धिं सुत्राम्णो वरद परमोच्चैरपि सतीं
अधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयत्रिभुवनः।
न तच्चित्रं तस्मिन्‌ वरिवसितरि त्वच्चरणयोः
न कस्याप्युन्नत्यै भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः॥ १३॥
अकाण्ड-ब्रह्माण्ड-क्षयचकित-देवासुरकृपा
विधेयस्याऽऽसीद्‌ यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो
विकारोऽपि श्लाघ्यो भुवन-भय- भङ्ग- व्यसनिनः॥ १४॥
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्‌
स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः॥ १५॥
मही पादाघाताद्‌ व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्राम्यद्‌ भुज-परिघ-रुग्ण-ग्रह- गणम्‌।
मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृत-जटा-ताडित-तटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥ १६॥
वियद्व्यापी तारा-गण-गुणित-फेनोद्गम-रुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
जगद्द्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति
अनेनैवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः॥ १७॥
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथ-चरण-पाणिः शर इति।
दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर-विधिः
विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः॥ १८॥
हरिस्ते साहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन्‌ निजमुदहरन्नेत्रकमलम्‌।
गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषः
त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्ति जगताम्‌॥ १९॥
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्‌ त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदान-प्रतिभुवं
श्रुतौ श्रद्धां बध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः॥ २०॥
क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां
ऋषीणामार्त्विज्यं शरणद सदस्याः सुर-गणाः।
क्रतुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुफल-विधान-व्यसनिनः
ध्रुवं कर्तुः श्रद्धा-विधुरमभिचाराय हि मखाः॥ २१॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद्‌ भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।
धनुष्पाणेर्यातं दिवमपि सपत्राकृतममुं
त्रसन्तं तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः॥ २२॥
स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह्नाय तृणवत्‌
पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वा पुरमथन पुष्पायुधमपि।
यदि स्त्रैणं देवी यमनिरत-देहार्ध-घटनात्‌
अवैति त्वामद्धा बत वरद मुग्धा युवतयः॥ २३॥
श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि॥ २४॥
मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमविधायात्त-मरुतः
प्रहृष्यद्रोमाणः प्रमद-सलिलोत्सङ्गति-दृशः।
यदालोक्याह्लादं ह्रद इव निमज्यामृतमये
दधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्‌ किल भवान्‌॥ २५॥
त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवहः
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्वमिति च।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता बिभ्रति गिरं
न विद्मस्तत्तत्त्वं वयमिह तु यत्‌ त्वं न भवसि॥ २६॥
त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरान्‌
अकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्‌ तीर्णविकृति।
तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः
समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम्‌॥ २७॥
भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सहमहान्‌
तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्‌।
अमुष्मिन्‌ प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
प्रियायास्मैधाम्ने प्रणिहित-नमस्योऽस्मि भवते॥ २८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमः
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः।
नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमः
नमः सर्वस्मै ते तदिदमतिसर्वाय च नमः॥ २९॥
बहुल-रजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रबल-तमसे तत्‌ संहारे हराय नमो नमः।
जन-सुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौ मृडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः॥ ३०॥
कृश-परिणति-चेतः क्लेशवश्यं क्व चेदं
क्व च तव गुण-सीमोल्लङ्घिनी शश्वदृद्धिः।
इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्‌
वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्‌॥ ३१॥
असित-गिरि-समं स्यात्‌ कज्जलं सिन्धु-पात्रे
सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।
लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं
तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥ ३२॥
असुर-सुर-मुनीन्द्रैरर्चितस्येन्दु-मौलेः
ग्रथित-गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य।
सकल-गण-वरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानः
रुचिरमलघुवृत्तैः स्तोत्रमेतच्चकार॥ ३३॥
अहरहरनवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्‌ पठति
परमभक्त्या शुद्ध-चित्तः पुमान्‌ यः।
स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र
प्रचुरतर-धनायुः पुत्रवान्‌ कीर्तिमांश्च॥ ३४॥
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम्‌॥ ३५॥
दीक्षा दानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः।
महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌॥ ३६॥
कुसुमदशन-नामा सर्व-गन्धर्व-राजः
शशिधरवर-मौलेर्देवदेवस्य दासः।
स खलु निज-महिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्‌
स्तवनमिदमकार्षीद्‌ दिव्य-दिव्यं महिम्नः॥ ३७॥
सुरगुरुमभिपूज्य स्वर्ग-मोक्षैक-हेतुं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्य-चेताः।
व्रजति शिव-समीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम्‌॥ ३८॥
आसमाप्तमिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम्‌।
अनौपम्यं मनोहारि सर्वमीश्वरवर्णनम्‌॥ ३९॥
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः।
अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः॥ ४०॥
तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर।
यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः॥ ४१॥
एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते॥ ४२॥
श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिष-हरेण हर-प्रियेण।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः॥ ४३॥
॥ इति श्री पुष्पदन्त विरचितं शिवमहिम्नःस्तोत्रं समाप्तम्‌॥

11 November 2007

श्री लक्ष्‍मी स्‍तुति:

नमस्‍तेSस्‍तु महामाये, श्री पीठे सुरपूजिते।

शंख-चक्र-गदा-हस्‍ते, महालक्ष्‍मी नमोSस्‍तुते।

अर्थ- श्री महालक्ष्‍मी तुम्‍हें मेरा प्रणाम! महामाये श्री पीठ पर स्थित देवताओं से पूजित, शंख, चक्र, गदा हाथ में करने वाली को प्रणाम।

31 October 2007

श्री गणेश स्‍तुति:

गजाननं भूतगणधिसेवितं, कपित्‍थ-जम्‍बूफल-चारूभक्षणम्।

उमासुतं, शोकविनाश-कारकं, नमामि विघ्‍नेयवर-पाद-पंकजम्।।

अर्थ- पांच महाभूतों से सेवित, कैथ और जाम फल जिन्‍हें प्रिय है, पार्वती पुत्र, शोक नाशक, विघ्ननाशक-गजानन के चरण कमलों को प्रणाम करता हूँ।

श्री गणेश झाकी