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17 May 2015

मैं


जब भी अच्छा काम हो श्रेय ले जाते हैं वे
क्योंकि उनके सिर चढा है मैं

मैं यों तो छोटा सा है शब्द
मगर फैलाता है बडा दुख- दर्द
मौसम चाहे सर्द हो चाहे हो गर्म
मै ही है सबसे बडा मर्म

" मैं" " मैं" करते लुट गए कई लाख
मिट्टी में मिलकर होना है सबको खाख

मिट्टी में मिलकर भी नही मिटता है मैं
क्योंकि उनके सिर चढा है मैं

कई बुत व सडकें बनती हैं उनके नाम पर ,
कई बातें गढ़ी जाती हैं उनके काम पर,
समाज में ऊँचा रूतबा होता है उनका ,
लूटते हैं जिसे वे   वह होती है जनता,
गुपचुप करते हैं धन्धे चोरी के ,
भाषणों में बनते हैं निन्दक चोरी के ,

कईयों का खाख में मिलाकर ,
अपने रस्ते से मिटाकर ,
जब खुद जाते हैं खाख में ,
तब भी नही मिटता है मैं
क्योंकि उनके सिर चढा है मै, और
हर अच्छे काम का श्रेय ले गये हैं वे।
कवि - श्री तरूण जोशी ''नारद''
                                              

07 May 2015

क्षणिकायें - मयखाना

1
हर शराबी का बस दो ही ठिकाना है,
होश मे रहा तो मयखाना,
नशे मे रहा तो,वो दीवाना है.
2
पंडित कहे,शराब पाप है,
शराबी कहे, हम पापी है,
मयकदे मे दोनो संग संग,
कौन सचा कौन झूठा???
3
जब तक तुम थे, मै आशिक,
तुम चले गये, मै शराबी,
कौन निभा गया मुझसे वफा???
4
मन्दिर मे पुजारी,
मस्जिद मे मौलविय,
समाज मे सिपाही,
जहां तीनों मिले,
वो जगह, मयकदा कहलाये.
5
कौन पारो, कहॉं की चन्द्र्मुखी,
वो तो शराब थी,
जो देवदास, देवदास हुआ फिरता है.
6
किसके पास वक्त,
जो थामे मेरा हाथ,
शराब पी के जो लडखडाया,
कई हाथ मयकदे मे एक साथ उठ गये.
7
ना कोई ठोर ना कोई ठिकाना,
बस हाथ मे मय,
चार दोस्त मिले,
बन गया अपना आशियाना
8
हर कोई ग़म के साथ आता है,
मुस्कुराता हुआ जाता है,
कितना गम है मयकदे मे,
फिर भी हर पहर जगमगाता है.

9
कोई शराबी कभी,
खामोश नही होता,
वो सच कहता है,
और दुनिया उसे शराबी.
10
आज मौलविय ने भग्वान को याद किया,
पंडित ने खुदा से अजान किया,
मयकदा भी क्या क्या रंग दिखाता है,
की शराबियों की कोई जात नही होती,

17 April 2015

एक भोर,

एक भोर,
दूजी भोर,
तीजी भोर,
लगातार होती भोर.....
आज तक मेरे आँगन मी लगे बिही के पेड़ पर
बैठ कर कौए की
कोई कांव-कांव नहीं !
एक शाम
दूजी शाम,
तीजी शाम,
मैं कभी न खड़ी हो सकी
प्रिय की प्रतीक्षा में ,
घर की चौखट पे ....!!
एक-एक कर सारे तीज त्यौहार निकल गए,
मैं विधवा आज भी बेडियों से जकड़ी
आख़िरी दिन के इंतज़ार में हूँ,

05 February 2015

इश्क

जिन्दगी के हर मोड़ में,
तन्हाई ने पकड़ रखा है।
इश्क प्यार और मोहब्बत के,
बुखार ने मुझको जकड़ रखा है।
न किसी वैद्य की दवा,
न किसी मौलबी की दुवा।
मर्ज पर काम करती है,
दिलबर का दीदार,
हजार रोग ठीक करता है।
परदे के ओट के सहारे,
एक झलक पाने को बेताब हूँ,
जमाने के दर्द को झेल कर,
किसी रांझा की हीर बनने को तैयार हूँ।

08 January 2015

मेरे इजहार को न 'न' कहना

 राहों में तुम्‍हारें,
यदि कॉंटे पड़े हो।
तो मै उसकों,
अपनी राहों में ले लूँ।।

सनम जो तुम चाहो,
तो अपने प्राण दे दूँ।
हम सफर बन के तुम्‍हारा,
प्‍यार न्‍यौछावर कर दूँ।।

तेरे निगाहों की कशिश से,
घायल हजार दीवाने है।
मत भूलों प्रिये तुम
कि हजारों में एक है हम।।

नववर्ष में प्रिये पैगाम है,
तेरे जज्‍बात का एहसास है।
अब के प्रिये मिलना तुम,
मेरे इजहार को न 'न' कहना।।

01 February 2010

माँ, सॉफ्टी, अपने और ''मामा जी'' का बचपन

माँ
माँ की ऑचल से प्‍यार बरसता है,
ममता बिन जीवन अधूरा लगता है।
जब उनके हाथो की रोटी मिलती है,
तो सारे संसार का ''वैभव'' छोटा लगता है।।

सॉफ्टी
तेरे सॉफ्टी को देख कर,
मुझे भी खाने का मन कर रहा है।
उफ ये क्‍या तू वहाँ हाफ टी-शर्ट मे,
और मै यहाँ स्‍वेटर मे घूम रहा हूँ।।

अपने
इस दुनिया मे सब बेगाने हो जाते है,
पर अपने तो अपने रहते है।
कभी खुशी हो कभी हो गम,
अपने तो साथ निभाते रहते है।।

''मामा जी'' का बचपन
आज मै अपने बचपन को साथ लिये था,
वही खुशी थी वही भाव था।
सब कुछ वैसा ही था जैसे पहले था,
बस मेरे जगह मेरा भांजा बैठा था।।

27 January 2010

लघुइका


तुम प्‍यार हमे करते हो,
पर कॉल क्‍यो नही करते हो।
जब बैलेंस की चिन्‍ता करते हो,
तो क्‍या खाक प्‍यार हमे करते हो।।

23 January 2010

मै और तस्‍वीर

dard ko
मै रोज उसकी तस्वीर को लेकर,
देर तक निहारता हूँ।
शायद अब मेरे दर्द को समझेगी,
और मेरा हाल पूछेगी।।

अखिर तस्वीर तो भी निष्‍ठुर थी,
अखिर तस्‍वीर भी तो उसकी थी।
मूक तस्‍वीर के आगे मेरी आस टूट गई,
याद मे जी रहा हूँ बस सांस तो टूट गई।।

mai aur tasvir

06 August 2009

चॉंद का प्‍यार भी क्‍या प्‍यार है ?


आपका ही तो है जो हमें उकसा रहा है,
सोते जागते मुझे भरमा रहा है।
आप कोई खवाब नही तो भुला दिये जाओ,
वो एहसास हो जो सब कुछ भुला जाओं ।।

चॉंद का प्‍यार भी क्‍या प्‍यार है ?
वो प्‍यार भी चोरी चोरी करता है।
रात की सुगहरात के बाद,
सुबह अपने अग्रज सूरज से डरता है।।

प्‍यार का एहसास कोई चोरी नही है,
प्‍यार को स्‍वीकार करने में चॉद को हिचक कैसी ?
रात स्‍वप्‍नो को को परवान चढ़ा कर,
पूरे दिन प्रेयसी को प्रेम विरह में तड़पाते हो।।

है निवेदन आपनी तुलना,
उस निगोड़े चॉद से न करो।
जिसमें प्रेम को,
स्‍वीकार करने की हिम्‍मन न हो।।

माना कि तुम वो परवाने हो,
जो जलेगा किन्‍तु उफ़ तक न करेगा।
मग़र तेरे जलने की गर्मी से,
झुलसेगा मेरा तन।।

आवा़ज की कौंध गुजती कानो में,
लगता कुछ खोया-खोया सा है।
क्‍योकि मिटती नही कभी महोब्‍बत,
मिटते है तो सिर्फ मोहब्‍बत वाले।

21 October 2008

जेब ढीली हो ग ई क्या ?

आने वाली है दिवाली

उसके पहले ही होगी जेबें खाली

धनतेरस पर धन जाये

एक खरीदे कंगन अगूठी

मुफ्त पायें।

बीबी की जिंद

बच्चों के कपड़े करते हैं कंगाल

हाय ये मौसम और ये त्योहार

खुश हूँ मैं भी ये दिखता है सब को

अन्दर ही अन्दर दुखता दिल है

और चुप मैं हूँ

करता हूँ मैं अब यही कामना

जाये ये त्यौहार

छूटे जेब का भार

04 October 2008

रात में हम और तुम

रात में हम और तुम, 
अकेले हो। 
साथ और कोई न हो, 
बस हम-तुम।।
********************
तुमने हमको, 
प्यार के तीन शब्दों में बांध लिया है।
सिर्फ 
आई लव यू कह कर।। 
********************
शिक्षा के बाजार में,
शिक्षा रही है बिक।
औने पौने दाम में, 
बेंच सको तो बेंच।।

14 August 2008

दोस्‍ती

दिल के रिश्तों को करीब से देखो,
तो दोस्ती नज़र आती है।
दोस्तों की नज़र में दोस्ती,
मात्र कोई शब्द नही है।
जिधर चल दिये दो पग,
उधर चल दिया दोस्ती का कारवां।
बढ़ती जायेगी उम्र,
लेकिन ये कारवाँ न रूकेगा।

23 July 2008

आसान नही है

राहों में चलते रहना,
आगे बढ़ना,
आसान नही है।

मन्जिल की मन्जिल,
पर चढ़ना,
आसान नही है।

असफलताओं से डर कर,
जिन्‍दगी जीना,
आसान नही है।

दिल पर लगे घावों के,
दर्द को सहना,
आसान नही है।

बीतों हुए लम्‍हों को,
दिल से निकानना,
आसान नही है।

कलेजे के टुकड़े से,
अलग हो कर जीना,
आसान नही है।

मॉं के ऑचल के,
प्‍यार को भूला
पाना आसान नही है।

27 June 2008

उड़ते पंक्षी

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
दुनियां की सैर करते हैं।
ध्यान लगाकर उड़ते जाते,
अपनी मंजिल पर पहुंचा करते है॥

धरा अभूषण देख-देखकर
वहीं रैन बसेरा करतें है।
निश्छल भाव से उड़ते जाते,
नभ से बाते करतें है॥

सूर्य की तपती किरणों से
केवल ऊर्जा पाते जाते है।
जहां रैन बसेरा करना हो,
सुख-चैन की सांसे लेते जाते है॥

प्रेरणा देते पक्षी मानव को
तुम कर्म सदा करते जाओ।
पवित्र भाव के वशीभूत हो,
मानव की सेवा करते जाओ॥

प्रेम से मिलकर तुम रहना
कर्तव्य खूब निभाते जाना।
परस्पर बैर भाव मिटाकर,
श्रध्दा से शीश झुकाते जाना॥

पक्षी गगन में उड़ते जाते
स्वछन्द विचरण करते हैं।
कर्म को उद्देश्य मानकर,
हिमगिरी भी पार करते है॥

प्रेरणा मानव तुम भी लो
आलस्य को दूर भगाना है।
निष्ठा भाव मन में जगाकर,
कर्तव्य निष्ठ बन जाना है॥

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
नई अनुभूति सदा करतें है।
आशा की किरणें पाकर ही,
निज कर्म सदा करतें है॥

23 June 2008

जब याद आयी घर की

जब याद आयी घर की,
घुट घुट कर रोने लगे।
गिरा कर कुछ बूँदे आसूँओं की,
हम चेहरा भिगोने लगे।
जब नींद टूटी सारी दुनियाँ की,
सिमट कर चादर में हम सोने लगे।
जब याद................
करके टुकड़े हजार दिल के,
बीती यादों को पिरोने लगे।
जब याद................
न छूटे दाग दिल के बारिस की बूँदों से,
लेकर आँसूओं का सहारा,हर दाग दिल का धोने लगे।
जब याद................
बिजलियों का खौफ़,
अब तो रहा ही नही।हो के तन्‍हा,
जिन्‍दगी हम ढ़ोने लगे।
जब याद................
ले लिया ग़म को,
अपने आगोश में,
जब कभी दूर अपनो से होने लगे।
जब याद................
खुल गई सारी जंजीरे,
बदन से हमारे,
जब धुये की तरह,ह
वा में खोने लगे।
जब याद................
Dated – 27 मार्च 2005 by प्रलयनाथ जालिम

19 June 2008

बदस्‍तूर एक छोटी सी

बदस्‍तूर एक छोटी सी,

चिन्‍गारी को हवा दिया।

जो आग लगी सारे शहर में,

पानी से बुझा दिया।।

वो चिल्‍लाते रहे हमारी गली,

पर हमारी आवाज को।

सबने गुस्‍से में दबा दिया।।

बदस्‍तूर ...............

घुट-घुट कर जीना हमें भी आता है,

गर्मियों में पसीना हमें भी आता है।

पर क्‍या करें जब जब दी सलाह हमने,

अपने ही लोगों ने हर मर्तबा ठुकरा दिया।।

बदस्‍तूर ...............

हम शराब को पानी समझे,

हकीकत को कहानी समझे।

जो कोई परिन्‍दा लाया पैगाम,

उसको मुन्‍डेर से हमने ही उड़ा दिया।।

दिन भर जगाया महताब,

रात में सुला दिया।

बदस्‍तूर ...............

चिल्‍लाने से तकदीर नही बदलती,

हाथ कटने से तहरीर नही बदलती।

हमें याद थे सारे किस्से अतीत के,

एक एक करके सबको भुला दिया।।

हमने हर हक़ीकत के जाम में,

ज़हर मिला दिया।।

बदस्‍तूर ...............


Dated – 1 अप्रेल 2005 by प्रलयनाथ जालिम

17 June 2008

अर्पित हूँ अर्पिता को

अर्पित हूँ अर्पिता को,

अर्चित हूँ अर्चिता का।

मंद हूँ मंदिता से,

नंद हूँ नंदिता का।।

स्‍नेह है स्‍नेहा से,

नेह हूँ नेहा का।

पूजा का पुजारी हूँ,

हुस्न का भिखरी हूँ।।

गर्व हूँ गर्विता का,

हर्ष हूँ हर्षिता का।

ऋतु का दीवाना हूँ,

नरगिस से बेगाना हूँ।।

राजा हूँ रानी का,

शिव हूँ शिवानी का।

अनुपम हूँ अनुपमा का।।

राम मै हूँ रमा का,

विद्वान हूँ विद्या से।

नित्‍य ही नित्या से,

प्रेम करता हूँ ख्‍वाब में।

गले लगा कर सबकी यादें,

जहर मिला लूँ शराब में।।


12 June 2008

तुमने हमें भुला दिया


तुमने हमें भुला दिया,

हम भी तुम्‍हे भुला देगें।

जो आग लगी दिल में,

किसी रोज बुझा देगे।।

तुमने हमें ..........

तेरी हर अदा दिल में,

तेरी आँखो का नशा दिल में।

तेरे इस नशे को हम,

जाम में मिला देगे।।

तुमने हमें ..........

कितनी तन्‍हा है मेरे घर की तन्‍हारी,

कितनी जुदा है ये तेरी जुदाई।

तेरे निशान को हम

एक-एक करके मिटा देगे।

तुमने हमें ..........

हर शाम गुजारते हम यहाँ मयखाने में,

रोज डूब जाते है, छोटे से पैमाने में।

अब तो अपनी तन्हाई को,

हम साकी बना देंगे।।

तुमने हमें ..........

आज रात मेरे ज़ाम में ज़हर होगा,

कल सुबह के बाद जो दुपहर होगा।

ये लोग मुझको उठाकर,

शमशान तक पहुँचा देगे।।

तुमने हमें ..........

By ज़ालिम प्रलयनाथ, दिनाँक 2 अप्रेल 2005

चित्र सभार संग्रह

11 June 2008

सारे शहर में खुशियाँ ही खुशियाँ

सारे शहर में खुशियाँ ही खुशियाँ,

मेरे घर में मातम है।

दिल मेरे दर्द भरा है,

आँखो में गम ही गम है।।

अपना जीवन कुछ भी नही,

ये नाटक का मंचन है।

सारे शहर में .........


कैसे कैसे किरदार जहॉ में,

कुछ है परेशां, कुछ मस्‍त फिजा में,

कैसे ये खुद को पहचाने

टूटे सारे दर्पण है।

सारे शहर में .........


कुछ है खफ़ा, कुछ नखरे में,

कुछ है आज़ाद खुद पिंजरे में,

कैसे सुनाए हाल-ए-दिल‍हम,

हर दृश्य विहंगम है।

सारे शहर में .........


बादल सारे बिखर गए है

कैसी से ‘प्रलय’ की दुनियाँ,

सुख-दुख का जो संगम है।

सारे शहर में .........


by प्रलयनाथ ज़ालिम, दिनाँक 2 अप्रेल 2005

10 June 2008

ये गुलाबी होंठ , ये शराबी आँखें,


ये गुलाबी होंठ , ये शराबी आँखें,

हमको तेरा दीवाना बनाए।

क्‍यो छिपाए तुमसे कुछ?

हम क्‍यो कोई बहाना बनाए।।

ये गुलाबी ...........


जब से तेरी गली में दाखिल हुए है,

देखकर तेरा हुस्‍न पागल हुए है।

तेरी ये कातिल नजरे,

रोज हमें निशाना बनाए।।

ये गुलाबी ...........


इन जुल्‍फों में हम खो जाए,

तेरे आँचल में हम सो जाए।

तेरी इज़ाजत हो अग

इन आँखों को अपना ठिकाना बनाए।।

ये गुलाबी ...........


तेरे आगे ये शराब कुछ भी नही है

जन्‍नत की परियों का शबाब कुछ भी नही है।

आ जाओं तुम्‍हे हम साकी,

इन आँखों का पैमाना बनाए।।

ये गुलाबी ...........


तुम आकर मेरा हाथ थाम लो

जो खौफ हो, तुम मेरा नाम लो।

चलों कहीं दूर सनम,

हम अपना आशियाना बनाए।।

ये गुलाबी ...........

Written by प्रलायनाथ ज़ालिम,

दिनाँक- 3 अप्रेल 2004