31 August 2015

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका

इस संपूर्ण जड एवं चेतन संसार के कण कण में ईश्‍वर व्याप्त हैं| हिन्दू धर्म ने इस मूल तत्व को आदि काल में ही जान लिया था| वेद एवं पूराण ३३ करोड देवी देवतों का साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं जो कि मानव, पशू, नरपशु, ग्रह, नक्षत्र, वनस्पति तथा जलाशय इत्यादि हर रूप में व्याप्त हैं| पर इनके शिखर पर हैं त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु एवं सदाशिव ... ।

शिव के अनुयायी शैव्य एवं विष्णु के अनुयायी वैष्णव ; प्रतिस्पर्द्धा अपने इष्ट को श्रेष्ठ सिद्ध करने की; संधर्भ - कुछ तथ्य, कुछ भ्रांतिया ; लब्ध - कलेश ।


अनादि काल से चले आ रहे शैव एवं वैष्णव के मध्य चले आरहे प्रतिस्पर्द्धा पर एक आलेख...

विष्णु के भक्त वैष्णव कहलाते हैं तथा शिव भक्त शैव्य | पर वास्तव में अन्य कुछ धर्म एंव समुदाय के विपरीत वैष्णव तथा शैव्य हिन्दू धर्म में संघर्ष का कारण नहीं होते| वस्तुतः शैव्य विष्णू को भी पुजते हैं तथा वैष्णव शिव को भी पूजते हैं| तो वैष्णव तथा शैव्य सिर्फ अपने प्रमूख ईष्ट की मान्यता में एक दूसरे से अलग हैं| वैष्णव भगवान विष्णु को सव देवों में श्रेष्ठ मानता है तथा उन्हे त्रिदेवों से उपर परमेश्वर मानता है, तो शैव्य देवाधिदेव सर्वेश्वर शिव को परमेश्वर जानता है| यह आदि काल से चली आ रही परंपरा है| स्वंय वेद एवं पूराण अनेक उदाहरण प्रस्तूत करते हैं जिसमे शिव तथा विष्णु एक दूसरे अपना ही स्वरूप तथा परस्पर आदर्श बतलाते हैं| पर विघटन प्रकृति का नियम है| वेदोत्तर काल में इस मान्यता में भी अंतर आया| और शैव्य एंव वैष्णव परंपरा का एक कट्‍टर स्वरूप सामने आया ... "वीर शैव्य" तथा "वीर वैष्णव"| वीर वैष्णव का अधिक समय शिव तथा शैव्यों के द्वेष में ही बीतता है| वे शैव्यों के साथ संपर्क नहीं बढाते, वे शिव को नहीं पूजते, यहां तक की वे कभी कभी तो वे शैव्यों से जल भी ग्रहण नहीं करते| ठीक उसी प्रकार वीर शैव्य विष्णु तथा वैष्णवों से द्वेष को अपना परम कर्तव्य जानते हैं| वास्तव में ये शैव्य तथा वैष्णव न होकर "वीर" मात्र रह जाते हैं तथा एक दूसरे के विरोधी होने के बाद भी एक ही परंपरा का अनुसरण करते हैं| ये ज्ञान शुन्य होते हैं तथा अपने ही इष्ट के मूल रूप को नहीं जान पाते हैं| संपूर्ण जीवन साधना के बाद भी इन्हे दिव्य ज्ञान प्राप्त नहीं होता तथा इनकी द्वेष भावना बहुदा इनके ही नाश का कारण सिद्ध होती है| वास्तव में ये अपने इष्ट को प्रसन्न करने की अपेक्षा उन्हे भी अप्रसन्न कर देते हैं| प्रजापती दक्ष का शिव विरोधी होने के कारण सर्वनाश हूआ, यद्यपि वे विष्णू भगवान की शरण में था| ठीक उसी प्रकार परम शिव भक्त होने के बाद भी ॠषि कागभूषंडी को अपने ही इष्ट का क्रोधभाजन बनना पडा तथा उनकी सिद्धियां नष्ट हूईं| कारण उन्होंने भगवान विष्णू के अवतार श्री राम का अनादर किया तथा तथा अपने तत्वज्ञानी गूरू लोमेश को वैष्णव जान उनकी अवहेलना की| वास्तव में लोमेश जैसे ज्ञानी ही परंज्ञान के अधिकारी होते हैं| यथार्थ में ईश्‍वर एक हैं|



वही परम कल्यानकारी तथा सर्वसमुद्भवकारण हैं| शिव का अर्थ होता है कल्यान| अतः जो कल्यानकारी है वही शिव हैं, उही परमात्मा हैं| परमात्मा का कोई स्वरूप नहीं होता| वे शुन्य सामान हैं| रूद्र का अर्थ होता है शुन्य, स्वरूप का ना होना| अतः रूद्र ही परमेश्वर हैं| निराकार परमेश्वर समय, काल तथा कारण के अनुसार अपना स्वरूप ग्रहण करते हैं| शिवपूराण के अनुसार शिव जी ने ही सृष्टी के संपादन के लिए स्वंय से शक्ति को पृथक किया तथा शिव एवं शक्ति के एका से का विष्णू स्वरूप धारण हूआ| विष्णू से ब्रह्मा की उत्पत्ती हूई| ब्रह्मा ने सृजन, विष्णु ने सुपालन का कार्यभार ग्रहण किया| फिर सृष्टी के पूनरसृजन के हेतू विलय की आवश्यकता होने पर शिव ने ही महादेव रूप धारण कर विलय का कार्य अपने हाथों में लिया| विष्णुपूराण के अनुसार परमेश्‍वर ही ब्रह्मा बन कर सृष्टी की रचना करते हैं, वे ही विष्णू बन कर सृष्टी का सुपालन करते हैं, तथा आयू के शेष हो जाने पर वे ही सदाशिव बन कर संहार करते हैं| वास्तव में वे एक ही हैं तथा ये विभिन्न नाम किसी व्यक्ति सामान देवों के नही वरण उन पदों तथा उपाद्धीयों के हैं जिन्हे धारण करण ईश्‍वर अपना कार्य कर रहे होते हैं| यह ठीक उसी प्रकार है जैसे हम एक हैं पर कोई हमें पूत्र जानता है तो कोई पिता, कोई शिष्य जानता है तो कोई गूरु, तथा हम ही किसी के लिए मित्र होते हैं, किसी के लिए शत्रू | और अनेकों के लिए तो हम कूछ होते भी नहीं| पर इन सब के मध्य हम एक ही होते हैं| तो फिर विवाद कैसा? कौन ब्रह्मा, विष्णु, महेश? कौन शिव, कौन शक्ति? जब वे एक ही हैं तो क्या अंतर पडता है यदि कोई उन्हे विष्णु के नाम से जाने तो कोई शिव के नाम से जाने तथा कोई शक्ति के नाम से? ईश्वर एक हैं| वे तीन त्रिदेवों अथवा ३३ करोड देवताओं में ही नहीं, अपितू संपूर्ण सृष्टी के कण कण में व्याप्‍त हैं|वे हमारे नश्‍‍वर शरीर के अन्दर की आत्मा हैं| वे हमारे सदविचार हैं| ब्रह्मा कर्ता हैं, विष्णू कार्य तथा कार्यफल हैं, शिव कारण हैं| त्रिदेव एक वृक्ष के सामन हैं| ब्रह्म उस वृक्ष के तना हैं, विष्णु उस वृक्ष के विस्तार है, डालिया, पत्ते, पूष्प तथा फल सामान हैं| सदाशिव उस वृक्ष के जड हैं| शिव जी की आरती इसी तत्व को संबोधित है| वास्तव में ये त्रिगूण शिव जी की आरती है जिसमे स्पष्ट शब्दों में उलेखित है ... ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव जानत अविवेका|प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका||



संकलित

30 August 2015

धर्म क्षेत्र

  1. इस जन्‍म में कम से कम इतना काम कर लेना चाहिेये, कि मनुष्‍य-जन्‍म से नीची योनि में जन्‍म न लेना पड़े।
  2. अपने घर में अन्न शुद्ध कमाई का होना चाहिये।
  3. धार्मिक पुस्‍तके घर में पड़े पड़े भी कल्‍याण करती है।
  4. स्‍वार्थ और अभिमान का त्‍याग करके अभाग्रस्‍तो को अन्‍न, जल, वस्‍त्रादि देना परम सेवा है।
  5. सत्‍पुरूष ही सत्‍प्रेम कर सकता है।

24 August 2015

श्यामा का दर्द यह शुभ दिन बार बार आये

श्‍यामा को फेफडे का क्षय नही था, बल्कि उसे अंत्र-छय था। जिसे डाक्‍टर लोग छ: वर्ष नही पहचान सके थे, और जब उनहोने उसे पहचाना तो वह लाइलाज हो चुका था। अपरेशन थिएटर में जाते वक्‍त वह जिस प्रकार मुस्‍काराई थी, उसने मुझे उसकी सुहागरात की मुस्कान याद दिला दी थी। वह बच्‍चों की सी मुस्‍कान कर चेहरा मेरे हृदय पर अंकित कर विदा हुई थी। मृत्‍यु शय्या पर वह हँसती रही कहीं मै यह न समझू कि उसे मने में कष्‍ट हो रहा है।
मृत्‍यु के एक दिन पूर्व उसने मेरी आँखों में आँखे डाल कर पूछा, “मै मर जाऊँगी तो तुम बहुत दुखी होगे ?” मै चुप रहा। उसने कहा, “मेरे मरने के बाद बहुत दुखी होना तो शादी कर लेना”। और ठीक मृत्‍यु के दिन उसेने मुझसे कहा था, “ मुझ पर कोई ऐसी रचना करना जिससे, जिससे दुनिया के अंदर मेरी याद रहे।“ कहा था इसलिये कि वह न रहे तो मुझे अपने सूनेपन, अपने खालीपन को भुलाने के लिये कुछ रहे। सृजन से अधिक डुबाने वाला कुछ नही।
संकीर्ण, कट्टरपंथी और प्राय: ईष्‍या द्वेष प्रेरित आलोचकों के आरोप मुझे पत्‍युत्‍र में गीत अथवा कविता लिखने को उकसा जाते थे। ‘कवि की वासना’, ‘कवि की निराशा’, ‘कवि का उपहास’ और ‘पथभ्रष्‍ट’ श्‍यामा की रोग शैय्या के निकट लिखे गये थे। कवि का गीत, लहरों का निमंत्रण और मांझ़ी आदि भी उसी समय की है। श्‍यामा की देहावसान के बाद इन सब कविताओं का संग्रह “मधुकलश” नाम से प्रकाशित हुआ जिसे मैने श्‍यामा की स्‍मृति मे विश्‍व वृक्षकी डाल से बांध दिया, जैसे मृतकों के लिये घंट बांधा जाता है। 27 नवम्‍बर को जिस दिन श्‍यामा का दसवां था उसी दिन मेरी 29वीं वर्षगाठ थी, तार से कई बधाई संदेश मिले ‘यह शुभ दिन बार-बार आये’। समय के इस व्‍यंग पर मुस्काराने के अतिरिक्‍त और क्‍या किया जा सकता था।?

24 July 2015

प. पू. डॉ. हेडगेवार ने कहा -

संगठन ही राष्‍ट्र की प्रमुख शक्ति होती है। संसार में कोई समस्‍या हल करनी हो तो वह शक्ति के आधार पर ही हो सकती है। शक्तिहीन राष्‍ट्र की कोई भी आकांक्षा कभी भी सफन नही होती। पर सामर्थ्‍यशाली राष्‍ट्र कोई भी काम, जब चाहे तब, अपनी इच्‍छानुसार कर सकता है।

16 July 2015

21वीं सदी में मीडिया के समक्ष चुनौतियां व भविष्य

भारतीय लोकतंत्र के स्थाई स्तंभ न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका के बदलते स्वरूप से आज लोकतांत्रिक मूल्यों में दिन पर दिन गिरावट आती जा रही है, जिससे पूरा देश गंभीर संकट के बीच उलझता जा रहा है। पत्रकारिता इसी लोकतंत्र का चौथा स्थाई स्तंभ है। जिसकी सजग भूमिका इस बदलते परिवेश की पृष्ठभूमि को सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ सकती है। ऐसे समय में मीडिया जो पत्रकारिता की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि है, के समक्ष गंभीर चुनौतियों का खड़ा होना स्वाभाविक है तथा उसकी कार्य प्रणाली पर निर्भर है इसका भविष्य। इतिहास साक्षी है। देश पर जब-जब भी गंभीर संकट आया है, पत्रकारिता की सजग पृष्ठभूमि ने ही सही दिशा में मार्ग प्रशस्त कर समूचे देकश को जागृत किया है। इसके आलोक में दुश्मनों को पहचानने एवं उससे लड़ने की उर्जा सदैव मिलती रही है। इसी कारण आज तक इस स्तंभ की साख पूरे देश ही नहीं, विश्व स्तर पर सर्वोच्च बनी हुई है। पूरा तंत्र इससे भयभीत रहता है। तथा इसकी सजग निगाहों के समक्ष खडे होने की किसी में भी गलत तरीके से हिम्मत नहीं होती।
स्वतंत्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर नजर डाले तो इसके जागरूक स्वरूप को देखा जा सकता हैं जहां देश को आजाद कराने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने वाले देशभक्तों ने इसका सहारा लिया। आवाज को जनता तक पहुंचाने उन्हें जाागृत करने में प्रतिबंध लगने के बावजूद भी ऐन-केन प्रकारेण समाचार पत्र निकाले जाने तथा वितरित किये जाने का प्रकरण सभी भली भांति जानते है। लाला लाजपत राय, माखन लाल चतुर्वेदी की कलम को इतिहास कभी भूला नहीं सकता। अनेक गुमनाम एवं चर्चित नाम भी इतिहास के पृष्ठों में अमर पृष्ठभूमि बना चुकें है। जिनकी सजग कलम, प्रखर आवाज ने सदियों की दास्ता से मुक्ति दिलााई। आज फिर से देश गंभीर संकट से गुजर रहा है, जहां लोकतंत्र के स्तंभों में प्रमुख न्यायपालिका, विधायिका, एवं कार्यपालिका का मूल स्वरूप दिन पर दिन स्वार्थ की परिधि में उलझकर बदलता जा रहा है।
विधायिका के बदलते जा रहे स्वरूप का साक्षात प्रमाण यहां के संसद एवं विधायक भवन दे रहें है। जहां गंभीर चिन्तन की जगह असभ्यता के पांव पसारते जा रहे है। दागी ही दगा से पूछ रहा है दागी कौन है। बाहुबल एवं अर्थबल के बढ़ते प्रभाव ने इसकी काया ही बदल गई है। अपराध पर अपराध करते जाइये और जब तक न्यायालय अंतिम रूप से अपराधों न मान लें किसे हिम्मत है जो अपराधी कह दे। न्यायालय भी जब कब्जे मे हो तो निर्णय का मजबूरन पक्ष में होना भी स्वाभाविक है। इस तरह की बदलती पृष्ठभूमि से भी सभी भलीं भांति परिचित है।
जहां न्याय पालिका की बदलती पृष्ठभूमि को आसानी से देखा जा सकता है। आने वाले समय में पक्ष विपक्ष की एकात्मक भूमिका न्यायपालिका के स्वतंत्र वजूद को लील जाने को तैयार बैठी है। कार्य पालिका का स्वरूप भी किसी से अपरिचित नहीं, जिस पर ऐन-केन प्रकारेण विधायिका का वर्चस्व स्वहित में देखा जा सकता है। वैसे कार्य पालिका पर नियन्त्रण हेतु विधायिका होती है, यह पहलू राष्ट्रहित एवं जनहित में सही तो माना जा सकता है। परन्तु जब विधायिका का कार्यपालिका पर नियन्त्रण राष्ट्रहित एवं जनहित को ताक पर रखकर स्वहित में होने लगे तो इस तरह का परिवेश निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए घातक है। आजकल कुछ इसी तरह की पृष्ठभूमि ज्यादा बनती जा रही है। जिसके कारण सरकार बदलते ही कार्यपालिका का स्वरूप बदल जाता है। ऐसे परिवेश में सही कार्य को मूर्त रूप दे पाना कतई संभव नही हो पाता। इस तरह के परिवेश 21वीं सदी की ओर बढ़ते कदम में स्वतंन्त्र सर्वाधिक बनते जा रहे हैं, जहां लोकतंत्र के अस्तित्व के समक्ष गंभीर संकट खड़ा है।
देश में बढ़ता आतंकवाद, भ्रष्टाचार, लूटपाट अनैतिक गतिविधिंयों की भरमार इस बदलते परिवेश की देन हैं। जहां न्यायपालिका भी जब स्वतंत्र पृष्ठभूमि नहीं बना पा रही है। विधायिका क्षेत्र में बढ़ते अनैतिक कदम लोकतंत्र के वास्तविक स्वरूप को ही बदलते जा रहे है। जहां देश का बुध्दिजीवी वर्ग कुंठित हो चला है। यह स्थिति निश्चित रूप से सभी के लिए घातक है। ऐसे परिवेश में जहां विधायिका हर प्रकार से लोकतंत्र के सजग स्तंभों पर हावी होती जा रही है, पत्रकारिता को इस दूषित वातावरण से अपने आपको अलग खड़ा कर अपनी पहचान बनानी होगी, तभी 21वीं सदी में पत्रकारिता का भविष्य सुरक्षित हो पायेगा। आज अर्थयुग का परिवेश चारों तरफ हावी नजर आ रहा है। इस परिवेश के बीच अपने वास्तविक स्वरूप को खड़ा करना एवं उजागर कर पाना मीडिया के समक्ष गंभीर चुनौतिया है, जिसे लीलने को विधायिका तैयार बैठी है। आज समूचा देश फिर से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता की ओर आत्मविश्वास के साथ आत्मरक्षा कवच पाने की लालस देख रहा है। जहां इस भ्रष्ट होती जा रही व्यवस्था को दूर करने का मार्ग प्रशस्त हो सके। यह आजादी पाने की दिशा मेें नई जग की शुरूआत मानी जाएगी। जहां मीडिया को आज तड़क-भड़क आर्थिक युग की पृष्ठभूमि में अपनी पहचान बनाये रखनी होगी। यही 21वीं सदी की मीडिया के समक्ष गंभीर चुनौतियां है। तथा इसकी सफलता में उसका भविष्य सुरक्षित है।

03 July 2015

क्‍या आप सही हिन्‍दी लिख रहे है ?

अक्सर हम हिन्दी को लेकर दुविधा में रहते हैं, कि क्या हम सही बोल/लिख रहे है? इसका मुख्‍य कारण यह है कि हम गलत लिखते है इसलिये गलत उच्चारण भी करते हैं। जैसे कुछ लोग हिन्दी को हिन्दि, मालूम को मालुम या मलूम, विष का विश या विस और स्थान को अस्थान आदि लिखते है। यही कारण है कि वे बोलने में भी लिखने के अनुसार उच्चाकरण करते है। आज से हिन्दी की कक्षा शुरू हो रही है, इस कक्षा में हम कुछ ऐसे ही शब्दों ठीक करने का प्रयास करेगें।
गलत शब्‍द
सही शब्‍द
अस्‍पष्‍ट
स्‍पष्‍ट  
अस्‍कूल
स्‍कूल  
अस्‍थान
स्‍थान  
अछर, अच्‍छर
अक्षर
अस्‍नान
स्‍नान  
अस्‍पर्श 
स्‍पर्श  
गिरस्‍थी
गृहस्‍थी 
बेजजी, बेज्‍जती 
बेइज्ज़ती
स्त्रि, इस्‍त्री     
स्‍त्री
छिन भर, छन भर
छण भर
भगती, भक्‍ती
भक्ति
इस्थिति
स्थिति
छमा   
क्षमा   
मतबल 
मतलब
उधारण 
उदाहरण
ज़बरजस्‍ती     
जबरदस्‍ती
मदत  
मदद
उमर
उम्र   
नखलऊ, लखनउ
लखनऊ
मुकालबे
मुकाबले
अस्‍‍तुति
स्‍तुति
प्रालब्‍ध 
प्रारब्‍ध
शाशन, सासन, साशन,  
शासन 
बिद्या  
विद्या
शाबास 
शाबाश 
ग्यान
ज्ञाऩ
छत्रिय  
क्षत्रिय  
अधिकतर लोग इन शब्‍दों में हमेशा गलती करते है। कुछ ऐसे अक्षर भी जिनके कारण यह गलती हमेशा होती रहती है। वे अक्षर है- इ/ई, उ/ऊ, ए/ऐ, ओ/औ, स/श/ष, घ/ध और क्ष/छ को लिखने में गलती करते है, और यही कारण है कि हम लिखने के साथ बोलने में भी अशुद्धि दिखाते है।
गृहकार्य- यदि आपको भी कुछ ऐसे शब्दो का ज्ञान हो जिनका उच्‍चारण गलत होता है, बताइयेगा ताकि अगली कक्षा में उसे समायोजित किया जाय। अगली कक्षा के गुरूजी प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह रहेगें, बड़े शख्‍़त गुरूजी है उनसे बच कर रहना।

13 June 2015

हिन्‍दू विवाह

हिन्‍दू विवाह एक संस्‍कार हुआ करता था किन्‍तु भारत सरकार के द्वारा हिन्‍दू‍ विवाह अधिनियम, 1955 के अनुसार अब न यह संस्‍कार है और न ही संविदा। अपितु यह दोनो का समन्‍वय हो गया है। भारत सरकार के इस अधिनियम से निश्चित रूप से हिन्‍दू भावाओं को आधात पहुँचा है क्‍योकि यह हिन्‍दू धर्म की मूल भावानाओं का अतिक्रमण करता है तथा संविधान की मूल भावनाओं का उल्‍लंघन करता है।
हिन्‍दू विवाह जहॉ जन्‍मजन्‍मान्‍तर का संबध माना जाता था इसे एक खेल का रूप दे दिया गया है तथा हिन्‍दुओं की प्रचीन पद्धति को न्‍यायालय को मुहाने पर खड़ा कर दिया गया, जिसे परमात्‍मा भी भेद नही सकते थे। महाभारत में स्‍त्री पुरूष का अर्ध भाग है तथा पुरूष बिना स्‍त्री के पूर्णत: प्राप्‍त नही कर सकता है। धर्म के लिये पुरूष तथा उपयोगी होता है जबकि उसके साथ उसकी धर्म प‍त्‍नी साथ हो, अन्‍यथा पुरूष कितना भी शक्तिशाली क्‍यो न हो वह धर्मिक आयोजनों का पात्र नही हो सकता है।
रामायण में भगवान राम भी सीता आभाव में धर्मिक आयोजन के योग्‍य नही हु‍ऐ थे। रामायण कहती है कि पत्नी को पति की आत्‍मा का स्‍वरूप माना गया है। पति अपनी पत्नि भरणपोषण कर्ता तथा रक्षक है।
हिन्दू विवाह एक ऐसा बंधन है जिसमें जो शरीर एकनिष्‍ठ हो जाते है, किन्‍तु वर्तमान कानून हिन्‍दू विवाह की ऐसी तैसी कर दिया है। हिन्‍दू विवाह को संस्‍कार से ज्‍यादा संविदात्‍मक रूप प्रदान कर दिया है जो हिन्‍दू विवाह के स्‍वरूप को नष्‍ट करता है। हिन्‍दू विवाह में कन्‍यादान पिता के रूप में दिया गया सर्वोच्‍च दान होता है इसके जैसा कोई अन्‍य दान नही है।
विवाह के पुश्‍चात एक युवक और एक युवती अपना वर्तमान अस्तित्‍व को छोड़कर नर और नारी को ग्रहण करते है। हिन्‍दू विवाह एक बंधन है न की अनुबंध, विवाह वह पारलौकिक गांठ है जो जीवन ही नही मृत्‍यु पर्यन्‍त ईश्‍वर भी नही मिटा सकता है किन्‍तु भारत के कुछ बुद्धि जीवियों ने  हिन्‍दू विवाह की रेड़ मार कर रख दी है इसको जितना पतित कर सकते थे करने की कोशिश की है। भगवान मनु कहते है कि पति और पत्नि का मिलन जीवन का नही अपितु मृत्‍यु के पश्चात अन्‍य जन्‍मों में भी य सम्‍बन्‍ध बरकरार रहता है। हिन्‍दू विवाह पद्धिति में तलाक और Divorce शब्‍द का उल्‍लेख नही मिलता है जहॉं तक विवाह विच्‍छेन का सम्‍बन्‍ध है तो उसे शब्‍द संधि द्वारा बनाया गया। अत: हिन्‍दु विवाह अपने आप में कभी खत्‍म होने वाला सम्‍बन्‍ध नही है।
वयस्‍कता प्राप्‍त करने पर,संतानों को मनमानी करने का फैसला निश्चित रूप से हिन्‍दू ही नही अपितु पूर भरतीय समाज के लिये गलत था। क्‍या मात्र 18 वर्ष की सीमा पार करने पर ही पिछले 18 वर्षो के संबध की तिलाजंली देने के लिये पर्याप्‍त है? है
1914 के गोपाल कृष्‍ण बनाम वैंकटसर में मद्रान उच्‍च न्‍यायाल ने हिन्‍दु विवाह को स्‍पष्‍ट करते हुये कहा कि हिन्‍दू विधि में विवाह को उन दस संस्‍कारों में एक प्रधान संस्‍कार माना गया है जो शरीर को उसके वंशानुगत दोषों से मुक्‍त करता है।
इस प्रकार हम देखेगें तो पायेगें कि हिन्‍दू विवाह का उद्देश्‍य न तो शारीरिक काम वासना को तृप्‍त करना है वरन धार्मिक उद्देश्‍यों की पूर्ति करना है। आज हिन्‍दू विवाह को कुछ अधिनियमों ने संविदात्मक रूप प्रदान कर दिया है तो हिन्‍दू विवाह के उद्देश्‍यों को छति पहुँचाता है।
अभी बातें खत्‍म नही हुई और बहुत कुछ लिखना और कहना बाकी है। समय मिलने पर इस संदर्भ में बाते रखूँगा।

10 June 2015

दृश्‍य और अदृश्‍य युद्ध

भारत ही है जो इतने प्रकार के हमलो के बावजूद अपनी आत्‍मा को मरने नही देता। यह अपने मूल मे यथावत जीवित है। जीवित ही नही बलकि यह उन तमाम सभ्‍यताओं को आईना दिखाता है जो अपने को श्रेष्‍ट घोषित करने में थकते नही है। अन्‍य सभ्‍यताऐं जहॉं उपासना और उपसना पद्धति के हिसाब से मनुष्‍य को चिन्हित करती है, वहीं भारत मनुष्‍यता और मनुष्‍य को महत्‍व देता है। यही कारण है कि इतिहासकारों ने कहा है कि “ग्रीक मिटे यूनान मिटे कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नही हमारी।”

आज भी भारत पर हमले हो रहे है। ये हमले दृष्‍य और अदृश्‍य दोनो प्रकार के है। दृष्‍य हमला वो है जो दिखाई देता है जैसे अंतकवाद। अदृश्‍य हमला वह है जो दिखाई नही देता है, किन्‍तु इसके व्‍यापक परिणाम होते है। इसके भी पर्याप्‍त उदाहारण है, आपस मे वैमनस्‍य पैदा करना, विश्‍वास का अविश्‍वास में बदलना, आस्‍था को अनास्‍था में बदलना। यह हमला ऐसा हमला है, जिसे हम समझ नही पाते है, किन्‍तु इसे बच पाना अत्‍यनत कठिन है।

आज यही हमला भारत पर हो रहा है इससे सामान्‍य जन ही नही अच्छे से अच्‍छे विद्वानों के मस्तिष्‍क में यह प्रश्‍न खड़ा हो जाता है, कि सच क्‍या है ? हम क्‍या करें ? हम कहॉं खडे़ हो ? सच्‍चाई समझ मे नही आती जिसको जिसने प्रभावित किया वे वैसा ही कहने लगता है। यह प्रभाव क्‍या है और कैसे है ? यह रहस्‍य नही, इसे गोदान में जमीदार और सम्‍पादक की वार्ता से समझा जा सकता है। फर्क बस इतना है कि जमीदार स्‍वयं को बचाना चाहता है और आज कुछ प्रभावी लोग भारत को नीचा दिखाना चाहते है सही कारण है कि डेनमार्क मे बने एक कार्टून के लिए भारत में नंगा नाच हुआ। सभी चुप रहे और किसी ने इसकी भर्तसना नही की। कला की स्‍वतंत्रता की वकालत करने वाली शबाना आज़मी भी कही दिखाई नही दीं।

वहीं कुछ देवी देवताओं की अश्‍लील चित्र बनाये गये तो क्‍या हुआ? यह कहने की आवाश्‍यकता नही है। यह भी एक प्रकार का हमला है, इसकी तह में जाना अभी आवाश्‍यक नही है। यह हमला क्‍यों और किसके द्वारा हो रहा है, इसकी चर्चा फिर कभी करूँगा। इन हमलों के माध्‍यम से आज इस अजेय भारत को कोई जीतना चाहता है यहाँ की मूल आत्‍मा को मार कर वैमनस्‍य के अटल बीज बोने का प्रयास किया जा रहा है। इस हमले से बचाब का क्‍या रास्‍ता है?

22 May 2015

सप्तदचिरजीवि स्तुति:

अश्वत्थारमा बलिर्व्या सो हनुमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तैते विरजीजीविन:।।
सत्ते्तान् संस्मररेन्नित्यं मार्कण्डेवयमथाष्टमम्।
जीवेद् वर्षशतं सो‍Sपि सर्वव्यातधिविवर्जित:।।

स्‍तुति पाठ से लाभ- उक्‍त स्‍तुति के पाठ करने से यात्रा सुखद होती है, रोग-व्‍याधि का निवारण हो आयु में वृद्धि होती है। इस मंत्र के उत्‍तम परिणाम के लिये नित्‍य प्रात: व रात्रि में आठ-आठ बार वाचन करना चाहिए।

17 May 2015

मैं


जब भी अच्छा काम हो श्रेय ले जाते हैं वे
क्योंकि उनके सिर चढा है मैं

मैं यों तो छोटा सा है शब्द
मगर फैलाता है बडा दुख- दर्द
मौसम चाहे सर्द हो चाहे हो गर्म
मै ही है सबसे बडा मर्म

" मैं" " मैं" करते लुट गए कई लाख
मिट्टी में मिलकर होना है सबको खाख

मिट्टी में मिलकर भी नही मिटता है मैं
क्योंकि उनके सिर चढा है मैं

कई बुत व सडकें बनती हैं उनके नाम पर ,
कई बातें गढ़ी जाती हैं उनके काम पर,
समाज में ऊँचा रूतबा होता है उनका ,
लूटते हैं जिसे वे   वह होती है जनता,
गुपचुप करते हैं धन्धे चोरी के ,
भाषणों में बनते हैं निन्दक चोरी के ,

कईयों का खाख में मिलाकर ,
अपने रस्ते से मिटाकर ,
जब खुद जाते हैं खाख में ,
तब भी नही मिटता है मैं
क्योंकि उनके सिर चढा है मै, और
हर अच्छे काम का श्रेय ले गये हैं वे।
कवि - श्री तरूण जोशी ''नारद''