12 March 2008

जनतंत्र की शक्ति

image

हर तरफ आवाज उठती,
दबा रही सरकारें है।
नही दबेगीं वे आवाजें,
ये शेर की दहाड़े है।

देश का वैभव अब चमकेगा,
आयेगी खुशहाली।
चट्टने चाहे जितनी आये,
नही रूकेगी धाराऐं।।

प्रतिशोध का समय है,
जनमत का उपयोग करों।
जो सरकार निक्‍कमी हो,
उसको मूल से नाश करों।।

रोटी कपड़ा और छत,
यह आधार भूत जरूरते है।
जिन शासको को यह न दिखें,
उनका जाना जरूरी है।।

भरो हुँकार, रख रूप खूँखार,
सारी शक्ति तुममे है।
क्‍योकि तुममें ही,
जनतंत्र की वास्‍तविक शक्ति है।।

10 March 2008

मुकुल के दोहे

प्रिया बसी है सांस में मादक नयन कमान
छब मन भाई,आपकी रूप भयो बलवान।
सौतन से प्रिय मिल गए,बचन भूल के सात
बिरहन को बैरी लगे,क्या दिन अरु का रात
प्रेमिल मंद फुहार से, टूट गयो बैराग,
सात बचन भी बिसर गए,मदन दिलाए हार ।
एक गीत नित प्रीत का,रचे कवि मन रोज,
प्रेम आधारी विश्व की , करते जोगी खोज । ।
तन मै जागी बासना,मन जोगी समुझाए-
चरण राम के रत रहो , जनम सफल हों जाए । ।

दधि मथ माखन काढ़ते,जे परगति के वीर,
बाक-बिलासी सब भए,लड़ें बिना शमशीर .
बांयें दाएं हाथ का , जुद्ध परस्पर होड़
पूंजी पति के सामने,खड़े जुगल कर जोड़

06 March 2008

महिला दिवस पर एक चिंतन "चिंता नहीं चिंतन की ज़रूरत है"

महिला दिवस पर एक चिंतन "चिंता नहीं चिंतन की ज़रूरत है"
महिला सशक्तिकरण की चिंता करना और समाज के समग्र विकास में महिलाओं की हिस्सेदारी पर चिंतन करना दो अलग-अलग बिन्दु हैं ऐसा सोचना बिलकुल गलत है । लिंग-भेद भारतीय परिवेश में मध्य-कालीन देन है किन्तु अब तो परिस्थितियाँ बदल रहीं है किन्तु बदलती तासीर में भी महिला वस्तु और अन्य वस्तुओं के विक्रय का साधन बन गयी है। अमूल माचो जैसे विज्ञापन इसके ताज़ा तरीन उदाहरण हैं .क्या विकास के इस फलक पर केवल विज्ञापन ही महिलाओं के लिए एक मात्र ज़गह है...? ऑफिस में सेक्रेटरी,क्लर्क,स्टेनो,स्कूलों में टीचर,बस या इससे आगे भी-"आकाश हैं उनके लिए॥?"हैं तो किन्तु यहाँ सभी को उनकी काबिलियत पे शक होता है .होने का कारण भी है जो औरतैं स्वयम ही प्रदर्शित करतीं हैं जैसे अपने आप को "औरत" घोषित करना यानी प्रिवलेज लेने की तैयारी कि हम महिला हैं अत:...हमको ये हासिल हों हमारा वो हक है , .... जैसा हर समूह करता है।.....बल्कि ये सोच होनी चाहिए कि हम महिलाएं इधर भी सक्षम हैं...उस काम में भी फिट...! यहाँ मेरा सीधा सपाट अर्थ ये है की आप महिला हैं इसका एहसास मत .होने दीजिए ...सामाजिक तौर पे स्वयम को कमजोर मत सिद्ध करिए ... वरन ये कहो की-" विकास में में समान भागीदार हिस्सा हूँ.....!"दरअसल परिवार औरतों को जन्म से औरत होने का आभास कराते हैं घुट्टी के संस्कार सहजता से नहीं जाते ।आगे जाते-जाते ये संस्कार पुख्ता हो जातें हैं।मसला कुल जमा ये है कि महिला के प्रति हमारी सोच को सही दिशा की ज़रूरत है...वो सही दिशा है समग्र विकास के हिस्से के तौर पर महिला और पुरुष को रखने की कोशिश की जाए॥

इस संबंध कानून और सरकारों के अपने-अपने वादे थे सो पूरे किए जा रहे है जैसे महिला उत्पीडन, को रोकने के कानून,भ्रूण हत्या के खिलाफ़ प्रिवेंसन,घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानून, किन्तु समाज में कानूनों का कितना सम्मान किया जा रहा है , कैसे कानून से खुद को बचाने के तरीके खोजे जा रहें हैं सभी समझते हैं। अब तो ज़रूरत है सामाजिक जागरण की यही जागरण महिलाओं की स्थिति में सुधार, को सही दशा और दिशा मिलेगी

05 March 2008

रात की रानी की तरह महकती हूँ



रात की रानी की तरह महकती हूँ,
दिन के राज के लिये तरसती हूँ।
शाम होने पर वो चला जाता है,
सुबह होने पर मै चली जाती हूँ।

मिलने के लिये तरसते है दोनो,
वक्‍त के फेर में तड़पते है दोनो।
मिलन की की आस में दोनों,
दिन-रात में महकते है दोनों।

04 March 2008

देश बनाम वोट बैंक

पिछले दिनों केन्द्र की यू पी ए सरकार ने एक ऐतिहासिक घोषणा की। इस घोषणा ने एक नई चर्चा को जन्म दे दिया। ये घोषणा थी:
"आतंकवादियों के आश्रितों को पेंशन देने की"

इस घोषणा ने एक नया विवाद खड़ा किया, परन्तु देश के कथित बुद्धिजीवियों और मीडिया ने कोई प्रतिक्रिया नही दर्ज की क्यूंकि मीडिया तो देश के सबसे बड़े खेल क्रिकेट और फ़िल्म जगत के बारे में बहुत ही महत्वपूर्ण ख़बर देने में लगा था गोया वो देशहित का काम कर रही हो।

यह विवाद था कि "क्या देश के लोगों को मारने वाले, देश के विरुद्ध कार्यरत लोग ये सम्मान पाने के हकदार हैं ?"

आप सभी ये जानते हैं कि इससे पहले ये सम्मान कुछ तरह के लोगों को मिलता आया है , ये लोग हैं:
  • सरकारी कर्मचारी।
  • देश कि रक्षा विभाग में अपनी सेवाएं देने वाले अधिकारी, वैज्ञानिक।
  • देश कि रक्षा करने वाले सिपाही।
  • देश के लिए शहीद होने वाले स्वतंत्रता सेनानी।
  • देश के लिए जान देने वाले सैनिक के परिजन।
  • देश के नेतागण जिन्होंने लोक सभा, राज्य सभा, विधान सभा, विधान परिषद् में काम किया हो।
  • देश के राष्ट्रपति ।
अब ये सम्मान देशद्रोहियों को भी प्राप्त होगा, जो काफी अचरज की बात है।

क्या ये इन लोगों का अपमान नही है?
क्या देश के लोगों ने इसका विरोध करना चाहिए ?

शायद ये काम देश के कथित अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिए किया गया है, जबकि शायद ये लोग ये नही जानते कि अल्पसंख्यक में जो भारतीय हैं उन्हें इन ओछ्हे तरीकों से भरमाया नही जा सकताकेवल उन लोगों को अपने तरफ़ मोडा जा सकता है जो देश के ख़िलाफ़ काम करते हैं। ये लोग ये भूल जाते हैं की ये सब करके वो आतंक को बढावा देते हैं।

वैसे इस सन्दर्भ में एक और बात याद आती है:
जब देश के बजाय अपनी सेवा करने के लिए राजनीति में आये लोगों को देश के बड़े सम्मानों से नवाजा जा सकता है, तो ये भी शायद ग़लत नहीं (आपने शायद इस बार का पद्म भूषण, विभूषण और श्री पुरस्कारों का वितरण याद रखा हो, जिसमे कुछ राजनीतिज्ञों को भी तवज्जो दी गई, भले ही उन्होंने देश के लिए कुछ भी ना किया हो )।

देखते हैं की इस देश के प्रशासकों का चरित्र और कितना नीचे गिरता है ?
या फ़िर हमें आगे आक़र ये सब रोकना पड़ेगा और इसके ख़िलाफ़ हल्ला बोलना होगा।

02 March 2008

"भगवान का प्यार कैसा होता है ?"

"भगवान के प्यार करने के तीन तरीके हैं-पहला भगवान जिसे प्यार करते है, उसे ‘संत’ बना देते हैं । संत यानी श्रेष्ठ आदमी । श्रेष्ठ विचार वाले,शरीफ़,सज्जन आदमी को श्रेष्ठ कहते है । वह अन्तःकरण को संत बना देता है । दूसरा-भगवान जिसे प्यार करते हैं उसे ‘सुधारक’ बना देते है । वह अपने आपको घिसता हुआ चला जाता है तथा समाज को ऊँचा उठाता हुआ चला जाता है। तीसरा-भगवान जिसे प्यार करते है उसे ‘शहीद’ बना देते है । शहीद जिसने अपने बारे में विचार ही नही किया । समाज की खुशहाली के लिए जिसने अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया, वह शहीद कहलाता है ।जो दीपक की तरह जला, बीज की तरह गला,वह शहीद कहलाता है। चाहे वह गोली से मरा हो या नही, वह मैं नहीं कहता, परन्तु जिसने अपनी अक्ल, धन, श्रम, पूरे समाज के लिए अर्पित कर दिया , वह शहीद होता है । जटायु ने कहा कि आपने हमें धन्य कर दिया । आपने हमें शहीद का श्रेय दे दिया, हम धन्य हैं । जटायु , शबरी की एक नसीहत है । यह भगवान की भक्ति है । यही सही भक्ति हैं ।"

 

  • "गुरुवर की धरोहर-३"  से

हास्य कविता :प्रतियोगिता

हास्य कविता :प्रतियोगिता मित्रो,होली के अवसर पर आप सभी कलम उठाइए , लिखा भेजिए एक छोटी सी हास्य रचनामध्य-प्रदेश लेखक संघ, जबलपुर की और सेप्रथम तीन विजेता प्रतिभागीयों को क्रमश: 300/- , 200/- तथा 100/- की पुरूस्कार राशी एक एक प्रशस्ति पत्र भेजा जावेगा। 10 प्रतिभागी भी सम्मानित होंगे,नियम:रचना की मौलिकता ज़रूरी होगी,स्पष्ट पता -मेल आई डी , तथा मौलिकता की घोषणा पत्र , रचना के साथ संलग्न हों। कविता ए-फॉर आकार के पेज से अधिक लम्बी होने पर प्रतियोगिता से हटाने का अधिकार निर्णायक मंडल का होगा व्यक्तिगत आक्षेप न हों एक रचना कार एक रचना ही भेज सकते हैं,यूनीकोड पर टंकित कर ने इस लिंक का सहारा लीजिये => http://www.google.com/transliterate/indicतथा रचना/प्रविष्ठी girishbillore@gmail.com पर मेल करिए अन्तिम तिथि:- १०/०३/२००८ गिरीश बिल्लोरे "मुकुल "

“दैनिक भास्कर” की चाय पार्टी नौटंकी

Dainik Bhaskar Indore Tea Party

हाल ही में इन्दौर में दैनिक भास्कर अखबार द्वारा एक सामूहिक चाय पार्टी का आयोजन किया गया था। जिसमें लगभग 32000 लोगों ने एक साथ चाय पी और इस “करतब” को गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दी गई। इसके लिये गिनीज बुक की विशेष प्रतिनिधि इन्दौर आईं थीं और उन्होंने सारे वाकये की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की।

सबसे आपत्तिजनक लेकिन मजे की बात यह थी कि इस बड़े तामझाम को “इन्दौर के विकास” से जोड़ा गया। महीने भर तक “भास्कर” में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर बताया गया कि “सारा इन्दौर” दैनिक भास्कर के साथ एकजुट होगा, इससे इन्दौर की एकता प्रदर्शित होगी, इससे इन्दौर का विकास होगा आदि-आदि। अमूमन ऐसी लफ़्फ़ाजियाँ आमतौर पर मार्केटिंग “गुरु”(?) अपनाते रहते हैं। प्रत्यक्ष तौर पर किसी मूर्ख को भी दिखाई दे रहा है कि यह सारी कवायद इन्दौर के विकास (?) के लिये तो बिलकुल नहीं थी, सिर्फ़ “रिकॉर्ड” बनाने के लिये भी नहीं थी, यह साफ़-साफ़ दैनिक भास्कर की मार्केटिंग का एक फ़ंडा था, जिसमें ब्रुक बाँड रेड लेबल नाम की चाय कम्पनी ने भी एक प्रमुख भूमिका निभाई।

हम भारतवासियों को नाटक-नौटंकी-खेल-तमाशे-झाँकी-झंडे की जैसे आदत सी पड़ गई है, यदि कोई काम सीधे तौर पर ईमानदारी से कर दिया जाये तो लगता ही नहीं काम हुआ है। कोई भी काम करने के लिये (और यहाँ तो कोई काम भी नहीं करना था, चाय पिलाने के अलावा) बड़ा सा तमाशा होना जरूरी है। फ़िर उस तमाशे को कोई एक “नोबल” सा नाम दिया जाये, ताकि लोगों को लगे कि “देखो हम तो कितने नाकारा हैं कि घर से उठकर मुफ़्त की चाय पीने भी नहीं जा सकते, और अगला है कि मेहनत किये जा रहा है इन्दौर के विकास के लिये, कितनी पीड़ा है उसके मन में इन्दौर की तरक्की के लिये।

एक साथ हजारों लोगों के चाय पीने से इन्दौर का विकास कैसे होगा यह समझ में नहीं आता, क्या उससे खराब सड़कें ठीक हो जायेंगी, या हजारों कप चाय पीने भर से इन्दौर के भदेस लोग ट्रैफ़िक नियम सीख जायेंगे, या एक स्टेडियम मे इकठ्ठे होकर गाना-बजाना कर लिया तो इन्दौर का प्रदूषण कम हो जायेगा, या फ़िर भू-माफ़िया अचानक गाँधीवादी हो जायेगा और हथियाई हुई जमीनें सरकार को वापस भले न करे, लेकिन उसके पूरे पैसे सरकार को दे देगा।

जाहिर है कि ऐसा कुछ भी नहीं होना है, न कभी हुआ है, न कभी होगा। लेकिन भारत की जनता को ऐसी नौटंकियों से बहलाया खूब जा सकता है, और इस काम में हमारे नेता और कथित मार्केटिंग गुरु उस्ताद हैं, लेकिन कोढ़ में खाज की बात यह है कि अब इस तमाशे में अखबार भी शामिल हो गये हैं, उन्हें भी अपनी “रीडरशिप” और “खपत संख्या” की चिंता सताने लगी है। जिस अखबार को सरकार, सरकारी कारिंदों, भ्रष्ट अधिकारियों, भू-माफ़ियाओं, अवैध अतिक्रमणों, प्रदूषण जैसी समस्याओं को लेकर अपने अखबार में आग उगलना चाहिये, रोजाना एक से बढ़कर एक भंडाफ़ोड़ करना चाहिये, प्रशासन की नाक नाली में रगड़ना चाहिये, वह चाय पिलाने में लगा हुआ है “विकास” और “एकता” के नाम पर…

हालांकि यह कोई पहला और आखिरी उदाहरण नहीं है, कुछ माह पहले भी मध्यप्रदेश सरकार ने सभी स्कूलों में बच्चों को “गरीबी हटाने” की शपथ दिलवाई थी। अब खुद ही सोचिये, स्कूलों में बच्चों को गरीबी हटाने की शपथ दिलाने से गरीबी कैसे मिट सकती है? जिन आईएएस अफ़सरों और सरकार ने मिलकर यह नौटंकी रचाई थी, गरीबी तो दर-असल उन्हीं लोगों के कारण फ़ैली है, भला उसमें स्कूली बच्चे क्या करेंगे? लेकिन नहीं, वही तथाकथित “उत्सवशीलता” और “जनभागीदारी” के नाम पर जैसे धर्मगुरु तमाशे करते हैं, आये दिन सरकारें, एनजीओ, प्रशासन कुछ न कुछ करता रहता है। कभी एड्स को लेकर मानव श्रृंखला बनाई जायेगी (भले ही अस्पतालों की हालत नरक से बदतर बना दी हो), कभी बच्चों के हाथों में तख्तियाँ पकड़ा कर पोलियो का प्रचार किया जायेगा, कभी कोई प्रवचनकार अपने ढोल-नगाड़े-बैंड-बाजे के साथ एक लम्बी सी शोभायात्रा निकालेंगे (जाहिर है कि विश्व शांति के नाम पर), कहने का मतलब यह कि ईमानदारी से काम करने के अलावा सब कुछ किया जाता है। इस सारे खेल में लाखों रुपया कभी एनजीओ खा जाते हैं, कभी अफ़सर खा जाते हैं, कभी ठेकेदार और उद्योगपति खा जाते हैं…

जनता भी ऐसी होती है कि जैसे उसे अपनी समस्याओं से कोई लेना-देना ही न हो। लोग-बाग आते हैं, तमाशा देखते हैं, चाय-वाय पीते हैं, प्रवचन हों तो तर घी का चकाचक प्रसाद ग्रहण करते हैं, पिछवाड़े से हाथ पोंछते हैं और अपने-अपने घर !!! वाकई क्या मूर्खता है… रही बात दैनिक भास्कर की, तो फ़िलहाल तो वह “माल” कूटने में लगा हुआ है, ढेरों विज्ञापन, ढेरों संस्करण, न जाने क्या-क्या बेचने के लिये विशेष परिशिष्ट (?), महिलाओं की किटी पार्टी जैसी थर्ड क्लास बात की भी पेज भर की रिपोर्टिंग, ताजमहल के लिये SMS भिजवाने की मुहिम, हिन्दी की दुर्दशा और भाषा का भ्रष्टाचार बढ़ाने में भी ये सबसे आगे हैं… आखिर ये हो क्या रहा है? और खुद को कहलाते हैं भारत का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार (आज तक चैनल भी ऐसा ही दावा करता रहा है, और उसका स्तर क्या है सभी जानते हैं)। सिर्फ़ एक छोटी सी बात यह भूल गये हैं वह है “पत्रकारिता और अखबार का लक्ष्य तथा उनकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियाँ”…

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

01 March 2008

पिछली पोस्‍ट एग्रीगेटरों के शिकंजे से बच निकली

इस ब्‍लाग की पिछली पोस्‍ट एग्रीगेटरों के शिकंजे से बच निकली, ऐसा कैसे हुआ मुझे पता नही चल सका। यह देखना है कि यह किस कारण हुआ मुझे पता नही चल पाया। यह देखने के लिये यह पोस्‍ट कर रहा हूँ।

पिछली पोस्‍ट का लिंक निम्‍न है - भारत विकासशील देश है या नहीं?
आज का एक वाकया है जिसने मुझे ये सोचने पर मजबूर कर दिया की भारत विकासशील देश है या नहीं?

यह वाकया था ट्रैफिक सिग्नल पर तमाशा दिखा कर पैसे कमाने वाले छोटे बच्चों का:
हुआ कुछ ऐसा की एक साक्षात्कार के सिलसिले में मैं गुरगांव से गाजिअबाद गया था। लौटते समय मैंने ग्रेटर कैलाश के आस पास ट्रैफिक सिग्नल पर कुछ बहुत छोटे बच्चों को तमाशा दिखा कर पैसे मांगते देखा जिसने मेरा ध्यान आकर्षित किया। दृश्य के केन्द्र में एक मैलेकुच्ले कपडों में बच्ची थी, जो शरीर से करतब दिखा कर गुजरती गाड़ी वालों से पैसे मांग रही थी।पास की ही बस्ती में प्लास्टिक के तम्बुओं में शायद उसपे माता पिता रहते थे

दूसरा दृश्य जिसने मेरा ध्यान भंग किया जब मेरी गाड़ी आगे बढ़ी वो कुछ ऐसे था:
ये दृश्य था बच्चों द्वारा ट्रैफिक पर भीख मांगने का। साकेत का था ये किस्सा । इस घटना ने मुझे ये सोचने पर मजबूर किया की अगर विकासशील देश की राजधानी में धन का इतना असमान वितरण है टू बाकि शहरों का अंदाजा लगना कठिन नहीं है ।
क्या इन लोगों को देश के आर्थिक विकास का फायदा कभी मिलेगा?
क्या देश के विकास का फायदा लेने के अधिकारी वे लोग नहीं हैं? या देश के आर्थिक विकास का फायदा वो ही लोग हैं जिनके कारण दिल्ली की सडकों पर गाड़ियों और ट्रैफिक की दिक्कत हो गई है?
हमारी सरकारें दावा करती हैं प्रति व्यक्ति आय बढ़ने की, और देश के धनवान बनने का, तो क्या उन्हें ये याद नही रहता कि देश की जनसंख्या का एक बहुत बड़ा भाग ऐसे ही गरीब लोगों का है । क्या हमें उन्हें ये याद नही दिलाना चाहिए?
क्या वे बच्चे स्कूल जाना नहीं चाहते होंगे?क्या वे इस काबिल nahi बन सकते कि समाज के दुसरे लोगों के साथ बात सकें?ऐसे बहुत से सवाल हैं जो यह साबित करते हैं कि भारत अभी कम विकसित देश है। ये तो कोई और देश है जो विकासशील है, शायद इसी देश का नाम इंडिया है, क्यूंकि इस देश में वो लोग रहते हैं जो कान्वेंट स्कूल में पढ़ते हैं, और गरीबों को कीडे मकोडे समझते हैं। इस देश इंडिया के लोगों कि एक और खासियत है:
ये देश के साथ जुड़े बहुत सी बातों को जानते भी नहीं,मसलन:
इनमे से बहुत से लोग तो राष्ट्रगान राष्ट्रीय गीत कहते हैं।
इनको देश के राष्ट्रीय पशु, पक्षी, वगैरह किसी चीज़ से कोई सरोकार नही , और ना ये इन सब चीजों के बरे में जानते हैं॥
क्या इंडिया ही विकास करेगा , भारत नहीं?
ये सवाल कब अपना उत्तर पायेगा , ये तो अभी देखना है, हमें आपको, और भारत देश की करोड़ों अरबों की जनसंख्या को..