यह आतंकवाद के भूमंडलीय करण की लपटें हैं.जो तेल के कुओं के इर्दगिर्द से घूमतीं हुई जयपुर तलक आ गई ...!

मेरा उत्तर:-वास्तव में मुम्बई भी इसका शिकार थी, विश्व में कोई भी धर्म आतंक वादी तरीके से स्थायित्व नहीं पा सका इस बात के कई उदाहरण हैं.
मेरे हिसाब से तिजारत और सियासत दौनों ही जिम्मेदार हैं......इसके लिए............!
आप क्या सोचातें है...?

जयपुर में मजाज़ मैं और धमाके

जयपुर में मजाज़ मैं और धमाके
जयपुर में मजाज़ मैं और धमाके
मैं मजाज़ के साथ सडकों पे टहल रहा था
तभी मजाज़ ने क्या खूब कहा:-
"मस्जिदों में मौलवी खुतबे सुनाते ही रहे
मंदिरों में बिरहमन श्लोक गाते ही रहे
एक न एक दर पर ज़बाने शौक़ घिसती ही रही
आदमियत जुल्म की चक्की में पिसती ही रही
रहबरी जारी रही पैगंबरी जारी रही
दीन के पर्दे में जंगे जरगरी जारी रही!"
हमने देखा " गुलाबी नगरी रक्तरंजित, 65 मरे
कल सुबह तक और भी खबरें आएंगी ।"
मजाज़ भाई
कल मैं दफ्तर जाते हुए अखबार पडूंगा ,
तब जब मैं अपना कल गढूँगा....?
कल तब जब कि मैं
तुम हम सब इंसानियत की दुहाई देते
जयपुर पर वक्तव्य देंगे .......!
तब उगेगी दर्द की लकीरें सीने में
घाव बनातीं आंखों के आँसू सुखातीं
न कोई हिन्दू न मुसलमान
न क्रिस्टी न गुलफाम
कोई नहीं मरेगा
मरेगी तो केवल इंसानियत।
और चंद बयानों की रेज़गारी डाल दी जाएगी
बिलखती रोती माँ की गोद में.....
मजाज़ ने एक लम्बी गहरी साँस ली और बोले :-
"मस्जिदों में मौलवी खुतबे सुनाते ही रहेंगे
मंदिरों में बिरहमन श्लोक गाते ही रहेगें ....!
अब तो हम सब का दिल तुम्हारी तरह यही चाहता है कि :
बढ के इस इन्द्रसभा का साज़-ओ-सामां फूंक दूं
इस का गुलशन फूंक दूं उसका शबिस्तां फूंक दूं
तख्त-ए-सुल्तां क्या मैं सारा क़स्र ए सुल्तां फूंक दूं
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करू, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूं "

चिदम्बरम जी अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ़ मुसलमान नहीं होता…

अब तक यह समझा जाता था कि केन्द्रीय बजट भारत के प्रत्येक नागरिक के लिये समान अवसर प्रदान करता है, बजट में किये गये प्रावधानों से किसी एक धर्म का नहीं सबका भला होता है, लेकिन यह सोच कितनी गलत थी, आइये देखते हैं। अपने पिछले लगातार पाँच बजटों में यूपीए सरकार ने एक नया फ़ॉर्मूला गढ़ लिया है जो कि आने वाले समय में और बढ़ता ही जायेगा, वह है “अल्पसंख्यकवाद”। पिछले कुछ दशकों में राजनैतिक और अब आर्थिक लाभ लेने के लिये “अल्पसंख्यक” का लेबल लगवा लेने का फ़ैशन बढ़ता ही जा रहा है, पहले जैन, फ़िर आर्य समाजी, रामकृष्ण मिशन सम्प्रदाय आदि धीरे-धीरे विभिन्न राज्यों में अल्पसंख्यकों में शामिल होने के लिये आवेदन कर रहे हैं, कुछ सम्प्रदाय “राज्य आधारित” सुरक्षा चाहते हैं और “हम हिन्दू नहीं हैं, उनसे अलग हैं…” की गुहार लगाने लगे हैं। ऐसा लगता है कि भारत में “बहुसंख्यक” होना अब असुविधाजनक होता जा रहा है और “अल्पसंख्यक” बन जाना सम्मानजनक!!!

चिदम्बरम साहब के पिछले बजटों में “अल्पसंख्यक” (Minority) शब्द का उल्लेख बार-बार होता रहा है, लेकिन ताजा बजट में शर्म मिटते-मिटते अब अल्पसंख्यक का मतलब हो गया है सिर्फ़ “मुस्लिम”। कैसे? बताते हैं… 2004-05 के बजट में यूपीए सरकार ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम को 50 करोड़ रुपये दिये थे, बजट में कहा गया था कि ये पैसा अल्पसंख्यक कल्याण, विशेषकर उनकी शिक्षा के लिये खर्च किया जायेगा (यानी कि उनके कल्याण और शिक्षा के लिये नेहरू, इन्दिरा और राजीव ने अब तक कुछ नहीं किया था), कुछ किया तो सिर्फ़ यूपीए ने। यूपीए के दूसरे बजट में कहा गया कि “अल्पसंख्यकों को देश की मुख्य धारा में लाना है…और उनका विकास करना है…” (इसका मतलब भी यही निकलता है कि 15 अगस्त 1947 से 28 फ़रवरी 2006 तक सारे अल्पसंख्यक सभी कांग्रेस सरकारों द्वारा, विकास से दूर ही रखे गये थे)। लड़कियों के लिये स्कूल, अल्पसंख्यक इलाकों में आंगनवाड़ियाँ, अल्पसंख्यक छात्रों को प्रायवेट कोचिंग की सुविधा जैसे कई “अल्पसंख्यक” कल्याण की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख और ढिंढोरा था। अब देखिये, अगले बजट में चुपचाप और धीरे-धीरे “अल्पसंख्यक” का मतलब मुसलमान में बदल गया। अगले बजट में 200 करोड़ रुपये मौलाना आजाद शिक्षा फ़ाउंडेशन को दिये गये और 13 करोड़ रुपये उर्दू के विकास के लिये।

ताजा बजट (2008-09) तो खुल्लमखुल्ला “मुसलमानों” के फ़ायदे के लिये एक-सूत्रीय कार्यक्रम में बदल गया। बजट भाषण के पैराग्राफ़ 47 की हेडिंग है “अल्पसंख्यक”, मतलब क्या? अल्पसंख्यक मामलों के लिये बजट प्रावधान 500 करोड़ से बढ़ाकर 1000 करोड़ कर दिया गया, ताकि “सच्चर कमेटी” की सिफ़ारिशों पर तेजी से अमल किया जा सके (सच्चर कमेटी के लिये भी अल्पसंख्यक का अर्थ केवल और केवल मुसलमान ही था)। बजट की अन्य योजनाओं में, 90 अल्पसंख्यक बहुल जिलों (पढ़ें मुस्लिम) में विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिये 3780 करोड़ रुपये, प्री-मेट्रिक स्कॉलरशिप के लिये 80 करोड़ रुपये, मदरसों के आधुनिकीकरण के लिये 45 करोड़, मौलाना आजाद शिक्षा फ़ाउंडेशन को और 60 करोड़ रुपये, तथा सबसे खतरनाक बात यह कि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों (इसे पढ़ें ‘मुस्लिम’) में खासतौर से सरकारी क्षेत्र बैंकों की 544 शाखायें (खामख्वाह… धंधा हो या ना हो) खोलना शामिल हैं, यहाँ खत्म नहीं हुआ है अभी… 2008-09 में अल्पसंख्यकों को केन्द्र की अर्ध-सरकारी सेनाओं में अधिक से अधिक नियुक्तियाँ देना भी इस बजट में शामिल है। जाहिर है कि यह सब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमानों को फ़ायदा पहुँचाने के लिये किया गया, इसमें “अल्पसंख्यक” शब्द का कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि ईसाई, सिख, बौद्ध, पारसी आदि बाकी सभी कांग्रेस के अनुसार “अल्पसंख्यक” की परिभाषा में नहीं आते। यह एक बेहद खतरनाक परम्परा शुरु की गई है और समाज को धर्म के आधार पर बाँटने के कई कदमों में से यह एक है… सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से भी ज्यादा खतरनाक।

लगभग हरेक भारतीय जानता है कि राजनेताओं की घोषणाओं के मंसूबे क्या होते हैं। सारी घोषणायें सिर्फ़ वोट के लिये होती हैं, चाहे इससे समाज कितने ही टुकड़ों में बँट जाये या कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो जाये, इससे उन्हें कोई मतलब नहीं होता है। “अल्पसंख्यक इलाकों” में बैंकों की विशेष शाखायें खोलने के क्या गम्भीर नतीजे हो सकते हैं सेंट्रल बैंक, अम्मापट्टी की इस घटना से सिद्ध हो जायेगा…

तमिलनाडु का एक जिला है पुदुकोट्टई, जिसका एक कस्बा है अम्मापट्टी। यहाँ की सेंट्रल बैंक की शाखा में कुछ मुसलमान युवकों ने बैंक के दो कर्मचारियों को ट्रांसफ़र करने की माँग की। शायद ये कर्मचारी उन मुसलमानों को “लोन देने और अन्य लाभ देने” में अडंगे लगा रहे थे। बैंक मैनेजर ने उनकी माँग सिरे से खारिज कर दी। उन मुसलमान युवकों ने मैनेजर को धमकी दी कि 15 अक्टूबर 2007 तक यदि इन कर्मचारियों का ट्रांसफ़र नहीं किया गया तो वे बैंक को “ताला” लगा देंगे (जी हाँ सही पढ़ा आपने, “ताला लगा देंगे” कहा)। घबराये हुए बैंक मैनेजर ने पुलिस और जिला प्रशासन को शिकायत की और पुलिस सुरक्षा की माँग की। अब देखिये भारत की कानून-व्यवस्था… स्थानीय तहसीलदार के नेतृत्व में “शांति बैठक” आयोजित की गई। सेंट्रल बैंक के जनरल मैनेजर वहाँ शांति से उपस्थित हुए, लेकिन वे मुस्लिम युवक तहसीलदार के दफ़्तर में नहीं आये। उन्होंने माँग की कि पुलिस और बैंक अधिकारी मस्जिद में “जमात” में आयें वहीं बात होगी। बेचारा, जनरल मैनेजर (जो कि किसी अन्य राज्य का था) “जमात” से चर्चा करने को तैयार हो गया, शर्त ये थी कि तहसीलदार, बैंक अधिकारी और जमात के पाँच सदस्य चर्चा करेंगे, लेकिन पाँच की जगह वहाँ सौ से अधिक मुसलमान इकठ्ठा थे। मैनेजर ने चुपचाप उनकी बात सुनी और कहा कि “वह बैंक जाकर उन कर्मचारियों का पक्ष सुनेंगे, उसके बाद नियमानुसार जो होगा वह किया जायेगा”, लेकिन भीड़ ने उनका घेराव कर दिया और उन कर्मचारियों का तत्काल लिखित में ट्रांसफ़र करने की माँग करने लगे। मैनेजर ने यह कहकर मना कर दिया कि ट्रांसफ़र करने के अधिकार उसके पास नहीं हैं। जनरल मैनेजर के बैंक पहुँचने से पहले ही कुछ युवाओं ने बैंक जाकर उसके शटर बन्द कर दिये और ताला लगा दिया, जबकि स्टाफ़ बैंक के अन्दर ही था। वहाँ उपस्थित पुलिस इंस्पेक्टर ने अपने DSP को खबर की, वे खुद आये और बैंक का ताला खोला।

लेकिन मुद्दा हल नहीं हुआ था, बल्कि और बिगड़ गया। मामले की रिपोर्ट एसपी को की गई, जो आधी रात को ताबड़तोड़ अम्मापट्टी पहुँचे और गुस्से में उन मुस्लिम युवकों से कहा कि “आप लोगों का यह काम गैरकानूनी है, जैसे आपने बैंक के कर्मचारियों को बन्द कर दिया है, वैसे ही यदि जमात के सदस्यों को बन्द करें तो आपको कैसा लगेगा?” इस बात पर एक नया मुद्दा भड़क गया कि एसपी ने जमात के खिलाफ़ ऐसा कैसे कहा? कलेक्टर को बीचबचाव करने आना पड़ा, लेकिन जमात की नई माँग थी कि उन कर्मचारियों के ट्रांसफ़र के साथ-साथ एसपी पर भी कार्रवाई होना चाहिये। जबकि बैंक कर्मचारियों की माँग थी कि हमलावरों को गिरफ़्तार किया जाये, वरना एक “नई परम्परा” शुरु हो जायेगी!!! यह सारा वाकया तमिल साप्ताहिक “तुगलक” में दिनांक 31.10.2007 को छप चुका है, यहाँ तक कि “जमात” ने भी इस घटना की पुष्टि की लेकिन विवाद की वजह नहीं बताई। इस समूचे मामले का और भी दुखद पहलू यह है कि किसी अन्य अखबार या पत्रिका ने इस खबर को छापने की “हिम्मत” नहीं दिखाई। रही बात राज्य शासन की तो वह भी उसी तरह चुप्पी साधे रहा जैसा कि सोनिया के सामने मनमोहन साधे रहते हैं या बुश के सामने मुशर्रफ़।

इस घटना के सबक हमारे लिये स्पष्ट हैं, यदि सरकार (कांग्रेस) किसी धर्म विशेष के लोगों के लिये खास उनके “इलाकों” में बैंक खोलती है, तो वह समुदाय (इसे “जमात” पढ़ें) अपनी मनमानी अवश्य करेगा। बैंक अपने नियम-कायदों से नहीं, बल्कि जमात के हुक्म के अनुसार लोन बाँटेंगी या कर्मचारियों के तबादले करेंगी। उन खास इलाकों में धर्म विशेष को सुविधा के नाम पर खोले गये “स्कूल”, आंगनवाड़ी, या बालवाड़ी केन्द्र का हश्र भी कुछ ऐसा ही होगा, जब प्राचार्य को धमकाकर नाजायज काम करवाये जायेंगे। हरेक शहर में एक या दो मोहल्ले ऐसे होते हैं जहाँ मुसलमानों का बाहुल्य होता है, उस मुहल्ले में कभी आयकर छापा नहीं पड़ता, कभी नल नहीं काटे जाते, कभी बिजली चोरी का केस नहीं बनता, कभी अतिक्रमण मुहिम नहीं चलाई जाती, खुलेआम सरकारी सम्पत्ति की मुफ़्तखोरी की जाती है और सरकारें (गुजरात को छोड़कर) पंगु बनकर देखती रहती हैं, सिर्फ़ वोट की खातिर नहीं, बल्कि सरकारों में गलत काम को ठीक करवाने का साहस ही नहीं होता। उससे भी खतरनाक बात यह होती है कि जब दूसरा अल्पसंख्यक समुदाय किसी अन्य अल्पसंख्यक समुदाय को इस प्रकार की “सुविधा” लेता हुआ देखेगा तो उसके मन में या तो गुस्सा आयेगा या निराशा। जी हाँ, चिदम्बरम साहब… आपकी सच्चर समिति और “विशेष बजटीय प्रावधान” कांग्रेस को मुसलमानों के वोट तो दिलवा सकते हैं, लेकिन समाज के बीच बढ़ती खाई को और चौड़ा भी करते जा रहे हैं, इसका आपको जरा भी खयाल नहीं है…

Suresh Chiplunkar
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
सन्दर्भ – यह एस.गुरुमूर्ति के एक लेख का संकलन, सम्पादन और अनुवाद है।

चुटकुले ही चुटकुले

एक मित्र ने दूसरे मित्र से कहा - यार मैंने सपने मे देखा कि तुम नाले मे गिर पड़े हो और मैं एक शहद के नाले मे गिर गया था .
दूसरा मित्र पहले मित्र से - उसके बाद का सपना मैंने देखा कि मैं तुम्हे चाट रहा था और तुम मुझे चाट रहे थे .
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एक पागल दूसरे पागल से - यार मुझे बिना दाँत के कुत्ते ने काट लिया है
दूसरा पागल पहले पागल से - यार सिम्पल सी बात है तुम बिना सुई के चौदह इंजेक्शन लगवा लो.
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पुत्र पिता से - पापा राम कौन थे ?
पापा गुस्से से - वेबकूफ़ तू पढ़ता क्या है तुझे इतना भी नही मालूम जा टेबल पर महाभारत पड़ी है उसे उठाकर ले आ मैं तुझे बताता हूँ कि राम कौन थे .
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एक महिला दूसरी महिला से - क्या तुम्हारी सास बीमार थी कैसे मर गई ?
दूसरी महिला पहली महिला से - दरअसल अतिम संस्कार के समानो मे पचास परसेंट की छूट चल रही थी सो मेरी सास ने उसी का फायदा उठाया और मर गई .
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दो दोस्त आपस मे बात कर रहे थे इतने मे एक छींक आ गई तो बोला मेरी पत्नी ने कहा की जब तुम्हे छींक आये तो तुम मेरे पास चले आना
दूसरा दोस्त बोला अभी तुम्हे छींक आई है तुम अपनी पत्नी के पास जाओ
तो पहला दोस्त बोला - पर मेरी पत्नी का देहांत हो गया है .
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दो पागल आम के पेड़ पर लटके हुए थे अचानक एक पागल नीचे गिर पड़ा
दूसरा पागल बोला - क्या हुआ क्या थक गए हो ?
पहला पागल बोला - अरे नही पक गया हूँ इसीलिए पककर गिर गया हूँ .

उत्‍तर प्रदेश

Uttar Pradesh

  1. भारत में सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला प्रदेश उत्तर प्रदेश है।
  2. उत्‍तर प्रदेश से सर्वाधिक लोक सभा व राज्य सभा के सदस्‍य चुने जाते है।
  3. उत्‍तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जिलों वाला प्रदेश है।
  4. उत्‍तर प्रदेश में कुल 403 विधान सभा सीटे है।
  5. उत्‍तर प्रदेश में स्थित इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय एशिया का सबसे बड़ा उच्‍च न्‍यायालय है।
  6. उत्‍तर प्रदेश का सोनभद्र जिला,देश का एक मात्र ऐसा जिला है जिसकी सीमाएं सर्व चार प्रदेशों को छूती है।
  7. यह देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने वाला प्रदेश है।

नही मिलेगा उड़न खटोला, बंगले की बात मत करना

आज खबर मिली की भारत के माननीय मुख्‍य न्‍यायधीश को महामहीम राष्‍ट्रपति जी की तरह विमान नही मिलेगा। क्यों याचिका खारिज कर दी गई, अच्‍छा ही हुआ नही तो कल को राष्‍ट्रपति भवन जैसे भवन की भी मॉंग होने लगती तो दूसरा राष्‍ट्रपति भवन कहॉं से लाया जाता ? :)

एक बात तो स्‍पष्‍ट है कि इस तरह की फिजूल की याचिकाओं पर रोक लगनी चाहिये नही तो कोई न्‍यायधीश तो कोई किसी के नाम पर याचिका लेकर चला आता है। जब भारतीय संसद खुद इतनी मेहबान रहती है तो भारतीयों को किसी प्रकार की चिन्‍ता नही करनी चाहिये। सरकार को जितनी चिंता आम आदमी की नही होती है उतनी अधिक अधिकारियों की होती है, और समय समय पर वह नियमों को फेरबदल कर सुविधा लेते देते रहते है।

निश्चित रूप से यह एक अच्‍छा फैसला है।

फिर मिलना होगा ..... 

1857 क्रांति की 150 वी वर्ष गाँठ आज - लोकगीतों मे आजादी की कहानी

1857 क्रांति की 150 वी वर्ष गाँठ आज - लोकगीतों मे आजादी की कहानी


1857 एक महज आकडा ही नही बल्कि उसमे देश प्रेम का जबरजस्त जज्बा समाया हुआ है जो हमे स्वयं की आजादी को बनाये रखने के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने की प्रेरणा देता है . डेढ़ सौ वर्ष पूर्व आजादी का बिगुल बजाने वाले बहुत से लोगो को इतिहास ने याद रखा ......बहुतो को भुला दिया गया .

आज 1857 क्रांति की 150 वी वर्षगाँठ है आज 10 मई को ठीक 18.57 बजे पर देश के लिए अपने प्राणों का न्योछावर कर देने वाले शहीदों की स्मृति मे उनको याद करते हुए एक दीपक प्रज्ज्वलित कर दो मिनिट का मौन रखकर उन्हें विनम्र श्रध्दा सुमन अर्पित किए जावेंगे यह सभी भारत वासियो का पुनीत कर्तव्य है हम शहीदों को याद कर उनके प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करे.

संस्काराधानी जबलपुर मे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं द्वारा शहीदों की स्मृति मे अनेको कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है आज गली गली चौराहों मे शहीदों की स्मृति मे दीप जलाये जावेंगे और दो मिनिट का सामूहिक मौन रखा जावेगा . धन्य है संस्कार नगरी जो आज अपने देश शहीदों को याद कर इस पुनीत अभियान मे अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेगी .

शहीदों को याद करने और उनको स्मृति मे बनाये रखने मे लोकगीतों की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है . जबलपुर शहर मे एक ऐसे भी दीवाने है जिन्होंने तीन दशकों के लोकगीतों का संग्रह किया है . उन लोकगीतों मे आजादी की कहानी समाहित है .
श्री द्वारका गुप्त "गुप्तेस" जाने माने कवि है और मध्यप्रदेश राज्य विधुत मंडल जबलपुर मे कार्यरत है लेकिन लोकगीतों से उनका पुराना प्रेम है उनके इस संग्रह मे सन् 1857 से 1947 तक के बुन्देली 160 लोकगीतों का संग्रह है और इन गीतों मे स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास समाहित है . सामाजिक रीति संस्कार और तीज त्यौहार पर लोकगीतों का उल्लेख हर जगह मिलता है पर राष्ट्रिय भावनाओ से ओतप्रोत लोकगीतों का संग्रह कही मिलता नही था बस इसी को लेकर प्रेरणा प्राप्त हुई और श्री गुप्त द्वारा जनभावानाओ के अनुरूप बुन्देलाखंडी लोकगीतों का संग्रह करना शुरू किया गया और उन्होंने उसे मूर्त रूप भी दिया . इस बात से इनकार नही किया जा सकता कि लोकगीत किसी घटना के प्रति जनमानस के जेहन मे महत्वपूर्ण बड़ी भूमिका बनाने लोकगीत अब आज के युग मे गुम होते जा रहे है .

लोकगीत किसी घटना के प्रति किसी इतिहासकार का नजरिया नही होते है पर जनभावनाओ की भावनाओं से ओतप्रोत होते है . उनके संग्रह मे खूब लड़ी मर्दानी वो झासी वाली रानी थी .संतावन मे खूब धूम मचाई . संग्रह मे राजा मर्दनसिह बुंदेला, महारानी लक्ष्मी बाई , दुर्गावती पर आधारित कई लोकगीतों का संकलन किया गया है . ऐसे काम विरले लोग ही करना पसंद करते है .इस काम को करने जानने के लिए मध्यप्रदेश के सभी जिलो का भ्रमण कर लोकगीतों का संग्रह किया है और जो काम श्री गुप्त ने कर दिखाया है वे सराहना के पात्र है जिससे संस्कारधानी जबलपुर भी गौरवान्वित हुआ है .

"विवाह में बाधा न डालें किंतु बाल विवाह न होनें दें...!"

हमारे आपके सामने हो जाते हैं बाल विवाह और हम आप हैं कि कन्यादान में बाधा न डालने के धर्म भीरू संकल्प को लेकर खामोश रहतें हैं।हमारी यही भीरू प्रवृत्ति से सामाजिक स्वास्थ्य एवम सामाजिक सूचकों को नकारात्मकता दिशा देतें है । समाज को बदलने का दम भरती हमारी सोच खतरे को भांप हमारी आँखें बंद करने को मज़बूर कर देतीं है। हममें और उन कबूतरों के बीच कोई फर्क नहीं रह जाता जो बिल्ली को देख आँखें बंद कर लेतें है। कबूतरी वृत्ति से निजात मिले इस लिए ज़रूरी है कि हम साहसियों के किस्से जानें ।"दो बरस पहले जबलपुर केंट क्षेत्र मानेगांव की इक आँगनवाड़ी वर्कर अनिता विनोदिया ने बताया कि सरोज नामक बालिका की शादी होने जा रही है। लड़की 17, बरस की है....!काउंसलिंग का दौर चला , पिता की एक न चली , माँ बेटी के साहस ने झुका दिए,बेदम विश्वासों के ध्वज, जीत गए संकल्प पर्यवेक्षक कुमारी माया मिश्रा के, उनकी सहयोगिनी आँगन वाड़ी कार्य कर्ता श्रीमती विनोदिया के।उधर मुझे उस बालिका का सम्मान जो करने की अभिलाषा थी , सो उसके नाम पर"सरोज स्वसहायता समूह " गठन कर दिया एक सिलाई मशीन , शार्ट टर्म ट्रेनिंग कोर्स हुए किशोरियों के लिए । हरनीत जो ताज़ा ही लौटीं थी मलेशिया से।खूब उत्साह से हरनीत दीदी की क्लास में आयीं बेटियाँ। अभी भी इंतज़ार रहता है माने गाँव को जिनका। *******************दयानंद गिरी मोहास से मेरे सेल पर पूछ रहे थे -"काय साहब , सम्भव हो .....!"मेरा रुख इस बात पर सख्त था सो मैंने गिरी जी को दो टूक शब्दों में कह दिया:- "भाई साहब , चार माह बाद ही , शादी कर ने को कहिये अपने नौकर को । "बात असरदार रही गिरि जी ने अपने नौकर से कहां :-"साहब,नहीं मान रहे भैया बिटिया को बियाह चार महीने बाद करियो " गिरी जी का नौकर जालंधर काछी पुत्र हेमराज काछी ने अपनी बिटिया की शादी रोक दी थी चार माह के लिए, बिटिया १८ वर्ष की उम्र पूर्ण करने के सात माह बाद ससुराल गयी।
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बाराती-घराती भी जाएंगे जेल ... इस बात की जान कारी जिनको नहीं है ऐसे लोगों में शुमार हैं बरेला निवासी आनंद और प्रीती शर्मा। जबलपुर के नज़दीक का कस्बे बरेला के इस परिवार की बिटिया दुर्गा १६ साल की है। ०८/०५/०८ रात मनीष भाई ने बताया :-"पुलिस कंट्रोल रूम आपको बरेला में बाल विवाह रोकने के लिए "
रात ८:०० बजे , निचले स्तर पे खोज बीन हुयी । पता चला कि प्रोबेशनर आई पी एस रूचि श्रीवास्तव टी आई साहिबा को फोन पर मिली ख़बर से पता चला कि वार्ड न ० ११ में कम उम्र की बालिका की शादी की जा रही है, पुलिस अमला भेजा गया, आँगनवाड़ी-कार्यकर्ता सूना चक्रवर्ती ने दोपहर उस परिवार को भेंट देकर बता दिया था कि दुर्गा की शादी उस के लिए शारीरिक,सामाजिक,और कानूनी तौर पर कितनी हानि पहुंचा सकती है,यदि दुर्गा १८ बरस के बाद बिहाई जाए तो कितनी सरकारी मदद भी मिलेगी । समझाइश और कानूनी कार्यवाई के आसन्न खतरे को भांप परिवार गहन मंत्रणा में जुट गया। शाम तक आँगनवाड़ी कार्य कर्ताओं का इक और दल जिसमे शारदेश नंदनी जैन,प्रेम लता मिश्रा [आँगनवाड़ी-वर्कर]शामिल थीं , भाई महेन्द्र जैन, जनपद के उपाद्यक्ष सभी ने पूरी ताक़त लगा के परिवार को राजी कर ही लिया । दुर्गा से शादी कर बरात लेकर आने वाले दूल्हे को वापस लौटना ही पड़ा ।समाज से सरोकार रखने वाले मेरे विभाग , की इन कार्यकर्ताओं की जितनी भी सराहना की जाए कम होगी।

इस पोस्‍ट का औचित्‍य समझ में नही आया, इसलिये उक्‍त समग्री हटाई जा रही है।

ब्‍लाग प्रमुख

अर्थशास्‍त्र की विषय सामग्री - उपभोग

अर्थशास्‍त्र को प्रो. मार्शल ने अध्‍ययन की दृष्टि से उपभोग, उत्‍पादन, विनिमय,  और वितरण सहित 4 भागों में बॉंटा है, जबकि प्रो. चैपमैन इसमें संसोधन करते हुऐ राजस्‍व की एक श्रेणी और बना देते है। उपरोक्‍त वर्णित पॉंचों के बारे में हम विस्‍तार से चर्चा करेगें।

 

उपभोग ( Consumption)

उपभोग मानव की वह आर्थिक होती है जिसमें मनुष्‍य की आवाश्‍यकताओं की संतुष्टि होती है। संक्षेप में हम जब कोई मनुष्य किसी आर्थिक वस्‍तुओं तथा सेवाओं के द्वारा संतुष्टि को प्राप्‍त करता है तो कहा जाता है उक्‍त वस्‍तु या सेवा का उपभोग हुआ। तथा उस वस्‍तु तथा सेवा से मिलने वाली संतुष्टि को उपयोगिता कहते है। उपभोग मनुष्‍य क्रियाओं का आदि और अंत सभी है। उपभोग अपनी अवस्‍था के अनुसार कई प्रकार के हो सकते है, चाहे वह खाद्य पदार्थ के रूप मे चाहे भौतिक सुख सुविधाओं के द्वारा प्राप्‍त उपभोग।

 

डाक्‍टर पी. बसु उपभोग की परिभाषा देते हुए कहते है - ''अर्थशास्‍त्र में आर्थिक उपयोग ही उपभोग है। ''  

 

नोट - अगले अंक में हम उत्‍पादन ( production)  के बारे में चर्चा करेंगें।

क्‍या खूब कही

युवराज के चारों ओर चापलूसों का जमघट लगा रहता है और यदि वे किसी से नाराज़ हों तो उस व्यक्ति को परेशानी उठानी पड़ती है - अखिलेश दास, पूर्व केन्‍द्रीय मंत्री, जो हाल में ही कांग्रेस से इस्‍तीफा दे चुके है।