12 February 2010
Talk Show : संजीव वर्मा सलिल से बातचीत
पेशे से अभियंता ह्रदय से कवि लोक निर्माण विभाग मध्य-प्रदेश में पदस्थ प्रशासन में महत्वपूर्ण अस्तित्व निरंतर गति शील दिव्य नर्मदा ब्लॉग के मालिक भाई संजीव वर्मा सलिल से बातचीत
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
नियति पर
अभिमान करता है...
कोहरे से
गले मिलते भाव.
निर्मला हैं
बिम्ब के
नव ताव..
शिल्प पर शैदा
हुई रजनी-
रवि विमल
सम्मान करता है...
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
नियति पर
अभिमान करता है...
फूल-पत्तों पर
जमी है ओस.
घास पाले को
रही है कोस.
हौसला सज्जन
झुकाए सिर-
मानसी का
मान करता है...
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
नियति पर
अभिमान करता है...
नमन पूनम को
करे गिरि-व्योम.
शारदा निर्मल,
निनादित ॐ.
नर्मदा का ओज
देख मनोज-
'सलिल' संग
गुणगान करता है...
गीत का बनकर
विषय जाड़ा
खुदी पर
अभिमान करता है...
11 February 2010
वर्ड वैरिफिकेशन याने पानी पीकर जात पूछना…….
ये चीज बङी ही ………क्या कहूं घटिया या बढिया या गंदी या खतरनाक या बेकार नहीं कह सकता ….क्यों कि मुझे कोई अधिकार नहीं ये सब कहने का ….पर क्या करूं मै तो बङा परेशान हो जाता हूं इससे….आप ने कोई ब्लोग पोस्ट पढी बङे मन से….. आपके मन मैं कोई विचार समर्थन मैं या विरोध मैं उमङ घुमङ कर आता है ….अब आपके मन के जवाब को देने के लिए आप अपना अमूल्य समय खर्च कर आप एक टिप्पणी टंकित करते हैं…और जैसे ही आप उसे प्रकाशित करने की चेष्टा करते हैं तो एक दुःस्वप्न की तरह एक डिब्बा सा खुल जाता हैजिसमें आढे तिरछे अक्षर से खुल जाते हैं जिनको देखते ही आप भयभीत हो जाते हैं…पर अब आपके पास लौटने का कोई रास्ता आपको टुप्पणी पूरी करनी ही है तो आप को इनके भी पार जाना होगा और बमुश्किल आप उन अक्षरों को जो शायद मंगल ग्रह के प्राणियों द्वारा काम लीजाती होगी ..उनको आंखे फाङ फाङ कर कर देखते हैं और उनको अपने संपूर्ण अर्जित ज्ञान के आधार पर इस पहेली को सुलझाने का प्रयास करते हैं…..कई बार आप इसमें सफल हो जाते हैं और कई बार नहीं भी होते..तो……..फिर झींकते हुए आप एक ट्राई और मारते हैं और अबकि बार यदि किस्मत साथ है तो बर्ज वैरिफिकैशन की लाटरी मैं आपको कुछ समझने वाली आकृतियां दिखाई दे सकती हैं……..एट लास्ट आप सफलता प्राप्त करते हैं……..आपको यूं लगता है जैसे कोई गढ जीत लिया…….पर अभी आपकी समस्या यहीं खत्म नहीं हुई ……आपकी टिप्पणी अभी भी दिखाई नहीं दे रही……..क्या हुआ……तब पता लगता है कि बिना अप्रूवल यहां आप बोल भी नहीं सकते…….अब आप सोचते हैंमैं सोचता हूं क्या मुझे पागल कुत्ते ने काटा था जो मैं यहां आया…..इससे बढिया है बंधु ब्लोग वाणी मैं ही एक श्रेणी और बना दी जाती जैसा ऊपर वाले चित्र मैं लिखा हैंwarninng trip hazard याने सावधान आप आगे वर्ड वैरिफिकैशन वाला ब्लोग है…..जरा धीरे चलिये और आपके सात बार जंचे तो ही यहां आईये…….हो सकता हैं कल को गूगल वाले ऐसी व्यवस्था भी कर दें की आप के कीमति ब्लोग पर टिप्पणी करने से पहले आपको अपने पास्पोर्ट,पैन कार्ड या राशन कार्ड की कोपी की जरूरत पङे…….वर्ड वैरिफइकैशन का कोई लाभ हो तो कोई मुझे भी समझाये……
04 February 2010
दलित बनाम सवर्ण……क्या हर विवाद का दलिति करण आवश्यक है…..
वर्धा से बनारस तक बेबस दलित छात्र
वो आज भी क्लास की पिछली सीट पर बैठते हैं। आज भी उन्हें अपने जैसे ही अन्य छात्रों के साथ बैठ कर खाना खाने से डर लगता है। आज भी उन्हें हमेशा इस बात का डर होता है कि किसी भी वक्त किसी भी बात को लेकर उनकी सारी काबिलियत को धत्ता बताए हुए, उनके सारे सपनों को चकनाचूर कर दिया जाएगा। हम बात कर रहे हैं दलित छात्रों के हाल की, जो वर्धा से बनारस तक एक जैसा है।
यहां देखें लेखक ने पुरजोर शब्दों ये साबित करने की चेष्टा की है जैसे आरक्षित वर्ग से आने वाले छात्रों के साथ बुरी तरह से अत्याचार किया जा रहा है…पढते पढते आंसु आने लगें …पर आये नहीं क्यों कि मेरे विचार मैं हकीकत कुछ कुछ अलग है(मै दलित नहीं लिखूंगा….क्यों कि यह लिखना इस पूरे वर्ग का अपमान करना और झूठ भी है….क्यों कि अधिसंख्य छात्र दलित की परिभाषा मैं नहीं आते….किसी धन्ना सेठ के बच्चे….किसी बङे सरकारी अफसर के बच्चे….या किसी पैट्रोल पंप मालिक के परिवार वालों को दलित कहना तो ठीक नहीं है).
लेखक ने अनेकानेक उदाहरण देकर ये सिद्ध करने की कोशिश की है कि आरक्षित वर्ग के छात्रों को जानबूझकर फैल किया जाता है…उत्तर प्रदेश के मैडीकल कालेजों मैं सरवाधिक सप्लीमैंट्री आने वाले छात्र भी इसी वर्ग के होते हैं…इनके सेशनल एक्जाम्स मैं भी कम नंबर जानबूझकर दिये जाते है . उनकी जबरदस्ती टांग खिंचाई होती है और तो और उनके किये गये रिसर्च वर्क को भी नाकारा कहा जाता है..
गाजियाबाद स्थित एक प्रबंध संस्थान ने तो सारी हदें पार करते हुए एक दलित छात्र प्रेम नारायण को न सिर्फ प्रवेश देने से इनकार कर दिया बल्कि उसे अन्य छात्रों के सामने संस्थान के प्रिंसिपल द्वारा भद्दी-भद्दी गालियां भी दी गयीं। कसूर सिर्फ ये था कि उसके पास डोनेशन के लिए दिये जाने वाले 45 हजार रुपए मौजूद नहीं थे। हालांकि बाद में इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली गयी।
प्रबंध संस्थान जैसे इंस्टीट्यूट जो कि सरकारी भी नहीं है वो अपनी निर्धारित फीस के बिना कैसे किसी को प्रवेस देगा और ये भी मान लिया के वो डोनेशन मांग रहे थे तो भी क्या वहा कोई ब्राह्मण विध्यारधी होता तो क्या वे उसे प्रवेश देते…..नहीं न …..पर यहां तो प्राथमिकी दर्ज हो गई और आप जैसा मूर्धण्य पत्रकार इसके बारे मैं लिख रहा है….पर उस गरीब ब्राह्मण या सवर्ण के लिये भी क्या आपने टसुए बहाये होते…..
बीकानेर के सरदार पटेल मेडीकल कालेज मैं की पढाई करते समय आरक्षित वर्ग के छात्रों के साथ हम भी पढे थे…पर कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि किसी भी प्रकार का वर्ण भेद देखने को मिला….इसके अनेका नेक उदाहरण मैंने अपने महाविध्यालय कालीन जीवन मैं देखे….ये सच है कि फैल होने वाले छात्रों मैं इनका प्रतिशत ज्यादा होता था पर ऐसे भी उदाहरण अनेक थे कि अनारक्षित छात्रों से भी अधिक नं लाते थे….मेरे साथ पढने वाला ओमप्रकाश मीणा हमेशा मेरे से ज्यादा नं लाया करता था…मेरे से चार साल सीनियर भंवरलाल मीणा जो कि हमारे कालेज से 2002 मैं पास हुआ था अपने बैच का सैकंड टापर था …उसके बाद उसने एम्स पीजीआई की प्रवेश परीक्षाओं मैं अच्छी रैंक प्राप्त की उसके बाद राजस्थान प्री पीजी की परीक्षा मैं सातवीं रैक पर पास हुआ उसके बाद एम की और आज की तारीख मैं वो राजस्थान मैं आई पी एस लगा हुआ है…..मनोज रैहङूं राजस्थान प्रीपीजी की परीक्षा का 2007 का पूरी आरक्षइत श्रेणी का टापर और एकमात्र चयनित उम्मीदवा( क्यों कि बाकियों के पासिंग मार्क्स भी नहीं आये) मेरा क्लास ,मैट हमेशा मेरे से अच्छे नं लाता था कभी फैल नहीं हुआ.
एम डी जोधपुर से करते समय मेरा साथी देवैंद्र यादव जो कि अनुसूचित जाति से था उसकी वजह से हमेशा मुझे डांट खानी पङती थी क्यों कि वो विषय की पूरी तैयारी करके ही डिपार्टमैंट मैं आता था…और अपने राम तो मस्त मौला थे जो मर्जी हुई तो पढे नहीं तो यूं ही उठकर चले आते थे…..हमारे विभागाध्यक्ष डां कल्ला हमेशा अटका हुआ कैस सुलझाने के लिए डा राजकुमार कोठीवाला को बुलाते थे जो कि मीणा था….यहां तक की हमारी छुट्टियां पास करवाने के लिए भी राजकुमार ही सर के पास जाते थे क्यों कि हमारे साहब की नजर मैं हम सब नालायक थे और वो एक काबिल था जिसके भरोसे हम सब रैजिडैंट काम करते थे…..और बहुत सी बातें जो यहां लिखना संभव नहीं…..
ये एक घोषित तथ्य है कि आरक्षण के कारण से मर पच के कम प्रतिशत मैं ऐसे छात्रों का प्रवेश तो हो जाता है प्रोफेशनल कोर्सेज मैं पर जिनके प्रवेश मैं ही कम अंक प्राप्त हुए हैं उन छात्रों की क्षमता एक दिन मैं तो बढने वाली तो है नहीं तो फिर इससे परिणाम भी प्रभावित होता है….और जो छात्र अच्छा पढते हैंल मेहनत करते हैं वे आरक्षित श्रेणी मैं होने के बाद भी अच्छे अंक प्राप्त करते हैं…और सफल होते हैं….जब तक छात्र इस दलित वाली मानसिकता से बाहर आकर मेहनत करके अपने आपको साबित नहीं करेंगे तब तक उनका परिणाम कहां से सुधरेगा….
बंधु हम सब हिंदु समाज के अंग है चाहे सवर्ण हों या दलित आप सब को हिंदु ही क्यों नहीं रहने देते….क्यों दलित को हमेशा दलित बने रहने को अभिशप्त कर रहें हैं…..
01 February 2010
माँ, सॉफ्टी, अपने और ''मामा जी'' का बचपन
माँ की ऑचल से प्यार बरसता है,
ममता बिन जीवन अधूरा लगता है।
जब उनके हाथो की रोटी मिलती है,
तो सारे संसार का ''वैभव'' छोटा लगता है।।
सॉफ्टी
तेरे सॉफ्टी को देख कर,
मुझे भी खाने का मन कर रहा है।
उफ ये क्या तू वहाँ हाफ टी-शर्ट मे,
और मै यहाँ स्वेटर मे घूम रहा हूँ।।
अपने
इस दुनिया मे सब बेगाने हो जाते है,
पर अपने तो अपने रहते है।
कभी खुशी हो कभी हो गम,
अपने तो साथ निभाते रहते है।।
''मामा जी'' का बचपन
आज मै अपने बचपन को साथ लिये था,
वही खुशी थी वही भाव था।
सब कुछ वैसा ही था जैसे पहले था,
बस मेरे जगह मेरा भांजा बैठा था।।
28 January 2010
उत्तर प्रदेश के जिले

उत्तर प्रदेश देश का सबसे अधिक जिलो वाला प्रदेश है, इस प्रदेश मे कुछ 70 जिले है जो निम्न है-
- अंबेदकर नगर जिला
- आगरा जिला
- अलीगढ़ जिला
- आजमगढ़ जिला
- इलाहाबाद जिला
- उन्नाव जिला
- इटावा जिला
- एटा जिला
- औरैया जिला
- कन्नौज जिला
- कौशम्बी जिला
- कुशीनगर जिला
- कानपुर नगर जिला
- कानपुर देहात जिला पुराना नाम अकबरपुर जिला
- गाजीपुर जिला
- गाजियाबाद जिला
- गोरखपुर जिला
- गोंडा जिला
- गौतम बुद्ध नगर जिला
- चित्रकूट जिला
- जालौन जिला
- चन्दौली जिला
- ज्योतिबा फुले नगर जिला
- झांसी जिला
- जौनपुर जिला
- देवरिया जिला
- पीलीभीत जिला
- प्रतापगढ़ जिला
- फतेहपुर जिला
- फ़र्रूख़ाबाद जिला
- फिरोजाबाद जिला
- फैजाबाद जिला
- बलरामपुर जिला
- बरेली जिला
- बलिया जिला
- बस्ती जिला
- बदायूँ जिला
- बहराइच जिला
- बुलन्दशहर जिला
- बागपत जिला
- बिजनौर जिला
- बाराबांकी जिला
- बांदा जिला
- मैनपुरी जिला
- महामयानगर जिला पुराना नाम हाथरस जिला
- मऊ जिला
- मथुरा जिला
- महोबा जिला
- महाराजगंज जिला
- मिर्जापुर जिला
- मुझफ्फरनगर जिला
- मेरठ जिला
- मुरादाबाद जिला
- रामपुर जिला
- रायबरेली जिला
- लखनऊ जिला
- ललितपुर जिला
- लखिमपुर खेरी जिला
- वाराणसी जिला
- सुल्तानपुर जिला
- शाहजहांपुर जिला
- श्रावस्ती जिला
- सिद्धार्थनगर जिला
- संत कबीर नगर जिला
- सीतापुर जिला
- संत रविदास नगर जिला
- सोनभद्र जिला
- सहारनपुर जिला
- हमीरपुर जिला
- हरदोइ जिला
27 January 2010
लघुइका
23 January 2010
21 January 2010
न तुम उदास हो , ना तुम निराश हो

ना तुम निराश हो.
जीने की राह में
दोस्तों के साथ हो..
जीत में भी हार में भी,
प्यार में भी रार में भी.
मन को न निराश करो,
खुश दिल मिजाज़ बनो..
न तुम स्वयं के लिए जियो,
जियो तो कम से कम आपनो के लिए.
न कभी खुद निराश हो,
न कभी अपनों को निराश करो..
जिन्दगी तो God Gift है,
न जियो आप अपने लिए सही
जियो तो सही हमारे लिए,
हम भी तो आपके ही है..
17 January 2010
कर्म मेरा नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली .. धर्म मेरा नेक्स्ट दिल्ली . आई लव माई नेक्स्ट स्टॉप दिल्ली..!
बाकि सब सपने होते है... ।अपने तो अपने होते है ...!
ऐसा लगता है , जहां तुम हो वंहा मै हूं! इस शहर की मिट्टी की खुशबू ह़ी कुछ और है ! यंहा के लोगो का प्यार, यंहा की गलियां और तो और यंहा की इमारते भी बोलती है ! प्यार का क्या मतलब होता ! सिर्फ और सिर्फ ...? मै कोई बरेली के बाजार में .. बरेली के बाजार में..का जिक्र नहीं कर रहा हूं!
कोई उसे बोले इस बार मै सारी नाराजगी दूर कर दूंगा ! प्रेम यह तुम क्या कह रहे हो ! हाँ किरण - ऐसी छोटी -छोटी और कटी -कटी बात मत किया करो ! वह कोई गैर नहीं है ! जिसे तुम नफरत करती हो वही तुम्हारा कल अपना होगा ! और तुम तो जानती हो .... बाकि सब सपने होते है... .अपने तो अपने होते है ...!
प्रेम --सारी उम्र हम मर- मर के जी लिये एक पल तो हमें जीने दो !! क्यों बहाने बनाते हो !
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किरण जरा तस्बीर से तू निकल कर बाहर आ ! तुम्हे पता है उस दिन के बाद एक -एक दिन अनाथो की जिन्दगी जी रहा हू! यह उमीदे मत तोड़ो ! बोलो क्यों तुम सिर्फ तस्बीरो में बन कर रही गई हो ..! दिल से एक बार बोल दो ! तुम्हे पता है हम नए रिश्ते बनाने के लिये पुराने रिश्ते को तोड़ नहीं देते !आज पूरी दुनिया हमारे रिश्ते को जान गई है और पहचान गई है ! रिश्ता एक अटूट बिश्वास का ?
तुम्हे पता है दुनिया में जितने अच्छे लोग है आज वह एक प्यार की कड़ी में बंधे हैं! आज तुम्हारे रिश्ते प्रेम की जिन्दगी आवाद हो सकती है ! आज तुम्हारे ऒठो की खामोसी पर पूरी दुनिया की नजर है ! मानो कंही आग लगने से पहले उठता है ऐसा घुंआ. ! बोले तो - आदमी अकेला हो या या फिर मेला है .! फिर ... स्पीच मत दो //
हा प्रेम मै एक पागल लड़की हूं! क्या पता .. सब कुछ पा लिया हू ..पर कुछ नहीं पाई हू जैसा लगता है ! इतना होने के बौजूद डेल्ही में दिल नहीं लगता !
मुझे एक इन्सान का प्यार की जरूरत है ! कैसा किरण ..?
प्रेम -खुद से पूछ लो कैसा प्यार की मुझे जरूरत है ! क्या मै इसी सपने के साथ दिल्ली आई थी! याद है तुम से एक बार हम से पूछी थी .. क्या तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगे !
किरण ..अब तो ऐसा लगता है ,,, मानो या ना मानो तुम्हे प्यार हो गया है ! तस्बीर से पूछो.. तुम बाहर निकल कर आ जाओ ! क्या ये भी एक दीवानगी है .. क्या तुम इसे सच में बदल सकते हो !
कुछ बक्त तो दो ! और ऐसे भी मै एक पागल इन्सान हू ..क्या पता एक दिन इसे सच में बदल दू ..! ऐसे भी मुज में सरीफ , सिगरेट और लड़की जैसा कोई ऐब नहीं है ..! तो क्या बता दू ----अब फैसले लेने का बक्त नजदीक आ गया है !!
शुक्रिया
09 January 2010
कागज के पुराने टुकड़ो से - औरो को सताने वाले खुद चैन नहीं पाते हैं...
औरो को सताने वाले खुद चैन नहीं पाते हैं
औरो को जलाने वाले भी खुद जला करते हैं.
गरीबो के घरौदे जलाकर तुम्हे क्या मिलता है
गरीब की आह हर मोड़ पे तुझे बरबाद कर देगी
गुरुर है तो खुद अपना आशियाँ जलाकर देखो.
ऐ मानवता के दरिन्दे महेंद्र तुझे सलाह देता है.
शांति मिलेगी गरीब की कुटिया सजाकर देखो.
तुम औरो को बेवजह जलाकर खुद न जलो
मानवता के पुजारी बन चैन की वंशी बजाओ.
कागज के पुराने टुकड़ो से -
रचनाकार - महेंद्र मिश्र


