12 March 2010
शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 4
कदम जवानी धरा भगत ने,
दादा, दादी, माँ, चाची ने,
कहा सभी ने मिल इक स्वर में,
बाँधो इसको अब परिणय में .
घर में पहले बात छिड़ी थी,
गली गाँव फिर घूम चली थी .
यौवन में पग रखता जीवन,
मधुर उमंग से खिलता तन मन .
मंद पवन जब मधु रस भरता,
दर्पण यौवन रस निहारता .
तन मन कलियाँ मादक खिलतीं,
प्रेम लहर जब लह लह चलती .
शबनम जब आहें भरती है,
खुशबू भीनी सी उठती है .
लेते अरमाँ जब अंगड़ाई,
प्रीत वदन दिल में शहनाई .
फूल करें जब दिल मतवाला,
प्रेम सुधा का छलके प्याला .
गान बसंती हृदय सुनाता,
तन मन को आह्लादित करता .
झन झन कर झंकार हृदय में,
पायल सी खनकार हृदय में .
खन - खन खनकें चूड़ी कंगन,
तन मन में उपजे प्रीत अगन .
उद्दाम प्रेम की सहज राह,
सुवास कुसुम नैसर्गिक चाह .
रूप आलिंगन मधु उल्लास,
नव यौवना की बाँह विलास .
यौवन देखे बस सुंदरता,
जगती में बिखरी मादकता .
प्रेम पींग ले काम हिलोरें,
छोड़ें मनसिज बाण छिछोरे . (मनसिज = मदन)
बात भगत जब पड़ी कान में,
बांध रहे परिणय बंधन में .
खिन्न हुआ, यह कर्म नही है,
शादी मेरा धर्म नही है .
गुलाम देश है भारत मेरा,
कर्तव्य पुकार रहा मेरा .
माता मेरी जब बंदी हो,
न्याय व्यवस्था जब अंधी हो .
हथकड़ियाँ हों जब हाथों में,
बेड़ी जकड़ी जब पाँवों में .
बोल मुखर जब नही फूटते,
पथ सच्चों को नही सूझते .
बहनों का सम्मान न होता,
अपमान जहाँ पौरुष होता .
प्रतिकार शक्ति छीनी जाती,
सच्चाई धिक्कारी जाती .
आँसू भय से नही टपकते,
हाय दीन की नही समझते .
आलोक जहाँ छीना जाता,
अभिमान जहाँ रौंदा जाता .
सिंदूर जहाँ मिटाये जाते,
दीपक जहाँ बुझाये जाते .
दुर्दिन को जब देश झेलता,
बढ़ी दरिद्रता नित्य देखता .
प्रकृति संपदा भारत खोता,
दुर्भिक्ष के दिन रोज सहता .
आह, कराहें सुनी न जातीं,
पीड़ा, आँख से बह न पाती
पराधीनता श्राप बड़ा है,
दूजा कोई न पाप बड़ा है .
देश गुलामी में जकड़ा है,
जैसे गर्दन को पकड़ा है .
कर्तव्य सर्वप्रथम निभाना,
देश को आजादी दिलाना .
शादी की अब बात न करना,
परिणय का संवाद न करना .
देश गुलामी में जब तक है,
एक मृत्यु को मुझ पर हक है .
कोई नही बन सकती पत्नी,
मौत सिर्फ हो सकती पत्नी .
कवि कुलवंत सिंह
शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 3
हृदय विदारक दारुण क्रंदन,
परम पिता ने कर आलिंगन,
परम वंद्य आत्मा आवाहन,
भारत भेजा अपना नंदन .
बंगा लायलपुर जनपद में,
किसन, विद्यावती के घर में,
ईशा सन उन्नीस सौ सात,
सितंबर सत्ताइस की रात .
जन्म पुण्य आत्मा ने पाया,
क्रांतिकारियों के घर आया .
स्वतंत्रता के चिर सेनानी,
कुटुंब की थी यही कहानी .
सूर्य एक दमका था जग में,
भारत माता के आंगन में .
भाग्यवान बन आया था सिंह,
दादी बोली नाम भगत सिंह .
दादा अर्जुन सिंह वरदानी,
तीन पूत, तीनों सेनानी .
कूट कूट वीरता भरी थी,
सत्ता भी सहमने लगी थी .
पिता किसन सिंह की लड़ाई,
’भारत - सोसायटी’ बनाई .
उन पर डाले कई मुकदमें,
काटे ढ़ाई वर्ष जेल में .
वर्ष और दो नजरबंद थे,
गतिविधियों में पर दबंग थे .
डर कर चाचा अजीत सिंह से,
रंगून जेल भेजा यहाँ से .
दूजे चाचा स्वर्ण सिंह थे,
लाहौर सेंट्रल जेल बंद थे,
सही यातना, पर किया न गम,
सहते सहते तोड़ दिया दम .
दिखे पूत के पाँव पालने,
घर संस्कृति और माहौल ने,
बीज किये तन मन में रोपित,
देश प्रेम से अंतस शोभित .
खेल खेल में टीम बनाते,
अंग्रेजों को मार भगाते .
बने सभी बच्चों के लीडर,
गाते गीत गदर के जी भर .
चाची जब यादों में रोती,
मै हूँ ! चाची तूँ क्यों रोती ?
गोरों को मार भगाऊँगा,
चाचा को वापिस लाऊँगा .
खेल खेलता बंदूकों के,
रोपे धरती घास के तिनके .
नंद किशोर मेहता आये,
पूछे बिना वह रह न पाये .
’बाल भगत! यह क्या करते हो ?
धरती तिनके क्यों बोते हो ?’
’धरती बंदूक उगाऊँगा,
क्रांतिकारियों को बाटूँगा .
राष्ट्र को स्वतंत्र कराऊँगा,
जन जन में प्राण जगाऊँगा .’
बात भगत की सुन दिल झूमा,
गले लगा कर माथा चूमा .
गोरों का युग निकृष्ट प्रहार,
जगती का क्रूरतम संहार .
नि:शस्त्र सभा जलियाँवाला
कई सहस्त्र को भून डाला .
बारह वर्ष की थी अवस्था,
सुना बगत का ठनका मत्था .
वह पैदल बारह मील चले,
जलियाँ वाला बाग में पहुँचे .
रक्त रंजित मिट्टी उठाकर,
चूमा उसको भाल लगाकर .
शीशी में संभाल सहेजना,
प्राण प्रतिज्ञा से अराधना .
कवि कुलवंत सिंह
शहीद - ए - आजम भगत सिंह -2
धरती माँ धिक्कार रही थी,
रो रो कर चीत्कार रही थी .
वीर पुत्र कब पैदा होंगे ?
जंजीरों को कब तोड़ेंगे ?
’जन्मा राजा भरत यहीं क्या ?
नाम उसी से मिला मुझे क्या ?
धरा यही दधीच क्या बोलो ?
प्राण त्यागना अस्थि दान को ?
बोलो बोलो राम कहाँ है ?
मेरा खोया मान कहाँ है ?
इक सीता का हरण किया था,
पूर्ण वंश को नष्ट किया था !
बोलो बोलो कृष्ण कहाँ है ?
उसका बोला वचन कहाँ है ?
धर्म हानि जब भारत होगी,
जीत सत्य की फिर फिर होगी !
अर्जुन अब कब पैदा होगा,
भीम गदा धर कब लौटेगा ?
पुण्य भूमि बेहाल हुई क्या ?
वीरों से कंगाल हुई क्या ?
नृपति अशोक चंद्रगुप्त कहाँ ?
मर्यादा भारत लुप्त कहाँ ?
कहाँ है शान वैशाली की ?
मिथिला, मगध, पाटलिपुत्र की ?
गौतम हो गये बुद्ध महान,
इस धरती पर लिया था ज्ञान .
दिया कितने देशों को दान,
संदेश दबा वह कहाँ महान ?
इसी धरा पर राज किया था,
विक्रमादित्य पर नाज किया था .
जन्मा पृथ्वीराज यहीं क्या ?
कर्मभूमि छ्त्रपति यही क्या ?
चेतक पर घूमा करता था,
हर पत्ता, बूटा डरता था .
घास की रोटी वन में खाई,
पराधीनता उसे न भाई .
जुल्मों की तलवार काटने,
भारत संस्कृति रक्षा करने .
चौक चाँदनी शीश कटाया,
सरे - आम संदेश सुनाया .
चिड़ियों से था बाज लड़ाया,
अजब गुरू गोबिंद की माया .
धरा धन्य थी उसको पाकर,
देश बचाया वंश लुटाकर .
वही धरा अब पूछ रही थी,
रो रो कर अब सूख रही थी .
लौटा दो मेरा स्वाभिमान,
धरती चाहती फिर बलिदान .
पराधीन की कड़ियाँ तोड़ो,
नदियों की धारा को मोड़ो .
कोना कोना भारत जोड़ो,
हाथ उठे जो ध्वंश, मरोड़ो .
सिंह नाद सा गुंजन करने,
तूफानों में कश्ती खेने .
वह अमर वीर कब आयेगा ?
मुझको आजाद करायेगा !
हर बच्चा भारत बोल उठे,
सीने में ज्वाला खौल उठे .
हर दिल में आश जगाये जो,
भूमि निछावर हो जाये जो !
हर - हर बम बम जय घोष करो,
अग्नि क्रांति की हर हृदय भरो .
नर - नारी सब तरुण देख लें,
करना आहुति प्राण सीख लें !
बहुत हुआ अब मर मर जीना,
अनुसाल दासता की सहना . (अनुसाल = पीड़ा)
संभव वीर न भू पे लाना ?
ताण्डव शिव को याद दिलाना !’
कवि कुलवंत सिंह
शहीद - ए - आजम भगत सिंह 1
भारत माता जब रोती थी,
जंजीरों में बंध सोती थी .
पराधीनता की कड़ियाँ थीं,
जकड़ी बदन पर बेड़ियाँ थीं .
देश आँसुओं में रोता था,
ईस्ट इंडिया को ढ़ोता था .
भारत का शोषण होता था,
नैसर्गिक संपत्ति खोता था .
दुर्दिन के दिन गिनता था,
हर साल अकाल को सहता था .
अंग प्रत्यंग जब जलता था,
घावों से मवाद रिसता था .
बंदी बन नतमस्तक माता,
देश की हालत बदतर खस्ता,
हर पल था अंधियारा छलता,
सहमी रहती थी जब जनता .
आँसू जलधर से बहते थे,
सहमे सहमे सब रहते थे .
यौवन पतझड़ सा सूखा था,
सावन भी रूखा रूखा था .
भारत भू का कण कण शोषित,
त्रास यातना से अपमानित .
’कल्याण - भूमि’ आतंकित थी,
निज स्वार्थ हेतु संचालित थी .
राष्ट्र हीनता से जकड़ा था,
दीन दासता ने पकड़ा था .
मृत्यु प्राय सी चेतनता थी,
स्तब्ध सिसकती मानवता थी .
अवसाद गरल बन बहता था,
स्वाभिमान आहत रहता था .
गौरव पद तल त्रासित रहता,
झुका हुआ था अंबर रहता .
निष्ठुर क्रीड़ा खेली जाती,
अनय अहिंसा झेली जाती .
धन संपत्ति को लूटा जाता,
ब्रिटिश राज को भेजा जाता .
हिम किरीट की सुप्त शान थी,
पुरा देश की लुप्त आन थी .
राष्ट्र खड़ा पर शिथिल जान थी,
सरगम वंचित अनिल तान थी .
विषाद द्रवित नही होता था,
वेदन में आँसू घुलता था .
आवेग प्रबल उत्पीड़न था,
विवश कसमसाता जीवन था .
कलरव जब कर्कश लगता था,
नत दिव्य भाल जब दिखता था .
आकाश झुका सा लगता था,
चिर ग्रहण भाग्य पर दिखता था,
युगों युगों से गौरव उन्नत,
हिम का आलय झुका था अवनत .
विषम समस्या से था ग्रासित,
विकल, दग्ध ज्वाला से त्रासित .
’पुण्य भूमि’ जब मलिन हुई थी,
पद के नीचे दलित हुई थी .
’तपोभूमि’ संताने व्याकुल,
व्याल घूमते डसने आकुल .
हीरे, पन्ने, मणियां लूटीं,
कलियाँ कितनी रौंदी टूटीं .
आन देश की नोच खसोटी,
कृषक स्वयं न पाये रोटी .
चीर हरण नारी के होते,
भारत निधियां हम थे खोते .
वैभव सारा लुटा देश का,
ध्वस्त हुआ सम्मान देश का .
बाट जोहते सब रहते थे,
तिमिर हटाओ सब कहते थे .
भाव हृदय में सदा मचलते,
मौन परंतु सब सहते रहते .
कवि कुलवंत सिंह
05 March 2010
अब तक सुमनों पर चलते थे....(एक प्रेरणादायी गीत)
अब तक सुमनों पर चलते थे, अब कांटों पर चलना सीखें .
खङा हुआ है अटल हिमालय, दृढता का नित पाठ पढाता..
बहो निरंतर ध्येय सिंधु तक,सरिता का जल कण बतलाता.
अपने दृढ निश्चय से ,सबकी बाधांओं को ढहना सीखें…1
अपनी रक्षा आप करें जो ,देता उसका साथ विधाता .
अन्यों पर अवलंबित है जो, पग पग पर है ठोकर खाता..
जीवन का सिध्दांत अमर है, उस पर है हम चलना सीखें …2
हममें चपला सी चंचलता,हममें मेघों का गर्जन है.
हममें पूर्ण चंद्रमा –चुंबी,सिंधु तरंगों का नर्तन है..
सागर से गंभीर बने हम,पवन समान मचलना सीखें…3
उठें उठें अब अंधकार मय,जीवन पथ आलोकित कर दें..
निबिङ निशा के गहन तिमिर को ,मिटा आज जग ज्योतित कर दे..
तिल –तिल कर अस्तित्व मिटा दें दीप शिखा सम जलना सीखें....4
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02 March 2010
पति - पत्नी
अहा ! मन में बिखरी खुशियाँ,
अहा ! दिल में खिलती कलियाँ .
आज यौवना का परिणय है,
अपने सपनों में तन्मय है .
लेकर भाव पूर्ण समर्पण,
करना है यह तन मन अर्पण .
पल्लव मन गुंजारित हर्षित,
लज्जा नारी सुलभ समर्पित .
मृदु-क्रीड़ा, आलिंगन, चुंबन,
रोम रोम में भरते कंपन .
अधीर हृदय की प्रणय पुकार,
उष्ण स्पर्श की मधु झंकार .
पुष्प सुवासित महका जीवन,
सात रंग से बहका जीवन .
किलकारी से खिला संसार,
खुशियों का न पारावार .
जग जीवन ने डाला भार,
कर्तव्यों का बोझ अपार .
मीत की मन में प्रीत अथाह,
देखे लेकिन कैसे राह .
अब शिथिल हुआ है बाहुपाश,
भटका मन है बृहत आकाश .
++++++++++++++++++
मन में कोंपल फूट रही हैं,
सिंधु तरंगे उमड़ रही हैं .
माही को पाने की चाह,
बंधन पावन शुभ्र विवाह .
उन्माद अतुल रूप की राह,
काम तरंगित रुधिर प्रवाह .
भाव भंगिमा अंग उभार,
मोहित करतीं हृदय अपार .
सुरभि सांस में अधर विनोद,
रूप आलिंगन मदिर प्रमोद .
तन मन पर कर पति अधिकार,
आत्मिक सुख पौरुष संसार .
निसर्ग मिलन प्रकृति उपहार,
जीवन नन्हा हुआ साकार .
जग जीवन ने डाला भार,
कर्तव्यों का बोझ अपार .
भूल गया वह बाग बहार,
पाने को सारा संसार .
जग में हो उसका उत्थान,
सभी करें उसका सम्मान .
अब शिथिल हुआ है बाहुपाश,
भटका मन है बृहत आकाश .
कवि कुलवंत सिंह
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Kavi Kulwant Singh
http://kavikulwant.blogspot.com
http://kulwant.mumbaipoets.com/
022-25595378
09819173477
27 February 2010
चंद्रशेखर आजाद (23 जुलाई 1906 - 27 फरवरी 1931) - शत शत नमन!
चंद्रशेखर आजाद (23 जुलाई 1906 - 27 फरवरी 1931) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अत्यंत सम्मानित और लोकप्रिय क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे। वे भगत सिंह के अन्यतम साथियों में से थे। असहयोग आंदोलन समाप्त होने के बाद चंद्रशेखर आजाद की विचारधारा में बदलाव आ गया और वे क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिंदुस्तान सोशल रिपब्लिकन आर्मी में शामिल हो गए। उन्होंने कई क्रांतिकारी गतिविधियों जैसे काकोरी काण्ड तथासांडर्स-वध को अंजाम दिया।
जन्म तथा प्रारंभिक जीवन
चंद्रशेखर आजाद का जन्म मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले भावरा गाँव में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ। उस समय भावरा अलीराजपुर रियासत की एक तहसील थी। आजाद के पिता पंडित सीताराम तिवारी संवत १९५६ के अकाल के समय अपने निवास उत्तर-प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव को छोडकर पहले अलीराजपुर राज्य में रहे और फिर भावरा में बस गए। यहीं चंद्रशेखर का जन्म हुआ। वे अपने माता पिता की पाँचवीं और अंतिम संतान थे। उनके भाई बहन दीर्घायु नहीं हुए। वे ही अपने माता पिता की एकमात्र संतान बच रहे। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। पितामह मूलतः कानपुर जिले के राउत मसबानपुर के निकट भॉती ग्राम के निवासी कान्यकुब्ज ब्राह्मण तिवारी वंश के थे.
संस्कारों की धरोहर
चन्द्रशेखर आजाद ने अपने स्वभाव के बहुत से गुण अपने पिता पं0 सीताराम तिवारी से प्राप्त किए। तिवारी जी साहसी, स्वाभिमानी, हठी और वचन के पक्के थे। वे न दूसरों पर जुल्म कर सकते थे और न स्वयं जुलम सहन कर सकते थे। भावरा में उन्हें एक सरकारी बगीचे में चौकीदारी का काम मिला। भूखे भले ही बैठे रहें पर बगीचे से एक भी फल तोड़कर न तो स्वयं खाते थे और न ही किसी को खाने देते थे। एक बार तहसीलदार ने बगीचे से फल तुड़वा लिए तो तिवारी जी बिना पैसे दिए फल तुड़वाने पर तहसीलदार से झगड़ा करने को तैयार हो गए। इसी जिद में उन्होंने वह नौकरी भी छोड़ दी। एक बार तिवारी जी की पत्नी पडोसी के यहाँ से नमक माँग लाईं इस पर तिवारी जी ने उन्हें खूब डाँटा ऑर चार दिन तक सबने बिना नमक के भोजन किया। ईमानदारी और स्वाभिमान के ये गुण आजाद ने अपने पिता से विरासत में सीखे थे।[तथ्य वांछित]
आजाद का बाल्य-काल
1919 मे हुए जलियां वाला बाग नरसंहार ने उन्हें काफी व्यथित किया 1921 मे जब महात्मा गाँधी के असहयोग आन्दोलन प्रारंभ किया तो उन्होने उसमे सक्रिय योगदान किया। यहीं पर उनका नाम आज़ाद प्रसिद्ध हुआ । इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। सजा देने वाले मजिस्ट्रेट से उनका संवाद कुछ इस तरह रहा -
तुम्हारा नाम ? आज़ाद
पिता का नाम? स्वाधीन
तुम्हारा घर? जेलखाना
मजिस्ट्रेट ने जब १५ बेंत की सजा दी तो अपने नंगे बदन पर लगे हर बेंत के साथ वे चिल्लाते - महात्मा गांधी की जय। बेंत खाने के बाद तीन आने की जो राशि पट्टी आदि के लिए उन्हें दी गई थी, को उन्होंने जेलर के ऊपर वापस फेंका और लहूलुहान होने के बावजूद अपने एक दोस्त डॉक्टर के यहाँ जाकर मरहमपट्टी करवायी।
सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान जब फरवरी १९२२ में चौराचौरी की घटना को आधार बनाकर गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो भगतसिंह की तरह आज़ाद का भी काँग्रेस से मोह भंग हो गया और वे १९२३ में शचिन्द्र नाथ सान्याल द्वारा बनाए गए उत्तर भारत के क्रांतिकारियों को लेकर बनाए गए दलहिन्दुस्तानी प्रजातात्रिक संघ (एच आर ए) में शामिल हो गए। इस संगठन ने जब गाँवों में अमीर घरों पर डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाया जा सके तो तय किया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का तमंचा छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उसपर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल शामिल थे, की बड़ी दुर्दशा हुई क्योंकि पूरे गाँव ने उनपर हमला कर दिया था। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी १९२५ को दल ने देशभर में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रांतिकारी) बांटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा था। इस पैम्फलेट में रूसी क्रांति की चर्चा मिलती है और इसके लेखक सम्भवतः शचीन्द्रनाथ सान्याल थे।
अंग्रेजों की नजर में
इस संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त १९२५ को काकोरी कांड को अंजाम दिया गया । लेकिन इससे पहले ही अशफ़ाक उल्ला खान ने ऐसी घटनाओं का विरोध किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जाएगा। और ऐसा ही हुआ। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओं - रामप्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को क्रमशः १९ और १७ दिसम्बर १९२७ को फाँसी पर चढ़ाकर शहीद कर दिया। इस मुकदमे के दौरान दल निष्क्रिय रहा और एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रांतिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन यह योजना पूरी न हो सकी। ८-९ सितम्बर को दल का पुनर्गठन किया गया जिसका नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एशोसिएसन रखा गया। इसके गठन का ढाँचा भगत सिंह ने तैयार किया था पर इसे आज़ाद की पूर्ण समर्थन प्राप्त था।
चरम सक्रियता
आज़ाद के प्रशंसकों में पंडित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट जो स्वराज भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने 'फासीवदी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। यद्यपि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को रूस में समाजवाद के प्रशिक्षण के लिए भेजने के लिए एक हजार रूपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगतसिंह एसेम्बली में बम फेंकने गए तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गई। सांडर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और फिर बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी उन्होंने की । आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ाद क्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई १९३० को भगवतीचरण वोहरा की बमपरीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था । इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना खटाई में पड़ गई थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुर की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गाँधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे । झाँसी में रुद्रनारायण, सदाशिव मुल्कापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर मे शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में जाते वक्त शहीद कर दिया था।
शहादत
२५ फरवरी १९३१ से आज़ाद इलाहाबाद में थे और यशपाल रूस भेजे जाने सम्बन्धी योजनाओं को अन्तिम रूप दे रहे थे। २७ फरवरी को जब वे अल्फ्रेड पार्क (जिसका नाम अब आज़ाद पार्क कर दिया गया है) में सुखदेव के साथ किसी चर्चा में व्यस्त थे तो किसी मुखाविर की सूचना पर पुलिस ने उन्हें घेर लिया। इसी मुठभेड़ में आज़ाद शहीद हुए।
आज़ाद के शहादत की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिए उनका अन्तिम संस्कार कर दिया । बाद में शाम के वक्त उनकी अस्थियाँ लेकर युवकों का एक जुलूस निकला और सभा हुई। सभा को शचिन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीरामबोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को जवाहरलाल नेहरू ने भी सम्बोधित किया। इससे पूर्व ६ फरवरी १९२७ को मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे क्योंकि उनके देहान्त से क्रांतिकारियों ने अपना एक सच्चा हमदर्द खो दिया था।
व्यक्तिगत जीवन
आजाद एक देशभक्त थे। अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से सामना करते वक्त जब उनकी पिस्तौल में आखिरी गोली बची तो उसको उन्होंने खुद पर चला कर शहादत दी थी। उन्होंने छिपने के लिए साधु का वेश बनाना बखूबी सीख था और इसका उपयोग उन्होंने कई दफ़े किया। एक बार वे दल के लिए धन जुटाने हेतु गाज़ीपुर के एक मरणासन्न साधु के पास चेला बनकर भी रहे ताकि उसके मरने के बाद डेरे के पाँच लाख की सम्पत्ति उनके हाथ लग जाए पर वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि साधु मरणासन्न नहीं था और वे वापस आ गए। रूसी क्रान्तिकारी वेरा किग्नर की कहानियों से वे बहुत प्रभावित थे और उनके पास हिन्दी में लेनिन की लिखी एक किताब भी थी। हंलांकि वे कुद पढ़ने के बजाय दूसरों से सुनने मे ज्यादा आनन्दित होते थे। जब वे आजीविका के लिए बम्बई गए थे तो उन्होंने कई फिल्में देखीं। उस समय मूक फिल्मों का ही प्रचलन था पर बाद में वे फिल्मो के प्रति आकर्षित नहीं हुए।
चंद्रशेखर आजाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। उनके बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारंभ किया गया आंदोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। आजाद की शहादत के सोलह वर्षों के बाद 15 अगस्त सन् 1947 को भारत की आजादी का उनका सपना पूरा हुआ।
23 February 2010
कोई मुझे बतायेगा…..वो कौन थी…….
मैं आई कम इन सर…..एक भद्र सुरीली आवाज ने मेरा ध्यान तोङा….मैं सजग होकर बैठ गया ..हां अंदर आईये…. शेखावाटी मैं इस तरह की अंदर आने की रिक्वैस्ट कम ही सुनने को मिलती हैं…बल्कि धङाक से गैट खोलकर अंदर आने के बाद ही लोग कहते हैं….कि साब कै होरियो है……
हां …..आईये….
नमस्ते सर ….एक अधेङ महिला ने अंदर प्रवेश किया ….पीछे पीछे जींस टीशर्ट मैं एक सुंदर सी कन्या ….औऱ साथ मैं एक बङी सी बिंदी लगाये एक और संभ्रांत सी दिखने वाली महिला ….शायद लङकी की मां ….
मैने मरीज को स्टूल पर बैठने को इशारा किया….(तीनों मैं जो भी हो..)लङकी आगे बढी और उस पर बैठ गई…..यूं लगा जैसे किसी ने जबर्दस्ती उसे बिठाया हो…….मुझे कुछ नहीं हुआ है…जैसे उसने मुंह फुला रखा हो…..लङकी बोली
क्या….मैने पूछा कुछ तो होगा ….खुजली ..पिंपल्स …..मैं उसके चेहरे पर खोजने लगा…
नहीं सर ऐसी बात नहीं हे….ये मेरी भांजी है…कुछ परेशान है …..आप इसे समझाईये…
पर हुआ क्या हैं….ये मानसिक रूप से कुछ परेशान हैं…..मैं असमंजस से कुछ बोलना चाहता था…..मैं तो स्किन स्पेशियलिस्ट हूं ……पर उन्होंने मुझे बोलने का मौका ही नहीं दिया…..वो बताने लगी …..बीच बीच मैं कुछ लङकी से भी सवाल करता…….
लङकी का नाम अमृता था……..अच्छे तीखे नाक नक्श….शरीर भी भरा पूरा…..टाईट जींस और टी शर्ट मैं कुछ ज्यादा ही आकरषक लग रही थी पर शक्ल उसने ऐसी बना रखी थी जैसे अभी अभी रो कर आ रही हो….. उसका एम बी ए कर रही थी …..अच्छी होशियार….. मैने नंबर वगैरा पूछे ….अच्छे ग्रैड मैं पास होती रही थी…..पर कुछ समय से उसने पढाई मैं मन लगाना कम कर दिया….उदास रहने लगा थी….घर वाले रिश्ते की बात करते तो भी कोई बहाना बनाकर टाल जाती …..बढिया से बढिया रिश्तों के लिए मना कर चुकी थी …….जैसे की एक वर्तमान मंत्री के लङके को वो रिजैक्ट कर चुकी थी…..
मुझे ये जिंदगी नीरस लगने लगी हैं….मैं कुछ वो करना चाहती हूं…..पर समझ नहीं पा रही हूं………………………………..वो बोलती रही मैं सुनता रहा..कुल मिलाकर मुझे ये समझ आया कि लङकी या तो जबर्दस्त डिप्रेशन मैं है या उसका किसी और के साथ चक्कर है…सो वो घर वालों को चक्कर दे रही है……..पर फिर भी ये मेरा तो कैस नहीं था…..
बहन जी आप को किसी साईकियाट्रिस्ट को या साईकोलोलिजस्ट को दिखाना चाहिये….ये मेरा काम नहीं है…..मैने पीछा छुङाने की गरज से कहा.
मैं जानती हूं….लङकी की मौसी बोली…पर मैं आप के पास पहले भी आ चुकी हूं …..मुझे ये पता है कि आप इसे बहुत अच्छी तरह समझ पाओगे और बहुत अच्छी तरह इसे समझा पाओगे…..आप ही कुछ कीजियें…
जीवन आसान नहीं …पर उसे पर संपूर्ण रूप मैं जीने मैं ही जीवन का आनंद है…..आप प्रोफेशनल और पारिवारिक दोनों को संतुलित करे तो ही जीवन की संपूर्णता को हम छू पाते हैं……..etc…etc……………
खैर …..मैं भी चाहता था कि सब कुछ ठीक हो जाये….
मैने उसे पुस्तक दी….. cognitive therapy शायद by robert black…मैने किसी मित्र के कहने पर क्रोस वर्ड नामक बुक स्टोर से खरीदी थी…… मुझे वो पुस्तक ऐसे मरीजों के लिए बहुत उपयोगी लगी थी….उसमें हमारे मन मस्तिष्क मैं चलने वाले अनचाहे विचारों को पहचान कर उन्हें दूर करने का बहु ही कारगर और सरल तरीका समझाया हुआ था….
आप इसे पढें ….ये बहुत हैल्प करने वाली है…. निश्चित रूप से आप अच्छा महसूस करेंगी…….एक महिने बाद वापिस आयें….
वो दिन गया…. बात गई …..…..दिन…..हफ्ते …..महिने बीत गये…..मैं भी भूल गया……………………………..
मेरी साढे छै सो मैं खरीदी हुई पुस्तक ….मैं भी करीब करीब भूल ही गया…….
करीब छ- महिने बाद सर्दी की एक नर्म दुपहर को वही मौसी मुझे दिखाने आई…..अचानक मुझे याद आई मेरी …..साढे छः सौ रुपये की….राबर्ट ब्लैक…..कोग्निटिव…..बहन जी आप पहले भी यहां आई हैं…….
हां आई थी….डाक्टर….मेरी भांजी के साथ…..
क्या हुआ फिर उसका…..वो रो पङी जोर से …..जोर से आंसु निकल आये उसके …….आपके पास आने के कुछ दिन बाद ही उसने आत्म हत्या कर ली……मै चुप …..मैने भी दुःख प्रकट किया…मुझे अपने आप पर शर्म आ रही थी….कहां उनकी जवान भांजी की मरने की बात चली और मैं अपने साढे छः सो रूपये को रो रहा था…. ……………अब मुझे भूल जाना था…………………………किताब को …………साढे…छः……………………यूं ही किसी को नहीं मर जाना चाहिये जीवन बङा अमूल्य होता है……सचमुच मेरा दिल भी थोङा भारी हो चला था…………………………………………………………………………….
उस बात को बीते करीब करीब चार साल गुजर चुके थे…….
तुम्हारे मरीज तुम्हे बहुत याद करते हैं…….सरिता…….मेरी धर्मपत्नी ने बङी शरारत से देखते हुए कहा जो
अभी अभी जयपुर से बस मैं लौटी थी और मेरे साथ चाय….. पी रहीं थी……क्यों तुम्हें कोई मिला था……मेरे पास की सीट पर एक लङकी बैठी थी…..बहुत याद कर रही थी तुम्हें….कह रही थी तुमने उसकी जिंदगी बदल दी……
कैसे बदली मैंने उसकी जिंदगी …..जरा मैं भी तो सुनुं….मैने हंसते हुए कहा…….
कह रही थी ….वो बहुत परेशान थी…..बता रही थी कि एक बार तो सने आतमहत्या की भी सोची थी …पर आपसे मिलिने के बाद जैसे उसाका जिंदगी के प्रति नजरिया ही बदलिया … मैं मन ही मन मुस्कुराया चलो कोई इस रूप मैं भी याद करता है हमें…….
क्या नाम था उसका….
.अमृता……..
अब मेरी चाय गले मैं अटकने लगी थी….क् क् क्या…..उसकी बांयी आंख हल्की सी छोटी है…….हां वही
पर वो तो मर चुकी है…….
सरिता मेरी तरफ बङी अजीब सी नजरों से देखते हुए बोली….तुम शायद कंफ्यूज हो रहे हो कह रही थी कोई किताब दी थी आपने उसे कोई cognitive therapy….
हां वही तो………मेरे शरीर मैं झुरझुरी सी दौङ गई…….हां मैने ही उसे किताब दी थी ….और उसने कुछ दिनों बाद ही आत्म हत्या कर ली थी….मेरी तरफ देखती हुई सरिता की शक्ल देखने लायक थी…..उसकी क्या मेरी भी……
क्या आप बतायेंगे ….वो कौन थी….

