30 November 2007

अस्तित्‍व की खोज

जल की एक बूँद किसी प्रकार समुद्र के अथाह जल के पास पहुँची ओर उसमें घुलने लगी तो बूँद ने समुद्र से कहा – “मुझे अपने अस्तित्‍व को समाप्‍त करना मेरे लिये सम्‍भव नही होगा।, मै अपनी सत्‍ता खोना नही चाहती।”

समुद्र ने बूँद को समझाया-“तुम्‍हारी जैसी असंख्‍य बूँदों का समन्‍वय मात्र ही तासे मैं हूँ। तुम अपने भाई बहनों के साथ ही तो घुल‍ मिल रही हो। उसमें तुम्‍हारी सत्ता कम कहाँ हुई, वह तो और व्यापक हो गई है।”

बूँद को समु्द्र की बात पर संतोष नही हुआ और वह अपनी पृथक सत्ता की बात करती रही, और वार्त्ता के दौरान ही वह सूर्य की पंचड गर्मी के कारण वह वाष्‍प बन गई और कुछ देर बाद पुन: बारिस की बूँद के रूप में समुद्र के दरवाजें पर पहुँची। उसे अपनी ओर आता देख समुद्र तो समुद्र ने कहॉं कि- “बच्‍ची अपनी पृथक सत्‍ता बनाऐ रहकर भी तुम अपने स्वतंत्र अस्तित्‍व की रक्षा कहाँ कर सकीं? अपने उद्गम को समझो, तुम समष्टि से उत्‍पन्‍न हुई थीं अैर उसी की गोद में ही तुम्‍हें चैन मिलेगा।“

3 comments:

मीनाक्षी said...

सहजता से विवेक को गहरे तक झंझोड़ देने और चिंतन पर बाध्य करने वाली बात कह गए.

Vishu agarwal said...

bhout gehri baat keh gaye mitra..........

is sach se koi nahin bacha hain

Anonymous said...

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- Thomas