13 April 2008

गरीब-मध्यमवर्गीय ब्राह्मणों “सामाजिक न्याय” के लिये कुर्बान हो जाओ…

केन्द्र सरकार के उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगा दी है। अब कांग्रेस सहित सभी राजनैतिक दल अपनी-अपनी रोटियाँ नये सिरे से सेंक सकेंगे। निर्णय आये को अभी दो-चार दिन भी नहीं हुए हैं, लेकिन तमाम चैनलों और अखबारों में नेताओं और पिछड़े वर्ग के रहनुमाओं द्वारा “क्रीमी लेयर” को आरक्षण से बाहर रखने पर चिल्लाचोट मचना शुरु हो गई है। निजी शिक्षण संस्थाओं में भी आरक्षण लागू करवाने का इशारा “ओबीसी के मसीहा” अर्जुनसिंह पहले ही दे चुके हैं, पासवान और मायावती पहले ही प्रायवेट कम्पनियों में 33% प्रतिशत आरक्षण की माँग कर चुके हैं। यानी कि सभी को अधिक से अधिक हिस्सेदारी चाहिये। इस सारे “तमाशे” में एक वर्ग सबसे दूर उपेक्षित सा खड़ा है, वह है निम्न और मध्यम वर्ग के ब्राह्मणों का, जिसके बारे में न तो कोई बात कर रहा है, न ही कोई उससे पूछ रहा है कि उसकी क्या गलती है। स्वयंभू पत्रकार और जे-एन-यू के कथित विद्वान लगातार आँकड़े परोस रहे हैं कि सरकारी नौकरियों में कितने प्रतिशत ब्राह्मण हैं, कितने प्रतिशत दलित है, कितने मुसलमान हैं आदि-आदि। न तो गुणवत्ता की बात हो रही है, न ही अन्याय की। यह “बदला” लिया ही इसलिये जा रहा है कि हमारे पूर्वजों ने कभी अत्याचार किये थे। जाहिर है कि परदादा के कर्मों का फ़ल परपोते को भुगतना पड़ रहा है, “सामाजिक न्याय” के नाम पर।

आँकड़े ही परोसने हैं तो मैं भी बता सकता हूँ कि सिर्फ़ दिल्ली मे कम से कम 50 सुलभ शौचालय हैं, जिनका “मेंटेनेंस” और सफ़ाई का काम ब्राह्मण कर रहे हैं। एक-एक शौचालय में 6-6 ब्राह्मणों को रोजगार मिला हुआ है, ये लोग उत्तरप्रदेश के उन गाँवों से आये हैं जहाँ की दलित आबादी 65-70% है। दिल्ली के पटेल नगर चौराहे पर खड़े रिक्शे वालों में से अधिकतर ब्राह्मण हैं। तमिलनाडु में आरक्षण लगभग 70% तक पहुँच जाने के कारण ज्यादातर ब्राह्मण तमिलनाडु से पलायन कर चुके हैं। उप्र और बिहार की कुल 600 सीटों में से सिर्फ़ चुनिंदा (5 से 10) विधायक ही ब्राह्मण हैं, बाकी पर यादवों और दलितों का कब्जा है। कश्मीर से चार लाख पंडितों को खदेड़ा जा चुका है, कई की हत्या की गई और आज हजारों अपने ही देश में शरणार्थी बने हुए हैं, लेकिन उन्हें कोई नहीं पूछ रहा। अधिकतर राज्यों में ब्राह्मणों की 40-45% आबादी गरीबी की रेखा से नीचे गुजर-बसर कर रही है। तमिलनाडु और कर्नाटक में मंदिरों में पुजारी की तनख्वाह आज भी सिर्फ़ 300 रुपये है, जबकि मन्दिर के स्टाफ़ का वेतन 2500 रुपये है। भारत सरकार लगभग एक हजार करोड़ रुपये मस्जिदों में इमामों को वजीफ़े देती है और लगभग 200 करोड़ की सब्सिडी हज के लिये अलग से, लेकिन उसके पास गरीब ब्राह्मणों के लिये कुछ नहीं है। कर्नाटक सरकार द्वारा विधानसभा में रखे गये आँकड़ों के मुताबिक राज्य के ईसाईयों की औसत मासिक आमदनी है 1562/-, मुसलमानों की 794/-, वोक्कालिगा समुदाय की 914/-, अनुसूचित जाति की 680/- रुपये जबकि ब्राह्मणों की सिर्फ़ 537/- रुपये मासिक। असल समस्या यह है कि दलित, ओबीसी और मुसलमान के वोट मिलाकर कोई भी राजनैतिक पार्टी आराम से सत्ता में आ सकती है, फ़िर क्यों कोई ब्राह्मणों की फ़िक्र करने लगा, और जब भी “प्रतिभा” के साथ अन्याय की बात की जाती है, तो देश जाये भाड़ में, हमारी अपनी जाति का भला कैसे हो यह देखा जायेगा।



आने वाले दिनों में “नेता” क्या करेंगे इसका एक अनुमान :
इस बात में मुझे कोई शंका नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद अब माल कूटने के लिये और अपने चमचों और रिश्तेदारों को भरने के लिये “क्रीमी लेयर” को नये सिरे से परिभाषित किया जायेगा। सभी ओबीसी सांसदों और विधायकों को “गरीब” मान लिया जायेगा, सभी ओबीसी प्रशासनिक अफ़सरों, बैंक अधिकारियों, अन्य शासकीय कर्मचारियों, बैंक अधिकारी, डॉक्टर आदि सभी को “गरीब” या “अतिगरीब” मान लिया जायेगा, और जो सचमुच गरीब ओबीसी छात्र हैं वे मुँह तकते रह जायेंगे। फ़िर अगला कदम होगा निजी / प्रायवेट कॉलेजों और शिक्षण संस्थाओं की बाँहें मरोड़कर उनसे आरक्षण लागू करवाने की (जाहिर है कि वहाँ भी मोटी फ़ीस के कारण पैसे वाले ओबीसी ही घुस पायेंगे)।

एकाध-दो वर्षों या अगले चुनाव आने तक सरकारों का अगला कदम होगा निजी कम्पनियों में भी आरक्षण देने का। उद्योगपति को अपना फ़ायदा देखना है, वह सरकार से करों में छूट हासिल करेगा, “सेज” के नाम पर जमीन हथियायेगा और खुशी-खुशी 30% “अनप्रोडक्टिव” लोगों को नौकरी पर रख लेगा, इस सारी प्रक्रिया में “पेट पर लात” पड़ेगी फ़िर से गरीब ब्राह्मण के ही। सरकारों ने यह मान लिया है कि कोई ब्राह्मण है तो वह अमीर ही होगा। न तो उसे परीक्षा फ़ीस में कोई रियायत मिलेगी, न “एज लिमिट” में कोई छूट होगी, न ही किसी प्रकार के मुफ़्त कोर्स उपलब्ध करवाये जायेंगे, न ही कोई छात्रवृत्ति प्रदान की जायेगी। सुप्रीम कोर्ट के नतीजों को लात मारने की कांग्रेस की पुरानी आदत है (रामास्वामी केस हो या शाहबानो केस), इसलिये इस फ़ैसले पर खुश न हों, “वे” लोग इसे भी अपने पक्ष में करने के लिये कानून बदल देंगे, परिभाषायें बदल देंगे, ओबीसी लिस्ट कम करना तो दूर, बढ़ा भी देंगे…

बहरहाल, अब जून-जुलाई का महीना नजदीक आ रहा है, विभिन्न परीक्षाओं के नतीजे और एडमिशन चालू होंगे। वह वक्त हजारों युवाओं के सपने टूटने का मौसम होगा, ये युवक 90-95 प्रतिशत अंक लाकर भी सिर्फ़ इसलिये अपना मनपसन्द विषय नहीं चुन पायेंगे, क्योंकि उन्हें “सामाजिक न्याय” नाम का धर्म पूरा करना है। वे खुली आँखों से अपने साथ अन्याय होते देख सकेंगे, वे सरेआम देख सकेंगे कि 90% अंक लाने के बावजूद वह प्रतिभाशाली कॉलेज के गेट के बाहर खड़ा है और उसका “दोस्त” 50-60% अंक लाकर भी उससे आगे जा रहा है। जो पैसे वाला होगा वह अपने बेटे के लिये कुछ ज्यादा पैसा देकर इंजीनियरिंग/ डॉक्टरी की सीट खरीद लेगा, कुछ सीटें “NRI” हथिया ले जायेंगे, वह कुछ नहीं कर पायेगा सिवाय घुट-घुटकर जीने के, अपने से कमतर अंक और प्रतिभा वाले को नौकरी पाते देखने के, और “पढ़े फ़ारसी बेचे तेल” कहावत को सच होता पाने के लिये। जाहिर है कि सीटें कम हैं, प्रतिभा का विस्फ़ोट ज्यादा है और जो लोग साठ सालों में प्राथमिक शिक्षा का स्तर तक नहीं सुधार पाये, जनसंख्या नियन्त्रित नहीं कर पाये, भ्रष्टाचार नहीं रोक पाये, वे लोग आपको “सामाजिक न्याय”, “अफ़र्मेटिव एक्शन” आदि के उपदेश देंगे और झेड श्रेणी की सुरक्षा के नाम पर लाखों रुपये खर्च करते रहेंगे…

(भाग–2 में जारी… आरक्षण नामक दुश्मन से निपटने हेतु कुछ सुझाव…)

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

6 comments:

Tara Chandra Gupta said...

aap bilkul sahi kah rahe hai suresh ji. kangress ki yeh purani fitrat rahi hai ki aarkshan kote ko apne paksh me karne k sath hi badha bhi denge.
sahi likh rahe hain . likhte rhiye.

Satyawati said...

sabhi savarn jatiyon khas kar brahmano ko sachmuch me arakshan ki talwar se ghayal kiya ja raha hai satadhari varg dwara chahe vah koi bhi ho, par eisa kyon ho raha hai, kya brahman sankhya me dalito se kam hai ya voh sangathit hokar apni takat ka ahsas nahi kara pa raha. pratham brahmano ko apni sankhya badhani chahiyey eiliye ies or dhyan de, dusari brahman apas me sangathit ho chahey vo kisi chhetra visesh me kyon na rahatey ho. in do bato par amal karne se hi ham apni agay aney wali santati ko ek majboti pradan kar sakenge. jab ham sangathit aur bahu sankhyak hongey to koi bhi sattadhari varg hamari upeksha nahi kar sakega. Atah in ka brahman samaj me prachar karey.
dhanyawad

PD said...
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PD said...

सहमति है आपसे.. आपने अगर मेरा ये पोस्ट नहीं पढा है तो जरूर पढें कि कैसे मैं खुद आरक्षण का शिकार हुआ था..

http://prashant7aug.blogspot.com/2008/04/blog-post_11.html

mahashakti said...

देश को खोखला करने की साजिस है, आज देश का योग्‍य नौजवना इसी आराक्षण की आज के कारण अपने मॉंबाप के सपनों को पूरा करने के अक्षम है। आज लेख में सच्‍चाई के दर्शन कराये है बहुत अच्‍छा लगा धन्‍यवाद।

munish said...

आरक्षण के दानव का मुकाबला करने का अब सिर्फ़ एक तरीक है दोस्तों के आरक्षण से त्रस्त हर इंसान इसका विरोध करना बिल्कुल बंद कर दे और सिर्फ़ एक सवाल ज़ोर से उठाये की भारत की सेना (BSF जैसे अर्द्ध सैनिक बलों की बात न करें) में मंडल आयोग की सिफारिशें क्यों लागू नहीं ? सिर्फ़ ये सवाल इस देश को हर समस्या से निजात दिलाने की ताक़त रखता है दोस्तों .हर जगह, हर मंच पर ये सवाल उठना ही चाहिए.