13 April 2008

"आरक्षण" के राक्षस से बचाव के कुछ उपाय…

(भाग 1 से जारी…) जैसा कि मैंने पिछले भाग में लिखा था कि जब कहीं कोई सुनवाई नहीं है, ब्राह्मण कोई “वोट बैंक” नहीं है, तो मध्यमवर्गीय ब्राह्मणों को क्या करना चाहिये? यूँ देखा जाये तो कई विकल्प हैं, जैसे –

(1) अभी फ़िलहाल जब तक निजी कम्पनियों में आरक्षण लागू नहीं है, तब तक वहीं कोशिश की जाये (चाहे शुरुआत में कम वेतन मिले), निजी कम्पनियों का गुणगान करते रहें, कोशिश यही होना चाहिये कि सरकारी नौकरियों का हिस्सा घटता ही जाये और ज्यादा से ज्यादा संस्थानों पर निजी कम्पनियाँ कब्जा कर लें (उद्योगपति चाहे कितने ही समझौते कर ले, “क्वालिटी” से समझौता कम ही करता है, आरक्षण देने के बावजूद वह कुछ जुगाड़ लगाकर कोशिश यही करेगा कि उसे प्रतिभाशाली युवक ही मिलें, इससे सच्चे प्रतिभाशालियों को सही काम मिल सकेगा)। मंडल आयोग का पिटारा खुलने और आर्थिक उदारीकरण के बाद गत 10-15 वर्षों में यह काम बखूबी किया गया है, जिसकी बदौलत ब्राह्मणों को योग्यतानुसार नौकरियाँ मिली हैं। यदि निजी कम्पनियाँ न होतीं तो पता नहीं कितने युवक विदेश चले जाते, क्योंकि उनके लायक नौकरियाँ उन्हें सरकारी क्षेत्र में तो मिलने से रहीं।

(2) एक थोड़ा कठिन रास्ता है विदेश जाने का, अपने दोस्तों-रिश्तेदारों-पहचान वालों की मदद से विदेश में शुरुआत में कोई छोटा सा काम ढूँढने की कोशिश करें, कहीं से लोन वगैरह लेकर विदेश में नौकरी की शुरुआत करें और धीरे-धीरे आगे बढ़ें। यदि ज्यादा पढ़े-लिखे है तो न्यूजीलैण्ड, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, फ़िनलैण्ड, नार्वे, स्वीडन जैसे देशों में जाने की कोशिश करें, यदि कामगार या कम पढ़े-लिखे हैं तो दुबई, मस्कत, कुवैत, सिंगापुर, इंडोनेशिया की ओर रुख करें, जरूर कोई न कोई अच्छी नौकरी मिल जायेगी, उसके बाद भारत की ओर पैर करके भी न सोयें। हो सकता है विदेश में आपके साथ अन्याय-शोषण हो, लेकिन यहाँ भी कौन से पलक-पाँवड़े बिछाये जा रहे हैं।



(3) तीसरा रास्ता है व्यापार का, यदि बहुत ज्यादा (95% लायक) अंक नहीं ला पाते हों, तो शुरुआत से ही यह मान लें कि तुम ब्राह्मण हो तो तुम्हें कोई नौकरी नहीं मिलने वाली। कॉलेज के दिनों से ही किसी छोटे व्यापार की तरफ़ ध्यान केन्द्रित करना शुरु करें, पार्ट टाइम नौकरी करके उस व्यवसाय का अनुभव प्राप्त करें। फ़िर पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी के लिये धक्के खाने में वक्त गँवाने की बजाय सीधे बैंकों से लोन लेकर अपना खुद का बिजनेस शुरु करें, और उस व्यवसाय में जम जाने के बाद कम से कम एक गरीब ब्राह्मण को रोजगार देना ना भूलें। मुझे नहीं पता कि कितने लोगों ने गरीब जैन, गरीब सिख, गरीब बोहरा, गरीब बनिया देखे हैं, मैंने तो नहीं देखे, हाँ लेकिन, बहुत गरीब दलित और गरीब ब्राह्मण बहुत देखे हैं, ऐसा क्यों है पता नहीं? लेकिन ब्राह्मण समाज में एकता और सहकार की भावना मजबूत करने की कोशिश करें।

(4) सेना में जाने का विकल्प भी बेहतरीन है। सेना हमेशा जवानों और अफ़सरों की कमी से जूझती रही है, ऐसे में आरक्षण नामक दुश्मन से निपटने के लिये सेना में नौकरी के बारे में जरूर सोचें, क्योंकि वहाँ से रिटायरमेंट के बाद कई कम्पनियों / बैंकों में सुरक्षा गार्ड की नौकरी भी मिल सकती है।

(5) अगला विकल्प है उनके लिये जो बचपन से ही औसत नम्बरों से पास हो रहे हैं। वे तो सरकारी या निजी नौकरी भूल ही जायें, अपनी “लिमिट” पहचान कर किसी हुनर में उस्ताद बनने की कोशिश करें (जाहिर है कि इसमें माता-पिता की भूमिका महत्वपूर्ण होगी)। बच्चे में क्या प्रतिभा है, या किस प्रकार के हुनरमंद काम में इसे डाला जा सकता है, इसे बचपन से भाँपना होगा। कई क्षेत्र ऐसे हैं जिसमें हुनर के बल पर अच्छा खासा पैसा कमाया जा सकता है। ऑटोमोबाइल मेकेनिक, गीत-संगीत, कोई वाद्य बजाना, कोई वस्तु निर्मित करना, पेंटिंग… यहाँ तक कि कम्प्यूटर पर टायपिंग तक… कोई एक हुनर अपनायें, उसकी गहरी साधना करें और उसमें महारत हासिल करें। नौकरियों में सौ प्रतिशत आरक्षण भी हो जाये तो भी लोग तुम्हें दूर-दूर से ढूँढते हुए आयेंगे और मान-मनौव्वल करेंगे, विश्वास रखिये।

(6) एक और विकल्प है, जिसमें ब्राह्मणों के पुरखे, बाप-दादे पहले से माहिर हैं… वह है पुरोहिताई-पंडिताई-ज्योतिषबाजी-वास्तु आदि (हालांकि व्यक्तिगत रूप से मैं इसके खिलाफ़ हूँ, लेकिन सम्मानजनक तौर से परिवार और पेट पालने के लिये कुछ तो करना ही होगा, अपने से कम अंक पाने वाले और कम प्रतिभाशाली व्यक्ति के हाथ के नीचे काम करने के अपमान से बचते हुए)। जमकर अंधविश्वास फ़ैलायें, कथा-कहानियाँ-किस्से सुनाकर लोगों को डरायें, उन्हें तमाम तरह के अनुष्ठान-यज्ञ-वास्तु-क्रियायें आदि के बारे में बतायें और जमकर माल कूटें। जैसे-जैसे दलित-ओबीसी वर्ग पैसे वाला होता जायेगा, निश्चित जानिये कि वह भी इन चक्करों में जरूर पड़ेगा।

तो गरीब-मध्यमवर्गीय ब्राह्मणों तुम्हें निराश होने की कोई जरूरत नहीं है, “उन्हें” सौ प्रतिशत आरक्षण लेने दो, उन्हें सारी सुविधायें हथियाने दो, उन्हें सारी छूटें लेने दो, सरकार पर भरोसा मत करो वह तुम्हारी कभी नहीं सुनेगी, तुम तो सिर्फ़ अपने दोनो हाथों और तेज दिमाग पर भरोसा रखो। कई रास्ते हैं, सम्मान बनाये रखकर पैसा कमाना मुश्किल जरूर है, लेकिन असम्भव नहीं…

सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com

4 comments:

अतुल said...

सामाजिक गैर बराबरी दूर करने के लिए एक हथियार है आरक्षण.

Anonymous said...

आराक्षण वह हथियार है जिससे योग्‍यता पर जाति को वरीयता दी जाती है।

कुन्नू सिंह said...

आप पोस्ट का आकार और साईड बार बडा छोटा कर सक्तें हैं पर ये आपको खुद कर के देखना पडॆगा क्यो की आपका टेंपलेट और मेरा टेंपलेट अलग है।

html मे साईड बार और पोस्ट लीखा होगा उसे ईडीट कर के देखें।

मैने घंटॊ प्रयास कीये पर कोई फायदा नही हुवा उलटा साईड बार दीखना ही बंद हो गया था पर मैने ये नया ब्लोग बना कर उसपर एक्सपेरीमेंट कीया था ईसलीये कोई नुकसान नही हुआ।

अपने ईस बलोग पर ईडीट करने से बचें या टेंपलेट save कर लें फीर ईडीट करें।

मै प्रयास कर के देखता रहूंगा अगर मीला तो आपको बता दूंगा।

कुन्नू सिंह said...

आपने कमेंट दे कर पुछा था की क्या मै पोस्ट का आकार और साईड बार बडा छोटा कर सकता हूं।

आप ईसका आकार और साईड बार का आकार बडा छोटा कर सक्तें हैं।

मेरा अगला पोस्ट है "पूरे कंप्युटर मे कही भी कीसी भी प्रोग्राम मे या ब्राउजर मे हिंदी मे कैसे पढे और लीखें" बहुत काम की जानकारी है ईसी लीये बता दीया