17 February 2008

मराठा राज्य के विनाश पर थी जालौन की नींव

जालौन जिले की नींव मराठा राज्य को मिटाकर अंग्रेजों ने उस समय रखी थी जब 'क्राउन' का नहीं 'कंपनी बहादुर' का शासन था लेकिन इसकी सीमायें कई बार बदली गयीं। कभी दबोह, मोंठ, गरौठा, चिरगांव, जैतपुर और महोबा भी जालौन जिले के हिस्से थे।

 
1840 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी की सरकार ने जालौन के मराठा राज्य का विलय अपने शासित क्षेत्र में किया उस समय जालौन के अलावा उरई, आटा और महोबा इसके परगने थे। कोंच और कालपी पहले से ही कंपनी के अधिकार में आ चुके थे। इसके अलावा झांसी जिले के मोंठ का प्रशासन भी जालौन के प्रशासक कैप्टेन डूलन देख रहे थे। इन सारी इकाइयों को समाहित करते हुए जालौन जिले का गठन किया गया।


1841 में चिरगांव जागीर को जब्त कर इसे भी जालौन जिले का हिस्सा बना दिया गया। 1843 में जिले का और विस्तार कर परगना दबोह और गरौठा भी इससे जोड़ दिये गये। 1844 में कंपनी सरकार ने ग्वालियर के सिंधिया को युद्ध मैदान में शिकस्त देकर उनके साम्राज्य का काफी हिस्सा अपने कब्जे में ले लिया। इसी में से माधौगढ़, इंदुरखी, भांडेर और मऊ मिहौनी को भी जालौन जिले के अंतर्गत कर दिया गया। वर्ष 1849 में जैतपुर के राजा की निसंतान मृत्यु होने पर उनके राज्य को भी कंपनी ने बलात अपने अधिकार में लेकर जालौन जिले से संबद्ध कर दिया। इस तरह से 1852 तक जालौन जिले की सीमायें अत्यंत वृहद रहीं।

 
1853 में झांसी के राजा गंगाधर भी निसंतान चल बसे तो लार्ड डलहौजी की हड़प नीति के तहत कंपनी ने झांसी को भी अपने अधीनस्थ कर लिया तथा वहां मजबूत शिकंजा जमाने के लिए सुपरिनटेडसी बना दी जिसके अंतर्गत तीन जिले झांसी, चंदेरी व जालौन रखे गये। इस दौरान जालौन का पुनर्गठन कर सुचारु प्रशासन के लिए उसके आकार को छोटा करते हुए महोबा व जैतपुर परगना हमीरपुर जिले को दे दिये गये। इसके बाद जालौन जिले की सीमा में और कटौती कर गरौठा, भांडेर, मोंठ व चिरगांव को झांसी में शामिल कर दिया गया।


1857 के गदर में सिंधिया द्वारा दिखायी गयी वफादारी के इनाम स्वरूप इंदुरखी, माधौगढ़ और दबोह परगनों के कई गांव सिंधिया रियासत को उपहार में दिये जाने से जालौन जिले का स्वरूप और संकुचित हो गया।


इसके बाद जालौन जिले का बड़ा पुनर्गठन आजादी के बाद तब हुआ जब 1956 में विंध्य प्रदेश विघटित किया गया और इसके अंतर्गत आने वाले नदीगांव तहसील व कदौरा बावनी राज्य को जालौन जिले से जोड़ दिया गया। जालौन जिले के इतिहास और भूगोल पर शोधपरक पुस्तक लिखने वाले देवेंद्र कुमार सिंह के अनुसार इस जनपद में पहली जनगणना 1853 में हुयी थी लेकिन 1865 में हुयी जनगणना का इसके संदर्भ में ज्यादा महत्व है क्योंकि तब जालौन जिले का नक्शा वैसा ही था जैसा आज और उस समय वह यहां की मर्दमशुमारी 4 लाख 5 हजार 604 रही थी जबकि 2001 की जनगणना के अनुसार जिले की आबादी 135 वर्षो में लगभग ढाई गुना बढ़कर 14 लाख 55 हजार 659 हो चुकी है।

 

साभार - जानकारी अज्ञात

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