27 June 2008

उड़ते पंक्षी

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
दुनियां की सैर करते हैं।
ध्यान लगाकर उड़ते जाते,
अपनी मंजिल पर पहुंचा करते है॥

धरा अभूषण देख-देखकर
वहीं रैन बसेरा करतें है।
निश्छल भाव से उड़ते जाते,
नभ से बाते करतें है॥

सूर्य की तपती किरणों से
केवल ऊर्जा पाते जाते है।
जहां रैन बसेरा करना हो,
सुख-चैन की सांसे लेते जाते है॥

प्रेरणा देते पक्षी मानव को
तुम कर्म सदा करते जाओ।
पवित्र भाव के वशीभूत हो,
मानव की सेवा करते जाओ॥

प्रेम से मिलकर तुम रहना
कर्तव्य खूब निभाते जाना।
परस्पर बैर भाव मिटाकर,
श्रध्दा से शीश झुकाते जाना॥

पक्षी गगन में उड़ते जाते
स्वछन्द विचरण करते हैं।
कर्म को उद्देश्य मानकर,
हिमगिरी भी पार करते है॥

प्रेरणा मानव तुम भी लो
आलस्य को दूर भगाना है।
निष्ठा भाव मन में जगाकर,
कर्तव्य निष्ठ बन जाना है॥

उड़ते पंक्षी इस जीवन में
नई अनुभूति सदा करतें है।
आशा की किरणें पाकर ही,
निज कर्म सदा करतें है॥

4 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

सुन्दर कविता

Udan Tashtari said...

बढ़िया है, लिखते रहो.

शिव कुमार गुप्‍ता said...

बहुत अच्‍छी कविता, जीवन को प्रेरणा देती हुई, ये कविता काफी दूर तक सोचने पर मजबूर करती है।

mahashakti said...

हम क्‍या कहे कविता बहुत कुछ कह गई है, बहुत अच्‍छा