24 February 2009

धर्म क्षेत्रे - महापुरूष (विवेकानन्द) उवाच

विवेकानन्द कहते थेः 'तुम किसी का मकान छीन लो यह पाप तो है लेकिन इतना नहीं। वह घोर पाप नहीं है। किसी के रूपये छीन लेना पाप है लेकिन किसी की श्रद्धा की डोर तोड़ देना यह सबसे घोर बड़ा पाप है क्योंकि उसी श्रद्धा से वह शांति पाता था, उसी श्रद्धा के सहारे वह भगवान के तरफ जाता था।
तुमने किसी का मकान छीन लिया तो किराये के मकान से वह जीवन गुजार लेगा लेकिन तुमने उसकी श्रद्धा तोड़ दी, श्रद्धा का दुरुपयोग कर दिया, ईश्वर से, शास्त्र से, गुरु से, भगवान के मार्ग से, साधन-भजन से उसको भटका दिया तो वह अपने मकान में होते हुए भी स्मशान में है। रूपयों के बीच होते हुए भी वह बेचारा कंगाल है। उसके दिल की शांति चली गई जीवन से श्रद्धा गई, शांति गई, साधन-भजन गया तो भीतर का खजाना भी गया। बाहर के खजाने में आदमी कितना भी लोट-पोट होता हो लेकिन जिसके पास भक्ति, साधन, भजन, श्रद्धा का खजाना नहीं है वह सचमुच में कंगाल है

4 comments:

विनय said...

विवेकानंद की महानता का कोई बखान नहीं

---
चाँद, बादल और शाम

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर विचार जी.
धन्यवाद

Anonymous said...

Mothers against "Loosers" and Pub Culture

http://maald.wordpress.com/

kumar Dheeraj said...

विवेकानंद के व्यक्तवय पर आधारित बेहद खूबसूरत रचना । विवेकानन्द के विचार का कोई सानी नही है यह सबको पता है उसके जरिए रोचक बात कही गई है धन्यवाद