06 September 2008

दुःख में ना फँसना

कविमन बोले,
आखें खोले,
दुनिया परायी,
देखो वो आई,

डाई वो लायी,
थोडा मुस्कुरायी,
कवि सर गंजा,
हांथों से मंजा,

कवि मन घायल,
बजी उसकी पायल,
कविमन रोये,
क्लेश बोए,

कविमन उदास,
जाने कहाँ आस,
तभी पाई कविता,
जैसे कोई सरिता,

कविमन हर्षित,
अब नहीं व्यथित,

कविमन नाचे,
झूमे गाये,
खुशियाँ मनाये,
ग़म भूल जाये।

कविमन पाया,
जीवन हँसना,
दुःख पी लेना,
इनमे ना फँसना।

5 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत सही!!!






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उड़न तश्तरी

राज भाटिय़ा said...

बिलकुल सही
धन्यवाद

Tara Chandra Gupta "MEDIA GURU" said...

bahut badhiya hai kavi ka man .

mahashakti said...

मित्र आपकी कविता पढ़ कर बहुत मजा आया, हँसते-हँसते मजा आ गया।

बहुत अच्छे भाव दिये है।

बधाई

रीतेश रंजन said...

धन्यवाद मित्र! वैसे भी मेरी यह कोशिश रही है की मेरी रचनाओं उस पढ़ कर लोग अपनी चिंताओं को एक क्षण के लिए भूल जायें!